भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 656 में से

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पृष्ठ 47

उ०ख०-अ०२ ] * गलित कुष्ठसे पीड़ित राजा सोमकान्तका वनमें जानेका निश्चय करना * ४५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 देखकर [कामदेवकी पत्नी] रति तथा रम्भा और | रहती थी तथा पतिसेवा और उनके वचनोंके पालनमें तिलोत्तमा [-जैसी स्वर्गकी अप्सराएँ] भी लज्जित हो | सदा सन्नद्ध रहती ॥ ३६१/२ ॥ जाती थीं; वे न कहीं सुख पाती थीं, न कहीं सुख मानती | इन (दम्पती)-के एक हेमकण्ठ नामवाला शुभ थीं ॥ ३२-३३ ॥ | लक्षणोंसे युक्त पुत्र हुआ, जो दस हजार हाथियोंके समान वह अपने कानोंमें अनेक रत्नोंसे जड़ित और | बलशाली, बुद्धिमान्, पराक्रमी और शत्रुओंको सन्ताप स्वर्णनिर्मित सुन्दर कर्णफूल, कण्ठमें सोनेका हार तथा | देनेवाला था ॥ ३७१/२ ॥ मोतियोंकी माला, कटिप्रदेशमें रत्नमयी करधनी, पैरोंमें | हे श्रेष्ठ द्विजगण! इस प्रकार (-की गुण-समृद्धिसे वैसे ही नूपुर तथा हाथों और पैरोंकी अँगुलियोंमें उत्तम | परिपूर्ण) सोमकान्त पृथ्वीका एक श्रेष्ठ राजा हुआ। प्रकारकी अँगूठियाँ एवं अनेक रंगोंके सहस्रों बहुमूल्य | उसने सम्पूर्ण राजाओंको अपने वशमें करके इस पृथ्वीपर वस्त्र धारण करती थी ॥ ३४-३५१/२ ॥ | राज्य किया। वह नित्य धर्ममें रत रहनेवाला, यज्ञकर्ता, वह भगवद्भजन, दान एवं अतिथि-सत्कारमें लगी | दानी और त्यागी था ॥ ३८-३९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें पुराणोपक्रममें 'सोमकान्तवर्णन' नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥ दूसरा अध्याय गलित कुष्ठसे पीड़ित राजा सोमकान्तका वनमें जानेका निश्चय करना सूतजी बोले-हे ऋषियो! आप सब अब | राजा सोमकान्तने प्रयत्नपूर्वक मनको स्थिर करके मन्त्रियोंसे सोमकान्तके दुष्कृत्यको सुनें, उस धर्मशील राजाको | कहा- ॥ ६ ॥ पूर्वजन्मोंके कर्मफलसे अकस्मात् अत्यन्त दुःखदायी | राजाने कहा-मेरे राज्य और रूपको धिक्कार गलित कुष्ठ हो गया ॥ १ १/२ ॥ | है; [मेरे] बल, जीवन और धनको धिक्कार है! न जाने मनुष्यके द्वारा किया गया शुभ या अशुभ कर्म | मेरे किस कर्मका बीज इस कष्टके रूपमें [प्रस्फुटित उसका कभी पीछा नहीं छोड़ता; जिस-जिस अवस्थामें | होकर] समुपस्थित हुआ है ॥ ७ ॥ जैसा-जैसा कर्म किया गया होता है, उस-उस अवस्थामें | जिस [शरीर]-की कान्तिसे सोम (चन्द्रमा)-को प्राणीको उसका फल भोगना पड़ता है, यह ध्रुव सत्य | जीतकर मैं सोमकान्त कहलाया; जिससे मैंने साधुओं, है ॥ २-३ ॥ | दीनों, श्रोत्रिय ब्राह्मणों और सभी आश्रमोंके लोगों, अनेक घावोंसे युक्त, इधर-उधर बहते हुए रक्तवाले, | जनपदके निवासियों और अन्य लोगोंका भी पुत्रवत् मवाद और खूनसे लथपथ राजा (सोमकान्त) कीड़ोंद्वारा | पालन किया; जिसके द्वारा मैंने अपने बाणोंसे भयंकर काटकर विह्वल कर दिये जाते थे। उस समय वे | रूपवाले शत्रुओंको जीत लिया; जिसके द्वारा मैंने सम्पूर्ण दुःखरूपी सागरमें उसी प्रकार निमग्न हो जाते थे, | पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया; सम्यक् रूपसे देवाधिदेव जैसे समुद्रमें बिना नौकाके मनुष्य। उस समय उन्हें | परमात्मा सदाशिवका आराधन किया; जो दुष्टोंके संगसे ऐसी पीड़ा प्राप्त होती थी, जैसी कि सर्पके डसनेसे | रहित और चित्तका निग्रह करनेवाला था, पूर्वकालमें मैंने होती है ॥ ४-५ ॥ | अपने जिस शरीरके द्वारा रुचिकर सुगन्धियोंका विशेषरूपसे उन राजाका शरीर क्षयरोगसे ग्रस्त रोगीकी भाँति | सेवन किया था, वही आज सड़े हुए मांसकी गन्धवाला हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया। सभी इन्द्रियोंके रोगयुक्त | हो गया है, अतः मेरा जीवन निरर्थक है; इसलिये मैं हो जानेसे वे चिन्तासे व्याकुल हो उठे। तदनन्तर उन | आप सबकी अनुमति लेकर वनमें जाऊँगा ॥ ८-१२ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_3_2_Front