श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 46, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ]
हूँ, के अतिरिक्त] गणेश, नारदीय, नृसिंह आदि वैसे ही अन्य अठारह उपपुराण भी हैं, उनमें जो गणेशजीसे सम्बन्धित गणेशपुराण है, उसका प्रवचन मैं सर्वप्रथम करूँगा, जिसका कि विशेष रूपसे मर्त्यलोकमें श्रवण दुर्लभ है ॥ ९-१० ॥ जिस गणेशपुराणके स्मरणमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है, जिसके प्रभावको कहनेमें [सहस्र मुखवाले] शेषजी और चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, तो भी आप सबकी आज्ञासे मैं इसको संक्षेपमें कहूँगा। बहुत- से जन्मोंके पुण्योंके एकत्र होनेसे ही इसका श्रवण होता है, पाखण्डियों, नास्तिकों और पापकर्मियोंको इसका श्रवण सम्भव नहीं होता ॥ ११-१२१/२ ॥ श्रीगणेशजी तत्त्वतः नित्य, निर्गुण और अनादि हैं; इसलिये उनके स्वरूपका कथन किसीके लिये सम्भव नहीं है; फिर भी उनकी उपासनामें निरत भक्तोंद्वारा उन्हें सगुणरूपमें निरूपित किया जाता है ॥ १३-१४॥ ॐकाररूपी जो भगवान् [गणेश] वेदोंमें सर्वप्रथम प्रतिष्ठित हैं, मुनिगण तथा इन्द्रादि देवगण जिनका हृदयमें सदा स्मरण करते रहते हैं, ब्रह्मा, ईशान (शिव), इन्द्र और विष्णु जिनका सतत पूजन करते हैं, जो समस्त जगतोंके हेतु और सम्पूर्ण कारणोंके भी कारण हैं, जिनकी आज्ञासे ब्रह्माजी [विश्वका] सृजन करते हैं, जिनकी आज्ञासे विष्णु पालन करते हैं, जिनकी आज्ञासे भगवान् शंकर संहार करते हैं, जिनकी आज्ञासे सूर्य संचरण (भ्रमण) करते हैं, जिनकी आज्ञासे पवनदेव प्रवहमान होते हैं, जिनकी आज्ञासे जल सभी दिशाओंमें प्रवाहित होता है, जिनकी आज्ञासे ग्रह-नक्षत्र (उल्कापिण्ड) पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं, जिनकी आज्ञासे तीनों लोकोंमें अग्नि प्रज्वलित होती है, उन भगवान् गणेशका जो गुप्त चरित है, जिसे किसीके समक्ष प्रकट नहीं किया गया है, उसे मैं आप सबसे कहता हूँ। हे द्विजगण! आप लोग आदरपूर्वक उसे सुनें ॥ १५-१९ ॥ इसे पूर्वकालमें ब्रह्माजीने अमिततेजस्वी व्यासजीसे कहा था, उन्होंने इसे भृगुजीसे और भृगुजीने इसे [राजा] सोमकान्तसे कहा- ॥ २० ॥
[दायाँ स्तम्भ]
जिन्होंने करोड़ों व्रतों, यज्ञों, तपस्याओं, दानों और तीर्थसेवनद्वारा पुण्य अर्जित किया है, हे श्रेष्ठ द्विजगणो! उन्हींकी बुद्धि इस गणेशसंज्ञक पुराणके श्रवणमें प्रवृत्त होती है। जिनका मन स्त्री, पुत्र, भूमि आदि सांसारिक मायाजालमें आसक्त नहीं होता, हे श्रेष्ठ मुनिगण! भगवान् मयूरेश (गणेशजी)-की कथाका वे ही सादर श्रवण करते हैं। अब आप लोग सोमकान्तके आख्यानके माध्यमसे इसकी (गणेशपुराणकी) महिमाका श्रवण करें ॥ २१-२३ ॥ सौराष्ट्र देशमें स्थित देवनगरमें सोमकान्त नामका एक राजा हुआ, जो वेद और शास्त्रके तत्त्वको जानने- वाला तथा धर्मशास्त्रके प्रयोजनभूत विहित कर्मानुष्ठानमें रत रहनेवाला था ॥ २४ ॥ जब वह प्रस्थान करता तो दस सहस्र गजारोही, उसके दुगुने अर्थात् बीस सहस्र अश्वारोही और छः हजार रथारोही उसका अनुगमन करते थे। साथ ही असंख्य पैदल सैनिक, आग्नेयास्त्रधारी तथा दो तरकस धारण करनेवाले धनुर्धारी भी उसके साथ होते थे ॥ २५-२६ ॥ उसने बुद्धिसे बृहस्पतिको, धन-सम्पत्तिसे कुबेरको, क्षमासे पृथ्वीको और गाम्भीर्यसे महासागरको जीत लिया था। उस राजाने अपनी प्रकाशमयी आभासे सूर्य और कान्तिसे चन्द्रमाको, प्रतापसे अग्निको और सौन्दर्यसे कामदेवको जीत लिया था ॥ २७-२८ ॥ उसके पाँच मन्त्री थे, जो प्रबल शक्तिशाली, दृढ़ पराक्रमी, नीतिशास्त्रके तत्त्वार्थको जाननेवाले और शत्रु- राष्ट्रका ध्वंस करनेवाले थे ॥ २९ ॥ उनमेंसे प्रथमका नाम रूपवान्, दूसरेका विद्याधीश, तीसरेका क्षेमंकर, चौथा ज्ञानगम्य और पाँचवाँ सुबल नामवाला था ॥ ३० ॥ ये सभी नित्य राज्यकार्य करनेवाले और राजाके अत्यन्त प्रिय थे। इन्होंने अनेक देशोंपर आक्रमण करके अपने पराक्रमसे उन्हें विजित किया था ॥ ३१ ॥ ये सभी अत्यन्त सुन्दर थे तथा अनेक प्रकारके आभूषणों और वस्त्रोंसे अलंकृत रहते थे। उस राजाकी सुधर्मा नामक गुणशालिनी पत्नी थी, जिसके रूपको
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