भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

उ०ख०-अ०८ ] * राजा सोमकान्तद्वारा गणेश-मन्दिरके जीर्णोद्धारका वर्णन * ५७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अनेक प्रकारके वस्त्रों एवं अलंकारोंसे सुशोभित तुम्हारी पत्नी देवांगनाकी भाँति शोभा पाती थी, तुम्हारे बालक भी तेजस्वी थे। वहाँ तुम चोरोंके साथ रहते तथा रास्तेमें चलनेवाले गरीब लोगोंकी हत्या करके घर भाग आते। चोरों, बालकों और स्त्रीके साथ तुम राजाकी भाँति प्रतीत होते थे। किसी समय गुणवर्धन नामसे विख्यात एक विद्वान् ब्राह्मण तुम्हें मध्याह्नकालमें रास्तेमें एकाकी दिखायी पड़ा ॥ २९-३१ ॥ तब तुमने उस ब्राह्मणका दाहिना हाथ पकड़कर उसे रोक लिया। तुम्हारे द्वारा पकड़कर खींचे जानेसे वह तुम्हारे मनकी बात जान गया और थर-थर काँपने लगा। तुम्हें अपना काल मानकर वह मूर्च्छित हो गया और जीवित रहनेकी इच्छासे अत्यन्त करुणापूर्ण एवं तर्कसंगत वाक्योंसे तुम्हारा प्रबोधन करते हुए कहने लगा - ॥ ३२-३३ ॥ गुणवर्धन बोला - मैं ब्राह्मण हूँ, नव-विवाहिताका पति हूँ, शान्त स्वभाववाला हूँ और निरपराध हूँ; धनवान् और सौभाग्यवान् होकर भी तुम मुझे मारनेकी इच्छा क्यों करते हो ? ॥ ३४ ॥ दुर्बुद्धिपूर्ण वासनाका त्याग करके तुम अपनी बुद्धिको सद्धर्ममें लगाओ। मेरी पहली पत्नी परलोकको चली गयी, तब मैंने उससे श्रेष्ठ यह दूसरी पत्नी प्राप्त की है। यह सुन्दर आचरणवाली, परम उदार, साध्वी और सभी गुणोंकी खान है। पितरोंके ऋणसे मुक्त होने, धर्म और सन्तानकी वृद्धिके लिये तथा गृहस्थ धर्मके पालनकी इच्छासे मैंने अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक उससे विवाह किया है। मेरे बिना उसका और उसके बिना मेरा जीवन व्यर्थ हो जायगा ॥ ३५-३७ ॥ अतः तुम मेरे रक्षक पिता हो जाओ, मैं भी तुम्हारा पुत्र हो जाऊँगा; क्योंकि शास्त्रमें जीवन देनेवाले और भयसे रक्षा करनेवाले-दोनोंको पिता कहा गया है। डाकू भी ब्राह्मण या शरणमें आये हुए-की रक्षा करते हैं, अतः मुझ ब्राह्मण, विद्वान् और शरणागतको तुम्हें मुक्त कर देना चाहिये, अन्यथा तुम हजारों कल्पोंतक नरकोंमें पड़ते रहोगे ॥ ३८-३९१/२ ॥ [तुम्हारे द्वारा लाये गये धनके] स्त्री, पुत्र और सुहृज्जन सभी उपभोक्ता हैं। ये ठग लोग तुम्हारे धनसे सुखी तो हैं, पर तुम्हारे पापमें भागीदार नहीं होंगे, अतः यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि तुम कितने जन्मांतक इस पापका फल भोगते रहोगे ॥ ४०-४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'सोमकान्तके पूर्वजन्मका कथन' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥ आठवाँ अध्याय राजा सोमकान्तद्वारा पूर्वजन्ममें किये गये पापों तथा वृद्धावस्थामें गणेश-मन्दिरके जीर्णोद्धारका वर्णन भृगुजी बोले - उस ब्राह्मण (गुणवर्धन)-ने इस प्रकार बार-बार करुणासे युक्त एवं अवसादपूर्ण वचन कहे, परंतु उन्हें सुनकर भी तुम्हारा हृदय नहीं पसीजा ॥ १ ॥ सचमुच, ब्रह्माने वज्रके सारभागसे ही तुम्हारा निर्माण किया था। बहुत-से जन्तुओं और हजारों मनुष्योंकी हत्यासे तुम्हारे मनने कृतघ्नकी भाँति अति निष्ठुरता प्राप्त कर ली थी। तदनन्तर (ब्राह्मणकी बात सुनकर) तुमने निष्ठुर यमराजकी भाँति उससे कहा - ॥ २-३ ॥ चोर [ जो इस जन्ममें राजा सोमकान्त था ] बोला - रे ब्राह्मण ! बधिरके सम्मुख पाण्डित्यकी बातें और अधोमुख घड़ेमें जल भरने-जैसा प्रयास तुम अपने इन वाक्यसमूहोंद्वारा मुझपर व्यर्थमें क्यों कर रहे हो ? कहाँ मेरी मूढ़ बुद्धि और कहाँ तुम्हारा यह [ज्ञानपूर्ण] उपदेश ! जैसे मदिरापान किये हुए-के सम्मुख तत्त्व- चिन्तन व्यर्थ है, वैसे ही तुम्हारी ये बातें मुझे रुचिकर नहीं लग रही हैं। जिसकी धनमें आसक्ति है, उसके लिये