भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 656 में से

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पृष्ठ 53

उ०ख०-अ०५] * सुधर्मा-च्यवन-संवाद * ५१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पहले ही तुम्हें उत्तम नीतिशास्त्रके सहित धर्मशास्त्रका | या गाड़े गये धनमें ही स्थित रहता है, वैसे ही वनमें चले उपदेश किया है। तुम्हें उस मंगलमय उपदेशको व्यर्थ | जानेपर भी मेरा मन तुम्हींमें लगा रहेगा। दैवयोगसे यदि नहीं करना चाहिये॥ २९ ॥ | [ मेरा कुष्ठ रोग दूर हो गया और] मैं सुन्दर शरीरवाला ऐसा सुना जाता है कि पूर्वकालमें नीतिज्ञ और परम | हो गया, तो पुनः घरको लौट आऊँगा ॥ ३३-३४ ॥ बुद्धिमान् जमदग्निनन्दन परशुरामने पिताके कहनेपर | मेरी आज्ञाका पालन करनेसे जैसा तुम्हें धर्मलाभ माताको मार डाला था ॥ ३० ॥ | होगा, वैसा मेरे साथ चलनेसे नहीं, इसलिये तुम [पिताकी आज्ञासे ही] श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मणके | [नगरको] जाओ और मैं भी [वनको] जाता हूँ॥ ३५ ॥ साथ राज्य छोड़कर वन चले गये और [ पितृसदृश | सूतजी बोले-तब मन्त्रियों, नगरके निवासियों ज्येष्ठ भ्राताकी आज्ञासे ही] बिना कारण पूछे लक्ष्मण | और पुत्र (हेमकण्ठ)-ने महान् कष्टके साथ वापस सीताको वनमें छोड़ आये थे॥ ३१ ॥ | लौटनेका मन बनाकर राजाको नमस्कार किया। राजाने इसलिये हे हेमकण्ठ! तुम तीनों मन्त्रियोंके साथ | भी आशीर्वाद एवं अभिनन्दनपूर्वक लौटनेका आदेश शीघ्र ही नगरको जाओ और मेरी आज्ञाका पालन करते | दिया और सब लोग राजाकी प्रदक्षिणाकर नगरके लिये हुए मेरे द्वारा प्रदान किये गये राज्यका शासन करो ॥ ३२ ॥ | निकल पड़े ॥ ३६-३७ ॥ जैसे परमात्मतत्त्वके विद्वान् व्यक्तिका चित्त उसके | तब छत्र और ध्वजसे सुशोभित माननीय हेमकण्ठने लौकिक कार्योंमें लगे रहनेपर भी परमात्मामें ही संलग्न | गज-अश्व-रथ और पैदल सैनिकोंसे युक्त महान् सेनाको रहता है, जैसे सामान्य जनोंका चित्त अपने द्वारा रखे गये | आगे करके नगरको प्रस्थान किया ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'हेमकण्ठपुरप्रवेशन' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥ पाँचवाँ अध्याय सुधर्मा-च्यवन-संवाद सूतजी बोले- [हेमकण्ठने] तत्पश्चात् (राजासे | मैं पातिव्रत धर्मके कारण पराधीन हूँ ॥ ४-५ ॥ विदा लेकर) माताके पास आकर स्नेहसे व्याकुल | सूतजी बोले-ऐसा सुनकर पुत्र हेमकण्ठने अपने बुद्धिसे उससे कहा कि हे माता ! मुझ निरपराधका त्याग | सुहृज्जनोंके साथ माताको प्रणाम किया और उनकी आप कैसे कर रही हैं ? ॥ १ ॥ | प्रदक्षिणा करके और उनकी आज्ञा प्राप्तकर नगरको पुत्र (हेमकण्ठ)-ने कहा-'यह पुत्र भी हमारे | प्रस्थान किया ॥ ६ ॥ साथ चले'- ऐसा आपको पिताजीसे कहना चाहिये। | उस समय वह नगर इन्द्रके नगर अर्थात् स्वर्गलोककी यदि आपके अनुरोधपर वे मुझे साथ ले चलेंगे, तब मैं | भाँति नागरिकोंद्वारा ध्वजाओं, पताकाओं और पल्लवोंसे आप दोनोंकी सेवा करूँगा, मेरी बुद्धि राज्य करनेमें नहीं | अलंकृत किया गया था और उसके मार्गोंको सुगन्धित है। वह राज्य मुझे क्या सुख देगा, जो आप दोनोंसे रहित | द्रव्य आदिसे सींचा गया था ॥ ७॥ हो ! ॥ २-३ ॥ | [तदनन्तर] राजाने स्वजनोंको वस्त्र और पान सुधर्माने कहा-हे महाबाहु ! दुःख और शोकसे | देकर विदा किया और अपने ऐश्वर्यसम्पन्न भवनमें प्रवेश युक्त राजा इस समय मेरी बात नहीं मानेंगे। इसलिये मेरी | किया; उस समय उसे हर्ष और शोक दोनों था ॥ ८ ॥ आज्ञासे तुम [नगरको] जाओ। पुत्र! स्त्रियोंके लिये | [उसने] प्रजाका पुत्रवत् पालन करते हुए धर्मपूर्वक पतिके अतिरिक्त अन्य कोई देवता मान्य नहीं होता और | राज्य किया और धर्म-अर्थ-काम-मोक्षकी जैसी शिक्षा