श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 33, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंअङ्क] * श्रीगणेशपुराण-सूक्तिसुधा * ३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
जो लोग गणेशजीकी भक्तिसे विमुख हैं, उनका तो मुख भी नहीं देखना चाहिये। उनके दर्शनमात्रसे पग-पगपर विघ्न उपस्थित होते हैं। [उपासनाखण्ड १९। ८] साधूनां सङ्गतिः सद्यो ददाति फलमुत्तमम्। साधुजनोंकी संगति शीघ्र ही उत्तम फल देती है। [उपासनाखण्ड १९। ३५] पूर्वजन्मकृतात् पापाज्जायते दुःखभाङ्नरः॥ दुःखवान् सुखमाप्नोति सुखवानपि तत्पुनः। पूर्वजन्ममें किये हुए पापके कारण ही मनुष्य दुःखका भागी होता है। जिसे दुःख प्राप्त है, उसे भी सुखकी प्राप्ति होती है; वैसे ही जिसे सुख प्राप्त है, उसे भी दुःखकी प्राप्ति होती है। [उपासनाखण्ड १९। ४८-४९] मातापित्रोर्वचः कार्यं सत्पुत्रेण यशस्विना। पूजनं च तयोः कार्यं पोषणं पालनं तथा॥ माता-पिताके वचनका पालन करना, उनका पूजन करना और उन दोनोंका पालन-पोषण करना यशस्वी सत्पुत्रके लिये कर्तव्य है। [उपासनाखण्ड २३। २२] यो यथा कुरुते कर्म स तथा फलमश्नुते॥ जो जैसा कर्म करता है, वह वैसा ही फल भोगता है। [उपासनाखण्ड २३। २६] परपुंसि मनो यस्याः सा वै निरयभागभवेत्॥ जिसका मन परपुरुषमें लग जाता है, वह [नारी] निश्चय ही नरकका भोग करनेवाली होती है। [उपासनाखण्ड २८। १५] लोकेषु वर्षते मेघः शेषेण ध्रियते धरा॥ उपकाराय सूर्योऽपि भ्रमतेऽहर्निशं द्विज। हे द्विज! बादल सम्पूर्ण लोकोंमें वर्षा करते हैं, शेषजी पृथ्वीको धारण करते हैं, सूर्य भी [लोगोंका] उपकार करनेके लिये ही दिन-रात भ्रमण करते रहते हैं। [उपासनाखण्ड २९। २२-२३] अनुतापविहीनस्य निष्कृतिर्नैव विद्यते। जिसे अपने दुष्कृतका पछतावा न हो, उसके
[दायाँ स्तम्भ]
उद्धारका तो कोई उपाय ही नहीं होता। [उपासनाखण्ड ३२। २९] पितृहा मातृहा स्त्रीहा मद्यपी गुरुतल्पगः। तस्य संस्पर्शनादेव सचैलं स्नानमाचरेत्॥ जो पिता-माता, स्त्रीका वध करनेवाला है, सुरापान करनेवाला है तथा गुरुपत्नीके साथ गमन करनेवाला है, उसका स्पर्शमात्र हो जानेपर वस्त्रोंसहित स्नान करना चाहिये। [उपासनाखण्ड ७६। ६०] दोषे जाते स्वयं सन्तः ख्यापयन्ति जनेषु तम्। आच्छादने दोषवृद्धिः ख्यापने तु लयो भवेत्। सन्तजन [अपनेमें] कोई दोष उत्पन्न हो जानेपर स्वयं ही जनसमुदायमें उसका ख्यापन कर देते हैं। छिपानेसे दोषकी वृद्धि होती है और प्रकट कर देनेसे उसका नाश हो जाता है। [उपासनाखण्ड ३३। ३-४] पुण्यक्षयो भवेत्तस्य परदोषं य ईरयेत्॥ जो दूसरेके दोषोंका बखान करता है, उसके पुण्यका क्षय हो जाता है। [उपासनाखण्ड ७६। ५६] परेषां दोषकथने दोषो यद्यपि वर्तते॥ प्रश्ने कृते तु वक्तव्यं याथातथ्यान्न मत्सरात्। यद्यपि दूसरेके दोषोंका कथन करनेमें दोष होता है, तथापि पूछे जानेपर यथार्थरूपसे उसका वर्णन करना चाहिये, ईर्ष्या-द्वेषवश नहीं। [क्रीडाखण्ड २६। ३-४] परस्यानिष्टमिच्छेद्यः स स्वयं निधनं व्रजेत्। जो दूसरेके अनिष्टकी कामना करता है, वह स्वयं मृत्युको प्राप्त होता है। [क्रीडाखण्ड २९। ५९] यस्य स्वभावो यादृक् स्यात्स तथा वर्तते नरः। न जहाति घृष्यमाणश्चन्दनः स्वसुगन्धिताम्॥ कस्तूरीकर्दमयुतः पलाण्डुर्वा निजं गुणम्। जिस व्यक्तिका जैसा स्वभाव होता है, वह वैसा ही व्यवहार करता है। जैसे घिसे जानेपर भी चन्दन अपने सुगन्धरूपी स्वभावको नहीं छोड़ता और कस्तूरीपंकसे सना होनेपर भी प्याज अपने स्वाभाविक गुण दुर्गन्धका त्याग नहीं करता। [क्रीडाखण्ड २२। १२-१३]