श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मन्त्रियों और नगरके लोगोंने भी दुखी होकर राजाको रोका। दो गव्यूति* (चार कोस) जानेके बाद श्रमित होकर राजा रुक गये॥ ८॥ [वहाँ] उन्होंने अनेक वृक्षोंसे घिरी हुई और शीतल जलसे सम्पन्न वापी (बावड़ी)-को देखकर सभी नागरिकों, मन्त्रियों और स्वजनोंसे कहा— ॥ ९॥ हे सज्जनो! दीर्घकालतक राज्य करते हुए मैंने जो अपराध किये हों, उनके लिये आप लोग [मुझे] क्षमा करें; मैं आप लोगोंको हाथ जोड़कर नमस्कार करता हूँ॥ १०॥ मैं आप सबसे निवेदन करता हूँ कि दैववश मुझे यह जो [रोग] प्राप्त हो गया है, इससे मेरे प्रति आप लोग अपने स्नेहको कम न करियेगा और मेरे पुत्रपर अपनी कृपा बनाये रखियेगा॥ ११॥ आप सभी आये हुए लोग स्त्रियों और वृद्धोंसहित नगरको वापस जायँ और मेरे पुत्रद्वारा पालित होते हुए दुःखरहित होकर निवास करें॥ १२॥ मैं प्रसन्न चित्तसे वन जाऊँ, इसके लिये आप सब लोग अनुज्ञा प्रदान करें [और घर लौट जायँ]। आप लोगोंके जानेके बाद ही मेरा मन शान्त हो सकेगा॥ १३॥ [अतः] आप लोग मेरे ऊपर यह महान् उपकार करनेकी कृपा करें; मैं दुखी हूँ, मरनेकी इच्छा करता हूँ, पर निष्ठुर वचन बोलनेका मुझमें उत्साह नहीं है॥ १४॥ मेरा यह जन्म-जन्मान्तरमें अर्जित किया गया महान् पाप ही है, जिसके कारण मुझे राज्यके हितैषी प्रजाजनोंसे वियोग हो रहा है; परंतु मैं क्या करूँ? मैं तो गलित कुष्ठसे पीड़ित हूँ। सभीको अपने किये सुकृत (पुण्यकर्मों) और दुष्कृत (पापकर्मों)-का फल भोगना ही पड़ता है॥ १५-१६॥ सूतजी बोले—राजाकी इस प्रकारकी बात सुनकर उनके सुहृज्जन मूर्च्छित हो गये, कुछ लोग अत्यन्त दुखी होकर अपने हाथोंसे अपना सिर पीटने लगे। उनमेंसे जो कुछ विद्वान् लोग थे, वे पूर्वकालमें उत्पन्न हुए राजाओंके चरितोंकी चर्चाकर राजाको और परस्पर [एक-दूसरेको भी] सान्त्वना देने लगे॥ १७-१८॥ उस स्थितिको देखकर कुछ अन्य लोग अनिर्वचनीय अवस्थाको उसी प्रकार पहुँच गये, जैसे आत्मस्वरूपका ज्ञान होनेपर ज्ञानवृत्तिवाले योगी॥ १९॥ कुछ धैर्यशाली लोगोंने अपने दुःखका नियमन करके वन जानेको उद्यत उन दुखी राजा सोमकान्तसे इस प्रकार कहा— ॥ २०॥ लोगोंने कहा—हे प्रजावत्सल! जैसे अग्नि उष्णताका और जल शीतलताका त्याग नहीं करता, समुद्र अपनी मर्यादाका और सूर्य अपने प्रकाशकत्व गुणका त्याग नहीं करता; वैसे ही आपको हमारा पालन-पोषण करके फिर त्यागकर जाना उचित नहीं है। हम आपके बिना नगरको वापस कैसे जा सकते हैं?॥ २१-२२॥ जैसे नक्षत्रोंसे भरा होनेपर भी बिना चन्द्रमाके आकाश सुशोभित नहीं होता, वैसे ही शत्रुओंका दमन करनेवाले हे राजन् ! आपके बिना यह नगर शोभा नहीं देता ॥ २३ ॥ हे स्वामी! हम सब भी आपके साथ दो-तीन तीर्थोंकी यात्रापर चलेंगे; [हमें विश्वास है कि] तीर्थ- सेवनसे आपका रूप कान्तिमान् हो जायगा ॥ २४॥ तदनन्तर हम लोग आपके साथ महान् हर्षपूर्वक मंगलवाद्योंकी ध्वनिके साथ बन्दीजनोंको आगे करके ध्वज-पताकाओंसे सुसज्जित नगरमें आयेंगे ॥ २५॥ सूतजी बोले—इस प्रकार उनके वचनोंको सुनकर क्रोध और दुःखसे परिपूर्ण राजाने उन सबको नमस्कार करके 'ऐसा न करो, ऐसा न करो' बार-बार कहा॥ २६॥ तदनन्तर स्नेह और करुणापूर्ण भावोंसे युक्त हेमकण्ठने मन्त्रियोंके साथ पुत्रवत्सल राजासे विनयपूर्वक निवेदन किया— ॥ २७॥ पुत्र (हेमकण्ठ)-ने कहा—मैं आपके बिना [नगरमें] जाने, राज्य करने और जीवित रहनेमें भी उत्साह नहीं रखता हूँ। मैंने इससे पूर्व कभी आपका वियोग नहीं देखा है, तो फिर उसे कैसे सहन करूँ?॥ २८॥ राजा (सोमकान्त)-ने कहा—इसीलिये मैंने
- गव्यूतिः स्त्री क्रोशयुगम्। (अमरकोश २। १। १८)