श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 34, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] महान् क्षुद्रस्य वाक्यं चेत् कुरुते सोऽपि साधुताम्। प्राप्नोति सर्वलोकेषु कीर्तिं स्फीतां समुत्कटाम्॥ यदि कोई महापुरुष क्षुद्र व्यक्तिके अनुरोध वचनको स्वीकार करता है तो वह भी साधुताको प्राप्त करता है और सभी लोकोंमें अत्यन्त उत्कर्षयुक्त विशद यशको प्राप्त करता है। [उपासनाखण्ड ७८।२०] ईश्वरे सानुकूले कः पीडितुं क्षमते जनम्। यदि ईश्वर अनुकूल हो तो व्यक्तिको मारनेमें कौन समर्थ हो सकता है? [क्रीडाखण्ड ८४।६३] यमीश्वरोऽवति सदा तं हन्तुं यः समीहते। स एव विलयं याति पतङ्ग इव दीपकः॥ भगवान् जिसकी सदा रक्षा करते हैं, उसे जो मारनेकी इच्छा करता है, निश्चय ही वह उसी प्रकार विनष्ट हो जाता है, जैसे दीपकके पास जानेवाला पतिंगा नष्ट हो जाता है। [क्रीडाखण्ड ८६।२९] सन्तः प्राणात्यये प्राप्ते न भाषन्तेऽनृतं क्वचित्। सन्तोंका यह स्वभाव होता है कि वे प्राणोंपर संकट आ जानेपर भी कभी भी मिथ्या वचन नहीं बोलते। [क्रीडाखण्ड ९२।३२] सभायामागतः साधुरसाधुर्दुर्बलो बली। प्रष्टव्यो माननीयश्च नीतिरेषा सनातनी॥ सभामें जो कोई भी आये, चाहे वह साधु हो या असाधु, दुर्बल हो अथवा बलवान्; वह सम्माननीय होता है, उससे कुशल-क्षेम पूछना चाहिये—यही सनातन नीति है। [क्रीडाखण्ड १११।८-९] प्रसङ्गं नैव जानासि यतो वाचस्पतेरपि। अज्ञानात् प्रकृतार्थस्य वचो याति वृथार्थताम्॥ तुम प्रसंगानुकूल बात करना नहीं जानते हो, अज्ञानवश समयके अनुकूल बात न करनेवालेका वचन सर्वथा व्यर्थ हो जाता है, चाहे वह बृहस्पति ही क्यों न हो। [क्रीडाखण्ड १११।२४] नायकेन न हन्तव्यो दूतस्तेनापि नायकः। स्वामीको दूतका वध नहीं करना चाहिये और [ठीक इसी प्रकार] दूतको भी स्वामीका वध नहीं
[दायाँ स्तम्भ] करना चाहिये। [क्रीडाखण्ड १११।३३] अशुभात्कर्मणो दुःखं सुखं स्याच्छुभकर्मणः। अतः सन्तः प्रकुर्वन्ति शुभं कर्म सदादरात्॥ हितं च सर्वजन्तूनां कायेन मनसा गिरा। अशुभ कर्मसे दुःख और शुभकर्मसे सुखकी प्राप्ति होती है, अतः सदाचारी पुरुष सदा ही बड़े आदरपूर्वक शुभ कर्म ही करते हैं और शरीरसे, मनसे तथा वाणीसे सभी प्राणियोंका कल्याण करते हैं। [क्रीडाखण्ड ११७।१७-१८] निरुपाधितया दुःखं यः परस्य निवारयेत्। तद्दुःखदुःखी च पुमान् पुरुषार्थी स भण्यते॥ जो मनुष्य निश्छल भावसे दूसरेके दुःखका निवारण करता है, और उसके दुःखके कारण स्वयं भी दुःखका अनुभव करता है, वह व्यक्ति ही पुरुषार्थी कहा जाता है। [क्रीडाखण्ड ११७।२१] क्षीणे ऋणानुबन्धे च स्त्री पुत्रः पशुरेव च। न तिष्ठति ध्रुवं तत्र कृतः शोको वृथा भवेत्॥ यह निश्चित है कि ऋणका बन्धन छूट जानेपर, स्त्री, पुत्र, पशु—कुछ भी इस संसारमें स्थिर नहीं रहता, अतः शोक करना व्यर्थ है। [क्रीडाखण्ड १२०।२६] यथा काष्ठं काष्ठगतं पूरे स्याच्च वियुज्यते। तद्वज्जन्तुर्वियोगं च योगं च प्राप्नुतेऽवशः॥ जिस प्रकार जलप्रवाहमें बहते हुए दो काष्ठ कभी जुड़ जाते हैं तो कभी अलग हो जाते हैं, वैसे ही [प्रारब्धके कारण] विवश हुआ प्राणी [दूसरे प्राणीके साथ] कभी संयोग तो कभी वियोग प्राप्त करता है। [क्रीडाखण्ड १२०।२७] न लघुर्लघुतामेति पराक्रमयुतोऽपि चेत्। अणुमात्रो दहेद्वह्निः सकलं नगरं महत्॥ यदि पराक्रमी व्यक्ति लघु [आकारवाला] हो, तो भी उसे लघु मानना अनुचित है, वह लघु प्रभाववाला नहीं होता, जैसे अग्निकी चिनगारी अणुवत् हो करके भी विशाल नगरको सम्पूर्णतः जला सकती है। [क्रीडाखण्ड १३७।८]