श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- ब्राह्मणोंके कथनानुसार उन दोनोंने तुम्हारा 'कामन्द'- यह नाम रखा ॥ ८-१० ॥ माता-पिताकी वृद्धावस्थामें तुम्हारा जन्म हुआ था और तुम उनके एकमात्र पुत्र थे, इसलिये वे दोनों दिन- रात तुम्हें अत्यन्त स्नेह करते थे और तुम्हारा लालन- पालन करते थे ॥ ११ ॥ उन दोनोंने हिरणी-जैसे नेत्रोंवाली, सुकुमार अंगोंवाली और 'कुटुम्बिनी' नामसे प्रसिद्ध [कन्याके साथ] तुम्हारा पर्याप्त धन खर्चकर, कौतुक और मांगलिक उत्सवपूर्वक विवाह किया ॥ १२ ॥ [तुम्हारी पत्नी] ब्राह्मणों, देवताओं और अतिथियोंका सत्कार करनेमें प्रेम रखनेवाली और तुममें ही अनुरक्त चित्तवाली थी। समस्त स्त्रियोंमें रत्नस्वरूपा वह अत्यन्त सुन्दरी थी ॥ १३ ॥ पाँच बाण धारण करनेवाले कामदेवकी पत्नी रतिकी भाँति सुन्दर उस सात पुत्रों और पाँच पुत्रियोंवाली कुटुम्बिनीने अपने नामको सार्थक किया था ॥ १४ ॥ तदनन्तर बहुत समय बाद तुम्हारे पिता पंचतत्त्वोंमें विलीन हो गये और तुम्हारी साध्वी माता भी उन्हींके साथ दग्ध होकर स्वर्गको चली गयीं ॥ १५ ॥ तब तुमने अपनी मित्रमण्डलीके साथ [मौजमस्तीमें] बहुत-सा धन नष्ट कर दिया। [उनके द्वारा] कुछ धन उठा ले जाया गया, कुछ नष्ट कर दिया गया और कुछ खाने-पीनेमें समाप्त हो गया-इस प्रकार सम्पूर्ण धन विनाशको प्राप्त हो गया ॥ १६ ॥ चिन्तित होकर तुम्हारी धर्मपत्नीने तुम्हें बहुत रोका, किंतु तुमने उसकी बात नहीं मानी और घर भी बेच दिया ॥ १७ ॥ कुलके लिये कण्टकके समान तुम्हें छोड़कर वह अपने बच्चोंके पालन-पोषणके लिये तुम्हारी आज्ञा लेकर बच्चोंके साथ पिताके घर चली गयी ॥ १८ ॥ तदनन्तर तुम दुराचारी हो गये। मदिरापान करके उन्मत्त हो जाते और पागल हाथीकी भाँति नगरमें अत्याचार करते ॥ १९ ॥ तुम दूसरेका द्रव्य हरण करते, परनारियोंसे व्यभिचार करते, गाँवमें चोरी करते और लोगोंको सन्ताप दिया करते थे। तुम द्यूतक्रीडामें निपुण, मूर्तिमान् पापसमूह, हिंसाप्रिय तथा बलहीन होते हुए भी अपनेको शूरवीर माननेवाले थे ॥ २० ॥ जो-जो लोग तुम्हारे सुखके साथी थे और तुम्हारे द्वारा तृप्त किये गये थे, उनसे बहुत-सा धन लेकर तुम खा गये। तुम्हारे पिताने धरोहरके रूपमें अपने मित्रोंके यहाँ जो कुछ रखा था, उसे भी लेकर तुम खा गये ॥ २१ ॥ तुमने अनेक बार झूठी कसमें खायीं, अनेक बार स्त्रियोंसे झूठ बोले और झूठे प्रमाण दिये। इसलिये सभी लोग तुमसे वैसे ही भयभीत रहते थे, जैसे घरमें घुसे हुए अत्यन्त विषैले साँपसे ॥ २२ ॥ इस प्रकार जब तुम लोगोंके लिये पायसमें पड़े हुए [कँटीले] गोखुरकी भाँति हो गये, तब इसी कारणसे लोगोंने राजाकी अनुमति लेकर तुम्हें नगरसे निकलवा दिया ॥ २३ ॥ वनमें रहते हुए तुम नित्य बहुत-से प्राणियोंकी हत्या करते थे। तुम स्त्रियों, बालकों और वृद्धोंकी हत्या करते थे और किसी श्रेष्ठ पुरुषको देखकर वैसे ही पलायन कर जाते थे, जैसे सिंहको देखकर भेड़िया या मृग भाग जाता है ॥ २४ ॥ तुमने मछलियों, बगुलों, सारस, मुर्गों, भेड़ियों, हिरनों, बन्दरों, कोयल, गैंडों, खरगोशों और घड़ियालोंको निष्प्रयोजन मारकर और उन्हें खाकर पापपूर्ण आचरणसे ही अपने शरीरका पोषण किया ॥ २५ ॥ तुमने अनेक स्थानोंमें रहनेवाले दुर्धर्ष चोरोंको अपने साथ मिलाकर और सिंहों, व्याघ्रों एवं सियारोंको पर्वत-कन्दराओंसे निकालकर लकड़ी, मिट्टी और पत्थरोंसे एक उत्तम गृहका निर्माण किया; जो एक कोस विस्तारवाला और अनेक प्रकारके चमत्कारोंसे युक्त था ॥ २६-२७ ॥ तुम्हारी पत्नीके पिताने जनता और राजाके भयसे उसे बालकोंके साथ तुम्हें सौंप दिया और वह तुम्हारे घर आ गयी ॥ २८ ॥