श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०१४ ] * सृष्टि करते समय विघ्नोंद्वारा बाधित ब्रह्माजीका भगवान् गणेशकी प्रार्थना करना * ६९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बात ही क्या है!॥ ४२ ॥ | जानेपर अनन्त ऐश्वर्यसम्पन्न गजानन [श्रीगणेशजी]-ने हे देवेश्वर! मैंने आपके उदरमें नाना प्रकारके | खिन्न मनःस्थितिवाले मुझ [ब्रह्मा]-को अपने नासिका- प्राणियों और पदार्थोंसे समन्वित ब्रह्माण्डसमूहोंको देखा। | छिद्रके मार्गसे बाहर निकाल दिया। मेरे अनुयायी श्रीहरि मैं यहाँ स्थिर रहनेमें या यहाँसे अन्यत्र बहिर्गमन करनेमें | और उनके साथ स्थित तमोगुणवाले भगवान् हर भी समर्थ नहीं हूँ; अतः मैं आपके अतिरिक्त किसी अन्य | (शिव)-इन दोनोंको प्रभु गजाननने अपने कर्णछिद्रोंसे देवताकी शरणमें नहीं जाता हूँ॥ ४३ ॥ | बाहर निकाला। वे दोनों—हरि और हर उनके शरीरमें [हे व्यासजी!] मेरे द्वारा इस प्रकार स्तुति किये | सुखपूर्वक शयन कर रहे थे॥ ४४-४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'ब्रह्मस्तुति-वर्णन' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥
चौदहवाँ अध्याय सृष्टि करते समय विघ्नोंद्वारा बाधित ब्रह्माजीका भगवान् गणेशकी प्रार्थना करना राजा [सोमकान्त] बोले-[हे मुनिश्रेष्ठ!] | सुनकर ब्रह्माजी काँपने लगे ॥ ६-८ ॥ तब सहस्रों ब्रह्माण्डोंको देखनेके बाद ब्रह्माजीने क्या | उनमेंसे कुछने उनपर मुक्कोंसे प्रहार किया, कुछने किया ? उन्होंने गजानन (गणेशजी)-से आज्ञा प्राप्तकर | झुककर उन्हें प्रणाम किया, कुछने उनकी स्तुति की और किस प्रकार सृष्टि की ? ॥ १ ॥ | कुछने आदरपूर्वक उनकी चारों शिखाओंको हिलाया। भृगुजी बोले-[हे राजन्! सृष्टिकी रचनाके | कुछ उनके चार मुखोंकी हँसी उड़ा रहे थे। कुछ उनकी लिये उद्यत] ब्रह्माजी अपने विषयमें ऐसा विचार करते | निन्दा, तो कुछ प्रशंसा और कुछ उनकी सेवा कर रहे हुए गर्वसे भर गये कि मैं वेदों, पुराणों, शास्त्रों और | थे। कुछने उन्हें बाँध दिया, तो कुछने उन्हें खोल दिया। आगमोंका भी ज्ञाता हूँ। मैं ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न और | तत्पश्चात् कुछ उन्हें इधर-उधर खींचने लगे। उनमेंसे शाप देने अथवा अनुग्रह करनेमें समर्थ हूँ। मैंने अनेक ब्रह्माण्डों | कुछने उनका आलिंगन किया, तो कुछ अन्यने उन्हें और सृष्टिकी रचनाओंको देखा है। इस समय मैं सृष्टि | शिशुकी भाँति चूम लिया। एक आठ हाथवाले [विघ्न]- करनेमें किसी भी प्रकार असमर्थ नहीं हूँ॥ २-३ १/२ ॥ | ने उनकी आठों मूछोंको पकड़ लिया और नाचने हे राजन्! इस प्रकार जब सृष्टि करनेमें पूर्णतया | लगा ॥ ९-१२ ॥ समर्थ कमलोद्भव ब्रह्माजी सृष्टि करने लगे तो वहाँ | इस प्रकार परवश हुए ब्रह्माजी चिन्ता और शोकसे अनेक प्रकारके सहस्रों विघ्न उत्पन्न हो गये ॥ ४ १/२ ॥ | युक्त हो गये। उन्होंने स्वयंके सृष्टिकर्ता होनेका जो उन अत्यन्त भयंकर विघ्नोंने ब्रह्माजीको उसी | हृदयमें स्थित महान् गर्व था, उसे त्याग दिया। वे अपने प्रकार घेर लिया, जैसे पुष्परसका पानकर मत्त हुए भ्रमर | जीवनके प्रति निराश होकर महान् मूर्च्छाको प्राप्त हो मधुके छत्तेको घेर लेते हैं ॥ ५ १/२ ॥ | गये। तत्पश्चात् एक मुहूर्त बीतनेपर सचेत होकर उन्होंने वे विघ्न तीन नेत्रोंवाले, पाँच हाथोंवाले, कुएँ-जैसे | सर्वत्र व्यापक गणेशजीका मानसिक स्मरण किया और मुखवाले, सात हाथोंवाले, तीन पैरोंवाले, पाँच थूथूनोंवाले, | करुण स्वरसे रोते हुएके सदृश ब्रह्माने गजानन गणेशजीकी सात थूथूनोंवाले, छः पैरोंवाले, दस मुखोंवाले, पाँच | प्रार्थना की ॥ १३-१४ ॥ पैरोंवाले, ताड़-सदृश बड़े दाँतोंवाले, भेड़ियोंके-से पेटवाले, | ब्रह्माजी बोले-[हे प्रभो!] अनेक प्रकारके अनेक रूपोंवाले और महान् बलशाली थे; उनकी गणना | प्राणियोंकी सृष्टि करनेमें संलग्न मनवाले मुझ ब्रह्माकी नहीं की जा सकती थी। उनके अनेक प्रकारके कोलाहलको | आयु स्वल्प नहीं है, अर्थात् मैं बड़ी आयुवाला हो चुका