श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 49, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०३]* * राजा सोमकान्तका राजकुमार हेमकण्ठको सदाचार और राजनीतिकी शिक्षा देना * .४७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
तीसरा अध्याय राजा सोमकान्तका राजकुमार हेमकण्ठको सदाचार और राजनीतिकी शिक्षा देना
सूतजी बोले—तत्पश्चात् राजाने उठकर पुत्रको | इन्द्रके अनुज, नियन्ता, पापोंको दूर करनेवाले, शत्रुओंका दाहिने हाथसे पकड़कर राजमहलके अग्रभागमें [स्थित | नाश करनेवाले और संसारसे मुक्तिके हेतु हैं॥ ८॥ उस कक्षमें] प्रवेश किया, जहाँ वे सर्वदा मन्त्रणा करते | [ श्रीशिव-प्रातःस्मरण—] मैं चन्द्रमाको थे; जहाँ बहुत-से रत्नोंसे युक्त, मोती और मूँगेसे जड़ा | [मुकुटरूपमें] सिरपर धारण करनेवाले गिरिराजन्न्दिनी हुआ स्वनिर्मित दिव्य सिंहासन इन्द्रासनकी भाँति | पार्वतीके पति त्रिपुरारि भगवान् शिवको प्रातः नमस्कार शोभायमान हो रहा था॥ १-२॥ | करता हूँ; जो बाघम्बरको [कटिप्रदेशमें] लपेटे रहनेवाले, वहाँ आसीन होनेपर वे दोनों-पिता-पुत्र दो | कामदेवको भस्म करनेमें दयारहित, नारायण और इन्द्रको होनेपर भी प्रत्येक रत्नमें प्रतिबिम्बित होनेसे अनेक दीख | वर देनेवाले, देवताओं और सिद्धोंसे सेवित तथा त्रिशूल- रहे थे, मानो वे जनसमुदायसे आवृत (घिरे) हों॥ ३॥ | डमरू एवं सर्पोंको धारण करनेवाले हैं॥ ९॥ अपने कुलकी कीर्तिके विस्तारके लिये राजाने | [ श्रीसूर्य-प्रातःस्मरण— ] मैं पापोंका हरण कृपापूर्वक पुत्रसे सर्वप्रथम आचार, तदनन्तर अनेक | करनेवाले दिनके अधिपति भगवान् सूर्यदेवको प्रातः प्रकारकी नीतियोंका वर्णन किया॥ ४॥ | नमस्कार करता हूँ; जो गहन अन्धकारका हरण करनेवाले, सोमकान्त बोले—जब रात्रि एक प्रहर शेष रहे, | श्रेष्ठ जनोंद्वारा वन्दित, वेदत्रयीस्वरूप, देवशत्रुओंकी तब पुरुषको जग जाना चाहिये। तत्पश्चात् शय्याका | मायाका नाश करनेवाले, ज्ञानके एकमात्र हेतु, अमितशक्ति त्याग करके पवित्र स्थानमें बैठकर गुरुका स्मरण करना | और उदार भाववाले हैं॥ १०॥ चाहिये॥ ५॥ | [देवी-प्रातःस्मरण—] मैं लौकिक ऐश्वर्यकी तदनन्तर इष्ट देवताका चिन्तन करके उन्हें स्तुतिपूर्वक | कारणरूपा गिरिराजनन्दिनी सुरेश्वरी भगवती पार्वतीको प्रणाम करे और पृथिवीकी हे जगन्मये ! मेरे पादस्पर्शको | प्रातः नमस्कार करता हूँ; जो संसाररूपी समुद्रसे आत्यन्तिक क्षमा* करें-ऐसा कहकर प्रार्थना करे॥ ६॥ | रूपसे पार लगानेवाली, तीन नेत्रोंवाली, महत्तत्त्वाडिकी [ इष्टदेवरूप पंचदेवों- श्रीगणेश, विष्णु, शिव, | कारणरूपा मूलप्रकृति, देवशत्रुओंकी मायाका नाश करने- सूर्य और देवीकी स्तुतियाँ इस प्रकार हैं-] | वाली, मायामयी और देवताओं तथा श्रेष्ठ मुनियोंद्वारा [ श्रीगणेश-प्रातः स्मरण—] मैं गणोंके स्वामी | नमस्कृत हैं॥ ११॥ श्रीगणेशजीको प्रातः नमस्कार करता हूँ; जो सम्पूर्ण | इसी प्रकार अन्य देवताओं और मुनियोंका स्मरण कारणोंके कारण, ब्रह्मादि देवताओंको वर देनेवाले, | करके तथा मानसिक उपचारोंसे पूजन करके क्षमा- सम्पूर्ण आगमोंके ज्ञाता, धर्म-अर्थ और कामरूपी फल | प्रार्थना करे॥ १२॥ देनेवाले, मुमुक्षुजनोंको मोक्ष देनेवाले, वाणीसे अनिर्वचनीय | तत्पश्चात् ब्राह्मण स्वच्छ सफेद मिट्टी, क्षत्रिय तथा अनादि और अनन्त रूपवाले हैं॥ ७॥ | लाल मिट्टी और वैश्य-शूद्र काली मिट्टी एवं जलपात्र [ श्रीविष्णु-प्रातःस्मरण-] मैं उग्र पराक्रमवाले | लेकर गाँवके नैर्ऋत्यकोण (दक्षिण-पश्चिम दिशा)-में लक्ष्मीपति श्रीविष्णुको प्रातः नमस्कार करता हूँ; जो | जायें। नदीके किनारे, ऊसर और दीमककी बाँबी तथा अपने भक्तजनोंके रक्षणके लिये अनेक अवतार लेनेवाले, | ब्राह्मणके घरकी मिट्टी कभी न खोदे ॥ १३-१४॥ क्षीरसागरमें निवास करनेवाले, देवताओंके अधिपति | तदनन्तर धरतीको घास-फूस आदिसे ढककर
- समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले । विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ॥