भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 656 में से

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पृष्ठ 54

५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

प्राप्त हुई थी, उसमें उसी प्रकार मन लगाया ॥ ९ ॥ ऋषियोंने कहा- [हे सूतजी !] राजा सोमकान्त कैसे और किस वनको गये ? उनके सहायक कौन थे और [वहाँ जाकर] उन्होंने क्या कार्य किया ? - यह सब आप हमें विस्तारपूर्वक बतायें ॥ १० ॥ सूतजी बोले- हे निष्पाप ऋषियो ! सोमकान्त जिस प्रकार वनको गये और वहाँ जो कार्य किया, अब मैं उसे आप सबसे कहूँगा, उसे आदरपूर्वक सुनिये ॥ ११ ॥ [राजाने] सुबल और ज्ञानगम्य नामक दो मन्त्रियों और धर्मपत्नी सुधर्माके साथ दुर्गम वनमें प्रवेश किया ॥ १२ ॥ आगे-आगे मन्त्री, मध्यमें राजा और उनके पीछे उनकी धर्मपत्नी सुधर्मा वैसे ही चल रही थी, जैसे रामके पीछे सीता [वनको गयी थीं] ॥ १३ ॥ वे चारों समान मनवाले, सुख-दुःखमें समान भाव रखते हुए एक बार ही भोजन करते, वनमें ही निवास करते और एक वनसे दूसरे वनको जाते थे ॥ १४ ॥ ऊँचे-नीचे रास्तोंपर चलनेके कारण भूख-प्यास और थकानसे अत्यन्त पीड़ित होनेपर छायाका आश्रय लेकर वे कभी बैठ जाते थे ॥ १५ ॥ पुनः दूसरे वनमें जानेपर उन्होंने एक विशाल सरोवर देखा, जिसमें कछुओंसहित हाथीके समान [विशाल] मगरमच्छ दिखायी दे रहे थे ॥ १६ ॥ वह चारों ओरसे ताल (ताड़), तमाल (एक काली छालवाला वृक्ष), सरल (चीड़), प्रियाल (अंगूरोंकी बेल), मंगलकारी बकुल (मौलसिरी), रसाल (आम), पनस (कटहल), जम्बू (जामुन), निम्ब (नीम), अश्वत्थ (पीपल), वट (बरगद) आदिके वृक्षों और अनेक प्रकारके लताजालोंसे घिरा था, [जिसके कारण] वहाँ ऐसा घना अन्धकार व्याप्त था, जैसा कि पर्वतकी गुफामें रहता है ॥ १७-१८ ॥ वहाँकी वायु कमल और कदम्बके पुष्पोंकी सुगन्धसे सुगन्धित और स्पर्शमें सुखद थी, वहाँसे मुनिजन फूल और फल ले जाते थे ॥ १९ ॥ वहाँ हंस, बगुले, बाज, तोते, कौवे, कोयल, मैना और चकवा पक्षी अनेक प्रकारके शब्द कर रहे थे ॥ २० ॥ हे श्रेष्ठ द्विजगण ! वहाँ अनेक प्रकारकी लताओं और पुष्पोंके कुंजोंका आश्रय लेनेवालोंको सूर्य और चन्द्रमाकी किरणें भी स्पर्श नहीं कर पाती थीं। वहाँ भूख-प्यास और मृत्युका भय वैसे ही नहीं था, जैसे पुण्यात्माओंको स्वर्गमें नहीं रहता ॥ २१ ॥ वहाँ जाकर उन सबने श्रमापहारी शीतल जलका पान किया और स्नान एवं नित्य क्रिया करके फलाहार किया। तदनन्तर राजा कोमल बालुकामय तट-प्रदेशमें सो गये और उनकी धर्मपत्नी सुधर्मा उनके पैर दबाने लगीं ॥ २२-२३ ॥ राजाका अभिप्राय समझकर दोनों मन्त्री कन्द, मूल, फल और कमल-नाल लाने चले गये ॥ २४ ॥ तब वहाँ सुधर्माने एक अद्भुत बालकको देखा, जो अपनी कान्तिसे देदीप्यमान हो रहा था। [उस समय सुधर्माने] उस उत्कृष्ट रूपवाले बालकको [देख करके] यही माना कि कामदेव ही इस बालकके रूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ २५ ॥ उस बालकको देखकर ही वह सुधर्मा हर्षित हो गयी और उसने उसे [अपना] हितकारी माना। क्षुब्ध या प्रसन्न हृदय स्वयं ही समीक्षा करके बता देता है कि कौन अपकारी है और कौन उपकारी ॥ २६ ॥ [तब सुधर्माने] उस बालकसे पूछा कि बताओ तुम कौन हो? कहाँ जा रहे हो? किसके पुत्र हो और तुम्हारी माता कौन है? अपने शब्दोंकी अमृतधारासे मित्रकी भाँति मेरे दोनों कानोंको शीघ्र सन्तुष्ट करो ॥ २७ ॥ सूतजी बोले- ऐसा पूछनेपर उस बालकने राजपुत्री (सुधर्मा)-को अमृतमयी वाणीमें उत्तर देते हुए कहा- हे भामिनि ! महर्षि भृगु मेरे पिता हैं और पुलोमा मेरी माता। जल लेनेकी इच्छासे मैं अपने घरसे यहाँ आया हूँ ॥ २८ ॥ हे शुभे ! मेरा नाम च्यवन है और मैं पिताका आज्ञाकारी हूँ; तुम कौन हो और ये तुम्हारे कौन हैं? तथा इस वनमें क्यों आये हैं? ॥ २९ ॥ इनके अंगोंसे वर्षाकालके पर्वतकी भाँति स्राव क्यों हो रहा है? किस कर्मके कारण इनके शरीरसे इतनी दुर्गन्ध आ रही है - यह बतलाओ ॥ ३० ॥