भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 656 में से

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४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दिनमें उत्तराभिमुख और रात्रिमें दक्षिणकी ओर मुख करके मल-मूत्रका त्यागकर पहले तृण-काष्ठादिसे मनुष्य पुरीषेन्द्रियको स्वच्छकर तत्पश्चात् मिट्टी और जलसे पाँच बार उसका प्रक्षालन करे॥ १५-१६॥ तदनन्तर बायें हाथको दस बार, दोनों हाथोंको सात बार, मूत्रेन्द्रियको एक बार और पुनः बायें हाथको तीन बार धोना चाहिये॥ १७॥ मूत्रविसर्जन करनेपर दोनों हाथोंको सदा दो बार और दोनों पैरोंको एक बार धोना चाहिये। यह शौचविधि गृहस्थोंके लिये ही कही गयी है॥ १८॥ ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करनेवालेको इसका दुगुना, वानप्रस्थीको तिगुना और संन्यासीको चार गुना शुद्धि करनी चाहिये। रात्रिमें सबको इसकी आधी ही शुद्धि मौन रहते हुए करनी चाहिये॥ १९॥ स्त्री और शूद्रको [उपर्युक्त शुद्धि]-की आधी शुद्धि दिनमें और चौथाई शुद्धि रात्रिमें करनेका विधान है। शुद्धिके पश्चात् दूधवाले या काँटेदार वृक्षकी लकड़ी (दातून)-को [उस वृक्षसे] इस प्रकार प्रार्थनापूर्वक लेकर दाँत और जीभको साफ करे-हे वनस्पते! तुम मुझे बल, ओज, यश, तेज, पशु, बुद्धि, धन, मेधा (धारणाशक्ति), ब्रह्मज्ञान प्रदान करो॥ २०-२११/२॥ तदनन्तर पहले शीतल जलसे मलका हरण करनेवाला स्नान करे, फिर अपने गृह्यसूत्रमें कहे गये मन्त्रोंसे स्नान करनेके बाद सन्ध्योपासना करे। तत्पश्चात् जप, हवन, स्वाध्याय, तर्पण और देवपूजन करे। तदनन्तर बलिवैश्वदेव, अतिथि-सत्कार और ब्राह्मणावलोकनके उपरान्त स्वयं भोजनकर पुराणका श्रवण और दान करे, परनिन्दासे सदा दूर रहे॥ २२-२४॥ धन, प्राण तथा अमृतरूपी (सहानुभूतिपूर्ण) वचनोंसे दूसरोंका उपकार करे, कभी किसीका अपकार न करे और न ही आत्मप्रशंसा करे। गुरुद्रोह, वेदनिन्दा, नास्तिकताका भाव, पापीकी सेवा, निषिद्ध पदार्थोंका भक्षण और परस्त्रीगमन न करे॥ २५-२६॥ अपनी पत्नीका परित्याग न करे और ऋतुकालमें सहवास करे। माता-पिता, गुरु और गायकी सदा सेवा- शुश्रूषा करे॥ २७॥ दीनों, अन्धों और कृपणों (जो दयाके पात्र हैं)- को वस्त्रसहित अन्न प्रदान करे। प्राणोंके संकटमें आ जानेपर भी कभी सत्यका त्याग न करे। जिनपर ईश्वरकी कृपा है, ऐसे साधुजनोंका पालन करे॥ २८१/२॥ अपराधके अनुसार धर्मशास्त्रोंका विशेष रूपसे अवलोकनकर या विद्वानोंसे पूछकर नीतिज्ञ [राजा]-को दण्ड देना चाहिये। जो विश्वसनीय न हो, उसपर कभी भी विश्वास न करे। समृद्धिकी इच्छावाला राजा विश्वस्त व्यक्तिपर भी अत्यन्त विश्वास न करे। जिससे एक बार वैर हो गया हो, वह यदि पुनः विश्वस्त बन गया हो, तो उसपर तो कभी भी विश्वास न करे॥ २९-३१॥ षड्गुणों१ (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और संश्रय)-का प्रयोग करके राजा अपने राष्ट्रका सम्वर्धन करे तथा अपनी शक्तिके अनुसार दान करे, अन्यथा राष्ट्र क्षीण होने लगता है॥ ३२॥ शत्रुके व्याकुल अर्थात् संकटग्रस्त होनेपर उसपर चढ़ाई करना अधर्म कहा जाता है। राजाको चारदृष्टि (गुप्तचररूपी नेत्रोंवाला), दूतवक्त्र (दूतरूपी मुखवाला) और उद्यद्दण्ड (उठे हुए दण्डवाला) होना चाहिये। अर्थात् राजा गुप्तचरके नेत्रों और दूतके मुखसे सूचनाओंको प्राप्त करे और तदनुसार सेनाको तैयार रखे॥ ३३॥ दण्डके ही भयसे सभी लोग अपने-अपने धर्मोंमें व्यवस्थित रहते हैं, अन्यथा अपने और परायेका कोई नियम ही नहीं रहेगा। यदि अधम व्यक्ति कभी निन्दा करे अथवा प्रशंसा करे तो न तो उसपर क्रोधित हो, न ही प्रसन्न; क्योंकि उसकी निन्दा या स्तुतिका क्या अर्थ ! ॥ ३४-३५॥ जिसने पूर्वकालमें अपकार किया हो, परंतु पुनः शरणमें आ जाय तथा जो पूर्वकालमें धनिक रहा हो [परंतु किसी कारण निर्धन हो गया हो], उनका सदैव परिपालन करना चाहिये॥ ३६॥ [राजाको मन्त्रियोंके साथ की गयी] मन्त्रणाको सदा गुप्त रखना चाहिये; क्योंकि वह (मन्त्रणा) १. सन्धिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च। द्वैधीभावं संश्रयं च षड्गुणांश्चिन्तयेत्सदा॥ (मनुस्मृति ७। १६०)

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