भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 656 में से

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पृष्ठ 73

उ०ख०-अ०१५ ] * ब्रह्माजीद्वारा भगवान् गणेशकी आराधना * ७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ / Left Column] आनन्दसे युक्त होकर उच्च स्वरसे हँस पड़ा ॥ ६-७॥ मेरे हँसनेपर वह बालक वटवृक्षसे नीचे उतर आया और मेरी गोदमें आकर वह मधुर वाणीमें बोला— ॥ ८ ॥ बालकने कहा— हे चतुरानन ! मूढ़ बुद्धिवाले तुम व्यर्थ ही वृद्ध हुए हो, तुम अल्पसे भी अल्प बुद्धिवाले हो। तुम विघ्नोंसे पीड़ित और सृष्टि करनेकी चिन्तासे युक्त हो। 'तप कहाँ करूँ'—इस चिन्तासे तुम निरन्तर जलके मध्य भ्रमण कर रहे हो। मैं तुम्हें सम्पूर्ण चिन्ताओंका हरण करनेवाले अपने एकाक्षरमन्त्ररूपी उपायका उपदेश करता हूँ; पुरश्चरणविधिसे तुम इसका दस लाख जप करो। तब मैं तुम्हारे समक्ष प्रत्यक्ष होकर तुम्हें [सृष्टि-रचनासम्बन्धी] उत्तम सामर्थ्य प्रदान करूँगा ॥ ९—११ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— हे व्यासजी ! ऐसा आश्चर्यकारक स्वप्न देखकर सहसा मैं जग गया और सोचने लगा कि मुझे परमेश्वर (गणेशजी)-के दर्शन कब होंगे ? इस प्रकार मैं देखे गये स्वप्नके कारण आनन्दरूपी सागरमें निमग्न हो गया ॥ १२-१३ ॥ तदनन्तर स्नान करके कमलपर एक पैरसे खड़े होकर भगवान् गजाननका ध्यान करते हुए मैंने बहुत दिनोंतक [उनके] परम मन्त्रका जप किया ॥ १४ ॥ जितेन्द्रिय और जिताहार रहते हुए मैंने काष्ठ और पाषाणकी भाँति स्थिर होकर दिव्य सहस्र वर्षोंतक परम महान् तप किया ॥ १५ ॥ तब मेरे मुखसे भयंकर ज्वालाएँ प्रकट हो गयीं, जिनसे समस्त प्राणी अत्यन्त दारुण कष्ट पाने लगे ॥ १६ ॥ तब भगवान् गजानन गणेशजी मेरी उस सुदृढ़ निष्ठाको देखकर और मेरी परम भक्तिसे सन्तुष्ट होकर मेरे समक्ष प्रकट हो गये ॥ १७ ॥ उनकी कान्ति करोड़ों सूर्योंके समान थी, वे ज्वालामालाओंसे व्याप्त अग्निकी भाँति तीनों लोकोंका दहन करते हुए-से प्रतीत हो रहे थे और ऐसा लगता था कि वे आकाशसे लेकर पृथ्वीतकका संहार कर देनेवाले हैं ॥ १८ ॥ वे भगवान् गजानन दिव्य मालाओंसे विभूषित थे।

[दायाँ स्तम्भ / Right Column] उन्होंने अपने हाथोंमें परशु और कमल धारण कर रखे थे। वे सम्पूर्ण पापोंका हरण करनेवाले और सम्पूर्ण सौन्दर्यराशिके कोशस्वरूप थे। श्रेष्ठ गजराजके मुखके सदृश उनके मुखकी शोभा थी। वे भक्तजनोंकी मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाले तथा देवताओं, मनुष्यों और मुनियोंकी विघ्न-बाधाओंका एकमात्र नाश करनेवाले थे ॥ १९ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ व्यासजी ! उस तेजसमूहको देखकर मैं काँप उठा था, मेरा जप छूट गया और मैं व्याकुलचित्त होकर महान् चिन्तामें पड़ गया ॥ २० ॥ [उस समय] मेरी आँखें मुँद गयीं, स्मृति विलीन हो गयी। [तब] मेरी ऐसी अवस्थाको देखकर विघ्नराज गणेशजीने शीघ्र ही कहा— ॥ २१ ॥ गणेशजी बोले—हे लोकपितामह ! भय न करो; जिसने तुम्हें स्वप्नमें मंगलमय एकाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया था, वही मैं तुम्हारे समक्ष उपस्थित हूँ ॥ २२ ॥ उस मन्त्रके प्रभावसे तुम्हें सिद्धिकी प्राप्ति हो गयी है, अतः मैं तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आया हूँ। सम्प्रति मैं सौम्य भावको प्राप्त हुआ हूँ, अतः हे सुव्रत ! तुम वर माँगो ॥ २३ ॥ मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम्हारे हृदयमें जो भी इच्छा वर्तमान है, वह सब मैं तुम्हें दूँगा। मेरे प्रसन्न होनेसे वे सब [कामनाएँ] पूर्ण हो जायेंगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ २४ ॥ [भृगु] मुनि बोले—[हे राजा सोमकान्त !] गणनायक गणेशजीके इस प्रकारके परम विशुद्ध वचनोंको सुनकर और उन्हें अपने सम्मुख देखकर ब्रह्माजी अत्यन्त हर्षित हुए और उन चराचरके गुरु गणेशजीको अपने सभी (चारों) सिरोंको झुकाते हुए प्रणामकर प्रसन्न हृदयसे कहा कि 'आज मेरा जन्म सफल हो गया है' ॥ २५ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे प्रभो !] जो वेदों, शास्त्रों, ज्ञानियों, योगियों और समस्त उपनिषदोंको भी कभी दृष्टिगोचर नहीं होते; जो अनादिनिधन (जन्म-मृत्युसे परे), अनन्त, अप्रमेय (प्रमेयों और प्रमाणोंसे परे) और निर्गुण हैं, वे भगवान् गणेश मेरे [न जाने किन] पुण्यसमूहोंके