श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कारण मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दे रहे हैं॥ २६-२७॥ हे देवेश ! हे विघ्नेश ! हे करुणाकर ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो अपनी दृढ़ भक्ति मुझे प्रदान करें, जिससे दुःख हमारा स्पर्श भी न कर सकें ॥ २८ ॥ हे प्रभो ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो मुझे विविध प्रकारकी सृष्टि कर सकनेकी सामर्थ्य प्रदान करें और [मेरे इस कार्यमें आनेवाली] विघ्न-बाधाएँ शान्त हो जायँ ॥ २९ ॥ मेरे स्मरण करनेमात्रसे आप सदा मेरे कार्योंको सम्पन्न कर दें, मुझे विमल ज्ञान प्रदान करें और अन्तकालमें मुझे स्थिर मुक्ति प्राप्त हो ॥ ३० ॥ श्रीगजानन (गणेशजी) बोले- [हे ब्रह्मन् !] 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) तुम विविध प्रकारकी विपुल सृष्टि करोगे। मेरा स्मरण करनेसे तुम्हारी सारी विघ्न- बाधाएँ सर्वथा नष्ट हो जायेंगी ॥ ३१ ॥ मेरी कृपासे तुम्हें दृढ़ भक्ति और शुभ ज्ञान प्राप्त होगा। हे चतुर्मुख ब्रह्माजी! तुम शंकारहित होकर सारे कार्योंको करो ॥ ३२ ॥ [भृगु] मुनि बोले- [हे राजन्!] इस प्रकार उन प्रभुसे वर प्राप्तकर ब्रह्माजीने उनका पूजन किया। देवाधिदेव गणेशजीकी कृपासे उनके पूजनार्थ ब्रह्माजीने मनमें जिन-जिन वस्तुओंका चिन्तन किया, वे-वे वस्तुएँ उनके सम्मुख उपस्थित हो गयीं। दक्षिणाके अवसरपर [सिद्धि-बुद्धि नामक] दो कन्याएँ उनके सामने उपस्थित हो गयीं। वे दोनों सुन्दर नेत्रों और प्रसन्नतापूर्ण सुन्दर मुखसे सुशोभित थीं। उनका श्रीविग्रह अनेक रत्नोंसे जटिल नानाविध अलंकारोंसे शोभायमान था॥ ३३-३५॥ दिव्य गन्धसे युक्त तथा दिव्य वस्त्र और मालाओंसे विभूषित उन कन्याओंको गणेशजीके लिये दक्षिणाके रूपमें कमलयोनि ब्रह्माजीने प्रस्तुत किया ॥ ३६ ॥ कदलीगर्भसम्भूत कर्पूरसे [ब्रह्माजीने] गणेशजीका नीराजनकर उनको दिव्य पुष्पोंसे पुष्पांजलि दी और सहस्र नामोंसे उनका स्तवनकर उनकी परिक्रमा की ॥ ३७ ॥ तब ब्रह्माजीने प्रार्थना की कि हे वन्दनीय ! आप दीनोंका कल्याण करनेवाले हों। इस प्रकार उन परमेष्ठी ब्रह्माजीसे सम्यक् रूपसे पूजित हुए विघ्नहर्ता भगवान् गजानन गणेशजी सिद्धि-बुद्धिको लेकर अन्तर्धान हो गये ॥ ३८-३९ ॥ तदनन्तर परमेश्वरकी कृपा और आज्ञासे प्रसन्न (निर्मल) बुद्धिवाले ब्रह्माजीने पूर्वकी भाँति सृष्टिका विस्तार किया ॥ ४० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें गजाननकी आराधनाका वर्णन' नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥ ❖ सोलहवाँ अध्याय सृष्टि-वर्णन, मधु-कैटभकी उत्पत्ति और ब्रह्माजीद्वारा उनके वधहेतु योगनिद्रा देवीकी प्रार्थना करना राजा [सोमकान्त ] बोले- हे ब्रह्मर्षि ! भगवान् गणेशकी कथा सुनकर मनमें हर्ष हो रहा है। इस कथारूपी अमृतसे मैं तृप्त नहीं हो रहा हूँ, अतः आप इसे पुनः कहें ॥ १॥ हे प्रभो ! परमात्मा भगवान् गणेशके अन्तर्धान हो जानेपर ब्रह्माजीने किस प्रकार सृष्टि की, इसका आप वर्णन करें ॥ २ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! आगे ब्रह्माजीने व्यासजीके प्रति जो आख्यान कहा, उसे मैं विस्तारसे सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥ भृगुजी बोले- [हे राजन्!] प्रभु ब्रह्माजीने व्यासजीके प्रति जो सिद्धक्षेत्रका माहात्म्य कहा तथा जो सृष्टिकी रचना की, उसे मैं तुमसे क्रमशः कहूँगा ॥ ४ ॥ उन ब्रह्माजीने सर्वप्रथम सात मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया और उनसे कहा कि सृष्टिकार्यमें सहायता करते