श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- विख्यात एक नगर है, वहाँ कमलके समान नेत्रवाला सोमकान्त नामका प्रसिद्ध राजा था। उसने बहुत समयतक धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए राज्य किया, परंतु दैववश वह दुर्भाग्यको प्राप्त हो गया। हे पिता! वह अपने पुत्रको राज्य देकर पतिकी आज्ञा माननेवाली अपनी पत्नी सुधर्मा और दो मन्त्रियों- सुबल और ज्ञानगम्यके साथ यहाँ आया है। गलित कुष्ठसे पीड़ित और कीड़ोंसे युक्त वह राजा भ्रमण करते हुए दुर्गम सरोवरतक आया है, वह ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे गौतममुनिद्वारा शापित सहस्र भगसे युक्त इन्द्र हो ॥ ४-७॥ कहाँ सुन्दर अंगोंवाली वह सुधर्मा और कहाँ उसका गलित कुष्ठसे पीड़ित पति ! इसी वृत्तान्तको उससे पूछनेपर मेरा कुछ समय बीत गया था ॥ ८ ॥ उसके करुणापूर्ण वचनोंसे मेरा चित्त द्रवीभूत हो गया, तब मैं शीघ्र ही कलश भरकर चला आया ॥ ९ ॥ सूतजी बोले- [इस प्रकार ] उस (सुधर्मा) ने जो कुछ कहा था, वह सब उसने उनसे (भृगुजीसे) कह दिया। उसे सुनकर पुत्र च्यवनसे भृगुने पुनः कहा- ॥ १० ॥ भृगु बोले- हे पुत्र ! दूसरोंका उपकार करनेवाले लोग तो स्वयं संसारमें विख्यात होते हैं। [वे] महाराज सोमकान्त धर्मनिष्ठ, पूज्य और सम्मान्य हैं, अतः उनको ले आओ। मेरी आज्ञासे तुम जाओ और उन सबको शीघ्र ले आओ, मैं उनकी आश्चर्यजनक स्थितिको देखूँगा और उन्हें भी अपना [तपोजेनित कौतुक ] दिखाऊँगा ॥ ११-१२॥ सूतजी बोले-पिताके द्वारा इस प्रकार प्रेरित किये जानेपर सुधर्माको देखनेके लिये उत्सुक करुणानिधि च्यवन शीघ्रतापूर्वक वहाँ सरोवरके पास गये ॥ १३ ॥ उसी समय सुबल और ज्ञानगम्य नामवाले दोनों अमात्य भी फल और कन्दका भार लिये हुए राजाके समीप आ गये ॥ १४ ॥ तदनन्तर उन मुनिपुत्र च्यवनने सुन्दर नेत्रोंवाली सुधर्मासे कहा- हे सुव्रते ! मेरे पिता आप सबको अपने आश्रमपर बुला रहे हैं ॥ १५ ॥ तब उन (मुनि च्यवन)- का इस प्रकारका वचन सुनकर दुःखसे व्याकुल सुधर्मा वैसे ही सावधान हो गयी, मानो शरीरमें प्राण आ गये हों ॥ १६ ॥ तब उनके वचनामृतका पान करके सुन्दर अंगोंवाली और शीलसम्पन्न राजपत्नी सुधर्मा दोनों मन्त्रियों और पति राजा सोमकान्तके साथ मुनिपुत्रको आगे करके चली। उस समय मार्गके मध्यमें उसकी ऐसी शोभा हो रही थी, जैसे बृहस्पतिको आगे करके शिवा (पार्वतीजी) गणेश और स्कन्दसहित शिवके साथ जा रही हों। इस प्रकार वे वेदमन्त्रोंके उच्च स्वरसे ध्वनित भृगुजीके आश्रम-मण्डलमें पहुँचीं ॥ १७-१९ ॥ [वह आश्रम] अनेक प्रकारकी पुष्पलताओंस आच्छादित और अनेक प्रकारके पक्षियोंके कलरवसे निनादित था। वहाँ बिलाव, बगुले, बाज, हाथी, गाय, मोर, सर्प, पक्षी, सिंह और व्याघ्र क्रीड़ा कर रहे थे। वहाँ न हवा तेज चलती थी, न ही सूर्य अधिक तपते थे और न बादल ही अधिक वर्षा करते थे, अपितु उन मुनिकी इच्छानुसार ही वर्षा करते थे—ऐसे आश्रममें मुनिपुत्रको आगे करके उन सबने प्रवेश किया ॥ २०-२२ ॥ वहाँ उन्होंने व्याघ्रचर्मपर विराजमान उन सूर्यसदृश अद्भुत स्वरूपवाले तेजस्वी भृगुमुनिको देखा। तब राजा सोमकान्त, उनकी पत्नी सुधर्मा और दोनों मन्त्रियोंने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया तथा राजाने कहा- ॥ २३ ॥ राजा बोले - हे द्विजेन्द्र ! आज मुझे ब्राह्मणोंद्वारा दिये गये आशीष, मेरा धर्म और मेरी तपस्या भी सुफल हो गयी है, मैं आजन्म पवित्र हो गया हूँ और मेरे जननी-जनकका भी जीवन सुजीवन हो गया है ॥ २४ ॥ मेरे पूर्वार्जित पुण्योंके समूहसे इस समय आपका दर्शन हुआ है, जिससे [अतीत तथा वर्तमानके] पापोंका नाश हो गया। हे मुनीन्द्र ! इससे मेरा भविष्य भी कल्याणमय हो गया है। इस प्रकार आपका दर्शन तीनों कालोंमें मेरे जन्मको पवित्र बना रहा है ॥ २५ ॥ हे अमोघ दर्शनवाले मुनीन्द्र ! मैं सौराष्ट्रदेशमें देवपुर [नामक नगर]-में नीतिपूर्वक, पापोंसे डरते हुए और ब्राह्मणों एवं देवताओंकी पूजा करते हुए राज्य करता था। अकस्मात् मेरा यह कौन-सा उग्रतर और अन्तहीन पाप उदित हो गया, जिससे कि मैं इस