श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०७ ] * भृगुमुनिके द्वारा राजा सोमकान्तके पूर्वजन्मका वर्णन * ५५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दुर्दशाको प्राप्त हो गया? मैं इसका किंचित् प्रतिकार भी | जिसके कारण तुम इस अवस्थाको पहुँच गये हो—वह नहीं जानता हूँ॥ २६-२७॥ | भी मैं बताऊँगा ॥ ३१॥ मेरे द्वारा किये जानेवाले उपाय भी अपाय | [आप] सब लोग बहुत समयसे भूखे हैं, अतः (अनिष्टकारक) हो जाते हैं, लेकिन आपद्वारा किया | भोजन करें। एक वनसे दूसरे वनको जाते रहनेके कारण गया उपाय, उपाय ही होगा—ऐसा मुझे लगता है; | [आप सब] बहुत अधिक थक गये हैं और आप सबके क्योंकि आपके आश्रममें रहनेवाले जन्मजात वैरी भी | मुख कान्तिहीन हो गये हैं ॥ ३२ ॥ निर्वैर हो जाते हैं। मैं आपके शरणागत हूँ ॥ २८ ॥ | सूतजी बोले—ऐसा कहकर [मुनिने] पहले सूतजी बोले—उन (राजा)-के इस प्रकारके | उनकी उत्तम तेलसे मालिश करवायी, फिर स्नान वचन सुनकर सद्व्रतोंका आचरण करनेवाले भृगुमुनि | करवाया, तत्पश्चात् षड्रसोंसे युक्त अनेक प्रकारके करुणामुक्त होकर ध्यानपूर्वक अवलोकनकर राजा | व्यंजनोंका भोजन करवाया ॥ ३३॥ सोमकान्तसे बोले— ॥ २९ ॥ | थके हुए उन लोगोंने भी अमित तेजस्वी मुनिश्रेष्ठ भृगु बोले—हे राजन्! मैं उपाय बताता हूँ, तुम्हें | भृगुकी आज्ञा पाकर सम्यक् रूपसे स्नानादिपूर्वक अलंकृत चिन्ता करना उचित नहीं है। मेरे आश्रममें आनेवाले | होकर भोजन किया। तत्पश्चात् दुर्जय चिन्ताका त्यागकर प्राणी दुःख नहीं पाते हैं ॥ ३० ॥ | मुनिद्वारा परिकल्पित कोमल शय्याओंपर वे सब इस प्रकार हे नृपश्रेष्ठ ! जन्मान्तरमें जो तुमने पाप किया है, | सो गये, मानो अपने राज्यमें पहुँच गये हों ॥ ३४-३५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'भृगु-आश्रमगमनवर्णन' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥ सातवाँ अध्याय भृगुमुनिके द्वारा राजा सोमकान्तके पूर्वजन्मका वर्णन ऋषियोंने कहा—[हे सूतजी!] तब राजा सोमकान्तने | उत्तर नहीं देता—वे दोनों इस लोकमें गूँगे और बहरे होते वहाँ जाकर क्या किया और सर्वज्ञ भृगुमुनिने उन्हें क्या | देखे गये हैं। इसलिये हे श्रेष्ठ द्विजगण! मैं [राजा] उपाय बताया ? ॥ १ ॥ | सोमकान्तकी कथा कहूँगा, आप लोग सुनें— ॥ ३-५ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ! आप हम श्रोताओंके समक्ष इस | उस रात्रिके बीत जाने और दिवसाधिपति सूर्यके कथाको कहिये; क्योंकि आपके वचनामृतका पान करके | उदित होनेके बाद स्नान, सन्ध्या, जप, हवन आदि करके हम तृप्तितक नहीं पहुँच रहे हैं अर्थात् तृप्त नहीं हो पा | उन भृगुश्रेष्ठने पत्नी और मन्त्रियोंसहित स्नान और जप रहे हैं ॥ २ ॥ | कर चुके राजा सोमकान्तसे उनके पूर्वजन्मकी कथा सूतजी बोले—हे महाभाग [ऋषियो !] आपने | कहना आरम्भ किया ॥ ६-७ ॥ उचित प्रश्न किया है। आप लोग तो स्वयं ही ज्ञानके | भृगुजी बोले—विन्ध्यपर्वतके निकट रमणीय समुद्र हैं। हे द्विजगण! जो श्रोता कथाका अन्ततक | कोल्हारनगरमें चिद्रूप—इस नामसे विख्यात एक महान् श्रवण नहीं करता अथवा जो वक्ता कथाका अन्ततक | धनवान् वैश्य हुआ। उसकी सुलोचना नामसे प्रसिद्ध वाचन नहीं करता या केवल लिखे हुएका ही वाचन | पत्नी अत्यन्त सौभाग्यवती, सुशीला, दानी, पतिवाक्यपरायणा करता है अथवा पुस्तककी चोरी करता है और जो शिष्य | (पतिकी आज्ञा माननेवाली) और सती थी। हे नृपश्रेष्ठ ! गुरुसे प्रश्न नहीं करता तथा जो गुरु शिष्यके प्रश्नका | पूर्वजन्ममें तुम उसीके पुत्र होकर उत्पन्न हुए थे।