भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 656 में से

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पृष्ठ 48

४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- मेरे बुद्धि-पराक्रम-सम्पन्न पुत्र हेमकण्ठको आप सब राज्य-संचालनहेतु अभिषिक्त करें और अपने पराक्रमसे उसकी रक्षा करें॥ १३॥ हे महामन्त्रियो! अब मैं लोकमें अपना मुख किसीको नहीं दिखलाऊँगा; न मुझे [अब] राज्यसे कोई प्रयोजन है, न स्त्रीसे, न जीवनसे और न धनसे। अब मैं वनमें जाकर अपना हितसाधन करूँगा॥ १४१/२ ॥ सूतजी बोले—हे श्रेष्ठ द्विजगण! ऐसा कहकर मवाद, रक्त और पसीनेसे लथपथ वे (राजा सोमकान्त) आँधीके झोंकेसे उखड़े हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े। [उस समय] मन्त्रियों और स्त्रियोंका वहाँ महान् कोलाहल हो रहा था॥ १५-१६॥ क्षणभरमें ही लोगोंका वहाँ अत्यन्त दारुण हाहाकार होने लगा। तब मन्त्रियोंने वस्त्रसे पोंछकर, हवा करके, शीघ्र लाभ करनेवाली औषधियों और मन्त्रोंका प्रयोग करके उन्हें सचेतन किया और उन राजा सोमकान्तके स्वस्थ होनेपर उनसे मन्त्रियोंने इस प्रकार कहा—॥ १७-१८॥ मन्त्रियोंने कहा—हे राजन्! आपकी कृपासे सभी मनुष्योंके लिये दुर्लभ देवराज इन्द्रके तुल्य सुखोंका हमने भोग किया, अब हम आपके बिना कैसे रह सकते हैं? पशुओंका वध करनेवाले कसाईकी भाँति कैसे जीवन धारण कर सकते हैं? आपका पुत्र बलवान् है, शत्रुओंका नाश करनेवाला है और राजकोष भी प्रभूत धनसे सम्पन्न है, अतः वह अकेला ही राज्य कर सकता है। हम लोग सारे सुखोंका त्याग करके आपके साथ ही वनको चलते हैं॥ १९-२०॥ सूतजी बोले—तदनन्तर [राजा सोमकान्तकी रानी] सुधर्माने कहा कि हे श्रेष्ठ मन्त्रियो! मैं ही अकेली राजाकी सेवाके लिये इनके साथ वनको जाऊँगी और आप लोग मेरे पुत्रके साथ राज्यका भलीभाँति रक्षण- पालन करें॥ २१॥ पूर्वकालमें किये गये [पाप या पुण्य] कर्मका फल दुःख या सुखके रूपमें प्राणीको स्वयं ही भोगना पड़ता है, दूसरा कोई उसे नहीं भोग सकता। जिस-जिस प्रकारसे कर्मफलको भोगना निश्चित होता है, उसे वैसे ही और स्वयंको ही भोगना पड़ता है॥ २२॥ मैंने भी इनके साथ अनेक प्रकारके सुखोंका भोग और राज्य किया है। मुनियोंका कथन है कि नारीको इहलोक और परलोक—दोनोंमें पतिका ही अनुगमन करना चाहिये॥ २३॥ तब विनीत और शोकसंतप्त पुत्र हेमकण्ठने [अपने पिता] राजा सोमकान्तसे उस समय यह वचन कहा—॥ २४॥ हेमकण्ठ बोला—हे नृपश्रेष्ठ! आपके बिना मुझे राज्य, पत्नी, धनसंचय तथा प्राणोंसे भी कोई प्रयोजन नहीं है॥ २५॥ हे धर्मपालक! जैसे बिना तेलके दीपक और बिना प्राणोंके शरीर व्यर्थ हैं, वैसे ही हे राजन्! आपके बिना राज्य भी व्यर्थ है॥ २६॥ सूतजी बोले—मन्त्रियों, रानी सुधर्मा और पुत्र हेम- कण्ठके अमृतके समान वचनोंको सुनकर प्रसन्नमन सोम- कान्तने पुत्रसे इस प्रकार धर्मानुकूल बात कही—॥ २७॥ राजा बोले—पिताके वचनोंका पालन करनेमें नित्य रत रहनेवाला, [मरणोपरान्त] श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करनेवाला और गयामें पिण्डदान करनेवाला पुत्र ही पुत्र कहा जाता है*॥ २८॥ इसलिये मेरी आज्ञा मानकर मन्त्रियोंसहित तुम नीतिपूर्वक राज्य करो और सम्पूर्ण प्रजाका पुत्रवत् अनुशासन करो॥ २९॥ धर्मशास्त्रोंके तत्त्वार्थको जाननेवाला, नीतिज्ञ, सबको सन्तुष्ट करनेवाला, पितरोंका उद्धार करनेवाला और जो स्वयं भी पुत्रवान् है, उसीको पुत्र कहा जाता है॥ ३०॥ हे उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले [पुत्र]! गलित कुष्ठवाला मैं अत्यन्त निन्दित हूँ, अतः पत्नी सुधर्माके साथ मैं वनमें जाऊँगा, इसका तुम समर्थन करो॥ ३१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'सोमकान्तकुष्ठप्राप्तिवर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥

  • जीवतो वाक्यकरणात् क्षयाहे भूरिभोजनात्। गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता॥ (श्रीमद्देवीभागवत ६।४।१५) Kalyana Visheshank 2021_Section_3_2_Back