भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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उ०ख०-अ०६ ] * राजा सोमकान्तका भृगुमुनिके आश्रममें जाना * ५३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तुम स्वयं अत्यन्त सुन्दरी, सुकुमारी और सुन्दर | यहाँ राक्षस, प्रेत, भूत और अनेक प्रकारके पशु- नेत्रोंवाली होकर भी कीड़ोंसे भरे शरीरवाले इनकी सेवा | पक्षी हमें भयभीत करते रहते हैं, पर न जाने क्यों वे हमें कैसे करती हो ? ॥ ३१ ॥ | खाते नहीं हैं ? ॥ ४१ ॥ तुम सुन्दर और प्रसन्न मुखवाली तथा समस्त | न जाने वे आगे दुःख भोगनेके लिये ही हमें बनाये अंगोंसे सुन्दर एवं शोभनीय हो; क्या तुम्हारे पिता, | रखेंगे, मैं अपने पापकर्मजनित दुःखोंका अन्त नहीं देख सुहृज्जनों, भाइयों और [पुरोहित आदि] द्विजोंको विवाहसे | पा रही हूँ ॥ ४२ ॥ पूर्व यह ज्ञात नहीं था कि वर कुष्ठ रोगसे पीड़ित और | द्विजोंसे घिरे इन राजाकी [पूर्वकालमें] कड़वे, कृमियोंसे आक्रान्त है ? आपने कैसे इनका वरण कर | तीखे, खट्टे, नमकीन, मीठे, स्निग्ध (घृतपक्व) व्यंजनोंमें लिया और इस दुर्गम वनको चली आयीं ? ॥ ३२-३३ ॥ | वैसी रुचि नहीं होती थी, जैसी कि इस समय कन्द- सूतजी बोले- उस बुद्धिमान् मुनिपुत्रके द्वारा इस | मूल और कसैले-खट्टे फलोंमें होती है ॥ ४३१/२ ॥ प्रकार पूछे जानेपर शोक और हर्षसे युक्त उस सुधर्माने | दरिद्रोंका आहार बहुत अधिक होता है और उनके सम्पूर्ण वृत्तान्त उससे कह सुनाया ॥ ३४ ॥ | द्वारा खाया हुआ भोजन पच भी जाता है, जबकि सुधर्माने कहा- सौराष्ट्रदेशमें देवपुर नामसे | श्रीसम्पन्न (ऐश्वर्यवान्) लोगोंकी शक्ति उतना भोजन विख्यात एक विशाल नगर है, वहाँ ये मेरे पति | करने और उसे पचानेकी नहीं होती ॥ ४४१/२ ॥ सोमकान्त राज्य करते थे। ये अत्यन्त सम्मान्य, दानशील, | जो [राजा] कोमल, दिव्य और मनोरम शय्यापर शूरवीर, दृढ़ पराक्रमी, असंख्य सेनासे सम्पन्न, शत्रुओंके | शयन करता था; समय विपरीत होनेपर देखिये कि वह राष्ट्रका ध्वंस करनेवाले, सौन्दर्यशाली, यज्ञशील, | आज यहाँ-वहाँ कहीं भी सो जाता है ॥ ४५१/२ ॥ ऐश्वर्यसम्पन्न, मित्रोंको आनन्द देनेवाले, सभी कार्योंके | जिसके चारों तरफ दिशाएँ अनेक प्रकारके मांगलिक विवेचक और नीतिशास्त्रके पण्डित थे ॥ ३५-३७ ॥ | सुगन्धित द्रव्योंकी सुगन्धसे व्याप्त रहती थीं, वही आज हे द्विजश्रेष्ठ ! राजाने दीर्घकालतक अपने राज्यका | मवाद, रक्त और सड़े मांसकी दुर्गन्धसे व्याप्त है ॥ ४६१/२ ॥ भोग किया, परंतु पूर्वजन्मोंके कर्म-विपाकके कारण इस | जो विद्वानोंसे घिरा हुआ आनन्दसिन्धुमें निमग्न रहता अवस्थाको प्राप्त हुए हैं, और पुत्रको राज्य देकर | था, आज वही दुःखदायी कीड़ोंसे घिरा हुआ है ॥ ४७१/२ ॥ मन्त्रिद्वयके साथ इस वनको आये हैं। मैं भी इनके पीछे- | हे भृगुनन्दन ! मेरी समझमें नहीं आ रहा कि हम पीछे चलती हुई सुबल और ज्ञानगम्य नामक मन्त्रियोंके | इस दुःखसागरको कैसे पार करेंगे? इस अगाध [दुःख]- साथ यहाँतक चली आयी। राजाकी आज्ञा लेकर वे दोनों | सागरमें डूबती हुई [हम लोगोंकी] नौकाके लिये आप फल लाने वनमें गये हैं ॥ ३८-४० ॥ | जहाज बन जाइये ॥ ४८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'सुधर्मा-च्यवन-संवादवर्णन' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥ छठा अध्याय राजा सोमकान्तका भृगुमुनिके आश्रममें जाना सूतजी बोले- सुधर्माके इस प्रकारके वचन सुनकर | भृगु बोले- हे पुत्र! तुमने ऐसी क्या अपूर्व (जो भृगुपुत्र च्यवनने त्वरापूर्वक अपना जलसे भरा कलश | पहले न देखी हो) बात देख ली है, जो चकित-से उठाया और परदुःखकातर होनेके कारण चुपचाप अपने | दिखायी दे रहे हो; तुम्हें विलम्ब क्यों हो गया—यह घरको चले गये। तब भृगुने विलम्बकर आनेवाले पुत्रसे | मुझसे बताओ ॥ ३ ॥ पूछा-१-२ ॥ | पुत्र बोला- हे मुने! सौराष्ट्रदेशमें देवपुर नामसे