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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] महान् क्षुद्रस्य वाक्यं चेत् कुरुते सोऽपि साधुताम्। प्राप्नोति सर्वलोकेषु कीर्तिं स्फीतां समुत्कटाम्॥ यदि कोई महापुरुष क्षुद्र व्यक्तिके अनुरोध वचनको स्वीकार करता है तो वह भी साधुताको प्राप्त करता है और सभी लोकोंमें अत्यन्त उत्कर्षयुक्त विशद यशको प्राप्त करता है। [उपासनाखण्ड ७८।२०] ईश्वरे सानुकूले कः पीडितुं क्षमते जनम्। यदि ईश्वर अनुकूल हो तो व्यक्तिको मारनेमें कौन समर्थ हो सकता है? [क्रीडाखण्ड ८४।६३] यमीश्वरोऽवति सदा तं हन्तुं यः समीहते। स एव विलयं याति पतङ्ग इव दीपकः॥ भगवान् जिसकी सदा रक्षा करते हैं, उसे जो मारनेकी इच्छा करता है, निश्चय ही वह उसी प्रकार विनष्ट हो जाता है, जैसे दीपकके पास जानेवाला पतिंगा नष्ट हो जाता है। [क्रीडाखण्ड ८६।२९] सन्तः प्राणात्यये प्राप्ते न भाषन्तेऽनृतं क्वचित्। सन्तोंका यह स्वभाव होता है कि वे प्राणोंपर संकट आ जानेपर भी कभी भी मिथ्या वचन नहीं बोलते। [क्रीडाखण्ड ९२।३२] सभायामागतः साधुरसाधुर्दुर्बलो बली। प्रष्टव्यो माननीयश्च नीतिरेषा सनातनी॥ सभामें जो कोई भी आये, चाहे वह साधु हो या असाधु, दुर्बल हो अथवा बलवान्; वह सम्माननीय होता है, उससे कुशल-क्षेम पूछना चाहिये—यही सनातन नीति है। [क्रीडाखण्ड १११।८-९] प्रसङ्गं नैव जानासि यतो वाचस्पतेरपि। अज्ञानात् प्रकृतार्थस्य वचो याति वृथार्थताम्॥ तुम प्रसंगानुकूल बात करना नहीं जानते हो, अज्ञानवश समयके अनुकूल बात न करनेवालेका वचन सर्वथा व्यर्थ हो जाता है, चाहे वह बृहस्पति ही क्यों न हो। [क्रीडाखण्ड १११।२४] नायकेन न हन्तव्यो दूतस्तेनापि नायकः। स्वामीको दूतका वध नहीं करना चाहिये और [ठीक इसी प्रकार] दूतको भी स्वामीका वध नहीं

[दायाँ स्तम्भ] करना चाहिये। [क्रीडाखण्ड १११।३३] अशुभात्कर्मणो दुःखं सुखं स्याच्छुभकर्मणः। अतः सन्तः प्रकुर्वन्ति शुभं कर्म सदादरात्॥ हितं च सर्वजन्तूनां कायेन मनसा गिरा। अशुभ कर्मसे दुःख और शुभकर्मसे सुखकी प्राप्ति होती है, अतः सदाचारी पुरुष सदा ही बड़े आदरपूर्वक शुभ कर्म ही करते हैं और शरीरसे, मनसे तथा वाणीसे सभी प्राणियोंका कल्याण करते हैं। [क्रीडाखण्ड ११७।१७-१८] निरुपाधितया दुःखं यः परस्य निवारयेत्। तद्दुःखदुःखी च पुमान् पुरुषार्थी स भण्यते॥ जो मनुष्य निश्छल भावसे दूसरेके दुःखका निवारण करता है, और उसके दुःखके कारण स्वयं भी दुःखका अनुभव करता है, वह व्यक्ति ही पुरुषार्थी कहा जाता है। [क्रीडाखण्ड ११७।२१] क्षीणे ऋणानुबन्धे च स्त्री पुत्रः पशुरेव च। न तिष्ठति ध्रुवं तत्र कृतः शोको वृथा भवेत्॥ यह निश्चित है कि ऋणका बन्धन छूट जानेपर, स्त्री, पुत्र, पशु—कुछ भी इस संसारमें स्थिर नहीं रहता, अतः शोक करना व्यर्थ है। [क्रीडाखण्ड १२०।२६] यथा काष्ठं काष्ठगतं पूरे स्याच्च वियुज्यते। तद्वज्जन्तुर्वियोगं च योगं च प्राप्नुतेऽवशः॥ जिस प्रकार जलप्रवाहमें बहते हुए दो काष्ठ कभी जुड़ जाते हैं तो कभी अलग हो जाते हैं, वैसे ही [प्रारब्धके कारण] विवश हुआ प्राणी [दूसरे प्राणीके साथ] कभी संयोग तो कभी वियोग प्राप्त करता है। [क्रीडाखण्ड १२०।२७] न लघुर्लघुतामेति पराक्रमयुतोऽपि चेत्। अणुमात्रो दहेद्वह्निः सकलं नगरं महत्॥ यदि पराक्रमी व्यक्ति लघु [आकारवाला] हो, तो भी उसे लघु मानना अनुचित है, वह लघु प्रभाववाला नहीं होता, जैसे अग्निकी चिनगारी अणुवत् हो करके भी विशाल नगरको सम्पूर्णतः जला सकती है। [क्रीडाखण्ड १३७।८]

अङ्क ] * श्रीगणेशपुराण-सूक्तिसुधा * ३३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वासनासहितादाद्यात्संसारकारणाद् दृढात्। अज्ञानबन्धनाज्जन्तुर्बुद्ध्वायं मुच्यतेऽखिलात् ॥ वासना; जो कि संसारका मूल और दृढ़ कारण है, और वही अज्ञानका बन्धन है, इसे जानकर प्राणी सबसे मुक्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।२१] क्रियायामक्रियाज्ञानमक्रियायां क्रियामतिः। यस्य स्यात्स हि मर्त्येऽस्मिँल्लोके मुक्तोऽखिलार्थकृत् ॥ क्रियामें अक्रियाका ज्ञान और अक्रियामें क्रियाकी बुद्धि जिसकी होती है, वही इस लोकमें सभी कर्मोंका करनेवाला होकर भी मुक्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।२४] कर्माङ्कुरवियोगेन यः कर्माण्यपि चेह वा। तत्त्वदर्शननिर्दग्धक्रियमाहुर्बुधा बुधम् ॥ जो कर्मोंके अंकुरसे रहित अर्थात् संकल्प और कामनारहित कर्म करते हैं, तत्त्वके जाननेसे उस बुद्धिमान्‌की सारी क्रियाएँ दग्ध हो जाती हैं, ऐसा पण्डितजन कहते हैं। [क्रीडाखण्ड १४०।२५] निरीहो निगृहीतात्मा परित्यक्तपरिग्रहः। केवलं वैग्रहं कर्माचरन्नायाति पातकम् ॥ जो इच्छारहित, आत्मजित् एवं सम्पूर्ण परिग्रहका परित्याग किये हैं, ऐसे व्यक्ति यदि शरीरनिमित्तक (जीवननिर्वाहार्थ) कर्म भी करें तो उन्हें कुछ पातक नहीं लगता। [क्रीडाखण्ड १४०।२७] अद्वन्द्वोऽमत्सरो भूत्वा सिद्ध्यासद्ध्योः समश्च यः। यथाप्राप्तीह सन्तुष्टः कुर्वन् कर्म न बद्ध्यते ॥ जो द्वन्द्व और ईर्ष्याहीन होकर सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टि रखते हुए जो कुछ प्राप्ति हो, उसीमें सन्तुष्ट रहते हैं, ऐसे प्राणी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते। [क्रीडाखण्ड १४०।२८] सर्वेषां भूप यज्ञानां ज्ञानयज्ञः परो मतः। अखिलं लीयते कर्म ज्ञाने मोक्षस्य साधने ॥ हे राजन्! सब यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। मोक्षसाधक ज्ञानयज्ञमें सब कर्म क्षीण हो जाते हैं। [क्रीडाखण्ड १४०।३९] भक्तिमानिन्द्रियजयी तत्परो ज्ञानमाप्नुयात्। लब्ध्वा तत्परमं मोक्षं स्वल्पकालेन यात्यसौ ॥ इन्द्रियोंको वशमें करनेवाला भक्तिमान्, तत्पर पुरुष ही ज्ञानको प्राप्त कर सकता है और ज्ञान प्राप्त होनेसे थोड़े समयमें ही वह मुक्तिको प्राप्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।४७] भक्तिहीनोऽश्रद्दधानः सर्वत्र संशयी तु यः। तस्य शं नापि विज्ञानमिह लोकोऽथ वा परः ॥ जो भक्तिहीन, श्रद्धारहित और सर्वत्र संदिग्ध चित्तवाला है, उसे कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती, न ज्ञान होता है तथा उसका इहलोक और परलोक नष्ट हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।४८] जेतारः षड्रिपूणां ये शमिनो दमिनस्तथा। तेषां समन्ततो ब्रह्म स्वात्मज्ञानां विभात्यहो ॥ जो काम-क्रोधादि छहों शत्रुओंको जीत चुके हैं, जो शम और दमका पालन करते हैं, उन आत्मज्ञानियोंको सर्वत्र ब्रह्म ही दीखता है। [क्रीडाखण्ड १४१।२५] यो निग्रहं दुर्ग्रहस्य मनसः सम्प्रकल्पयेत्। घटीयन्त्रसमादस्मान्मुक्तः संसृतिचक्रकात् ॥ [हे राजन्!] जो निग्रह करनेमें कठिन इस मनका नियमन करता है, वह घटीयन्त्रके समान घूमनेवाले इस संसारचक्रसे मुक्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४२।२०] यं यं देवं स्मरन् भक्त्या त्यजति स्वं कलेवरम्। तत्तत्सालोक्यमायाति तत्तद्भक्त्या नराधिप ॥ भक्तिपूर्वक जिस-जिस देवताको स्मरण करता हुआ प्राणी अपने कलेवरका त्याग करता है, हे राजन्! उनकी भक्ति करनेसे उन्हींके लोकको प्राप्त होता है। [क्रीडाखण्ड १४३।१७] अनन्यशरणो यो मां भक्त्या भजति भूमिप। योगक्षेमौ च तस्याहं सर्वदा प्रतिपादये ॥ हे राजन्! जो अनन्यशरण होकर भक्तिसे मेरा भजन करता है, मैं सदा उसके योगक्षेम (मंगल)-का विधान करता हूँ। [क्रीडाखण्ड १४३।२०] कामो लोभस्तथा क्रोधो दम्भश्चत्वार इत्यमी। महाद्वाराणि वीचीनां तस्मादेतांस्तु वर्जयेत् ॥ काम, लोभ, क्रोध, दम्भ-ये नरकके चार महाद्वार हैं, इस कारण इनको त्यागना चाहिये। [क्रीडाखण्ड १४७।२३]

३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- भगवान् श्रीगणेशजीकी आरती आरति गजवदन विनायक की। सुर-मुनि-पूजित गणनायक की ॥ टेक ॥ एकदंत शशिभाल गजानन, विघ्नविनाशक शुभगुण-कानन, शिवसुत वन्द्यमान-चतुरानन, दुःख-विनाशक सुखदायक की ॥ सुर० ॥ ऋद्धि-सिद्धि-स्वामी समर्थ अति, विमल बुद्धि दाता सुविमल-मति, अघ-वन-दहन, अमल अविगत-गति, विद्या-विनय-विभव-दायक की ॥ सुर० ॥ पिङ्गल नयन, विशाल शुण्डधर, धूम्रवर्ण शुचि वज्राङ्कुश-कर, लम्बोदर बाधा-विपत्ति-हर, सुर-वन्दित सब बिधि लायक की ॥ सुर० ॥

सम्पादकीय लेख— श्रीगणेशपुराण—एक परिचय

अत्यन्त प्राचीन कालकी बात है, सौराष्ट्रदेशके प्रसिद्ध देवनगरमें शास्त्र-मर्मज्ञ सोमकान्त नामक धर्मपरायण एक नरेश थे। वे अतिशय सुन्दर, विद्वान्, धनवान्, तेजस्वी एवं पराक्रमी थे। उनकी बुद्धिमती, अनिन्द्य सुन्दरी, धर्मपरायणा सती पत्नीका नाम सुधर्मा था। सुधर्माके गर्भसे हेमकण्ठ नामक अत्यन्त सुन्दर, शूर, पराक्रमी एवं विद्या-विनय-सम्पन्न पुत्र उत्पन्न हुआ। हेमकण्ठ अपने माता-पिताके सर्वथा अनुकूल था और वह सोमकान्तके शासन-कार्यमें दक्षतापूर्वक सहयोग प्रदान करता रहता था। रूपवान्, विद्याधीश, क्षेमंकर, ज्ञानगम्य और सुबल नामक पाँच स्वामिभक्त अमात्य भी राजा सोमकान्तकी प्रत्येक रीतिसे सेवा किया करते। सोमकान्तके राज्यमें प्रजा समृद्ध एवं सुखी थी। वह सर्वथा निरापद जीवन व्यतीत करती थी। साधु और ब्राह्मण निश्चिन्त होकर श्रीभगवान्की आराधना किया करते थे। सहसा सोम-तुल्य राजा सोमकान्तको गलितकुष्ठ हो गया। उनके शरीरमें सर्वत्र घाव हो गये। उनसे रक्त और पीब बहने लगा। नरेशने प्रख्यात चिकित्सकोंसे अनेक उपचार करवाये, किंतु उनसे उनको कोई लाभ नहीं हुआ। यशस्वी नरपति अत्यन्त निर्बल तो हो ही गये थे, उनके व्रणोंमें कीड़े पड़ गये और उनसे दुर्गन्ध निकलने लगी। अत्यन्त दुखी होकर देवनगर-नरेशने अपना शेष जीवन अरण्यमें जाकर तपश्चरणमें व्यतीत करनेका निश्चय किया। उन्होंने विधिपूर्वक अपने सुयोग्य पुत्र हेमकण्ठको आचार, धर्म और नीतिकी शिक्षा दी। तदनन्तर उसे राज्य-पदपर अभिषिक्त कर दिया। नरेशने अपने परम बुद्धिमान् एवं राजभक्त क्षेमंकर, रूपवान् और विद्याधीश नामक अमात्यत्रयको युवराजके सहयोगसे सुचारूरूपसे राज्य-संचालनका आदेश प्रदान किया। तदनन्तर राजा सोमकान्तने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा की। फिर उन्हें विविध प्रकारके व्यंजनोंसे तृप्तकर बहुमूल्य दक्षिणाएँ प्रदान कीं। राजा वनके लिये प्रस्थित हुए तो प्रजावत्सल नरेशके वियोगकी कल्पनासे समस्त प्रजा व्याकुल हो गयी। हेमकण्ठके दुःखकी सीमा नहीं थी। वह प्रजाके साथ रोता हुआ पिताके साथ पीछे-पीछे चल रहा था, किंतु नरेशने अपनी सहधर्मिणी सुधर्मा तथा सुबल और ज्ञानगम्य— दो अमात्योंके अतिरिक्त अन्य सबको समझाकर लौट जानेका आदेश दिया। हेमकण्ठको विवशतः अपनी प्रजाके साथ लौटना पड़ा। चिन्तित, दुखी, पीड़ित, निराश और उदास नरेश अपनी पत्नी सुधर्मा और दोनों अमात्योंके साथ वनके कष्ट सहते चले जा रहे थे। सती सुधर्मा अपने पतिकी निरन्तर सेवा किया करती और दोनों मन्त्री उनके लिये फल-फूल ढूँढ़कर ले आते। इस प्रकार यात्रा करते हुए वे सघन वनमें एक सरोवरके तटपर पहुँचे। सोमकान्त व्रणोंकी पीड़ा और यात्राके कष्टसे लेट गये थे। सुधर्मा उनके चरण दबा रही थी। दोनों मन्त्री फल-मूलके लिये कुछ दूर निकल गये थे। उसी समय

३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- जल भरनेके लिये कलश लिये एक तेजस्वी मुनिकुमार सरोवरके तटपर पहुँचे। सती सुधर्माने उन मुनिपुत्रसे पूछा—'आप किसके पुत्र हैं और यहाँ कैसे पधारे हैं?' अत्यन्त मधुर वाणीमें ऋषिकुमारने उत्तर दिया— 'मैं महात्मा भृगुकी सती पत्नी पुलोमाका पुत्र हूँ। च्यवन मेरा नाम है। आपलोग कौन हैं और इस निबिड़ वनमें कैसे आये हैं?' अत्यन्त दुखी सुधर्माने मुनिकुमारसे अपना विस्तृत परिचय देते हुए कहा—'महात्मन्! परम प्रतापी, समस्त ऐश्वर्योंका उपभोग करनेवाले मेरे स्वामी पता नहीं, किस कर्मका फल भोग रहे हैं? ऋषि स्वाभाविक दयालु होते हैं। आप दयापूर्वक हमारे कल्याणका कोई उपाय कीजिये।' अत्यन्त दुःखके कारण रानीके नेत्रोंसे आँसू बहने लगे। मुनिपुत्र च्यवनने चुपचाप सरोवरके जलसे कलश भरा और शीघ्रतासे अपने आश्रम पहुँचे। वहाँ महर्षि भृगुने उनसे विलम्बका कारण पूछा तो उन्होंने राजा सोमकान्तकी दुर्दशा और उनकी पत्नीकी अद्भुत सेवाका अत्यन्त करुण वर्णन सुनाया। कृपामय महात्मा भृगुने अपने पुत्रसे कहा—'बेटा! तुम उन लोगोंको यहीं ले आओ।' च्यवन पुनः सरोवर-तटपर पहुँचे। तबतक राजाके दोनों अमात्य भी वहाँ आ गये थे। च्यवनने महारानीसे कहा—'माता! मेरे तपस्वी पिताने आपलोगोंको आश्रममें बुलाया है।' सुधर्मा अत्यन्त प्रसन्न हुई। वह अपने पति एवं सेवकोंसहित मुनिपुत्रके पीछे-पीछे महर्षिके आश्रम- पर पहुँची। महर्षि भृगुका आश्रम अत्यन्त पवित्र एवं सुखद था। उसमें सर्वत्र विविध प्रकारके सुगन्धित पुष्प खिले थे। आश्रममें वृक्षोंपर विविध प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे थे। विडाल, नेवला, बाज, मयूर, सर्प, गज, गाय, सिंह और व्याघ्र आदि सभी प्राणी अपना वैरभाव त्यागकर एक साथ सुखपूर्वक रह रहे थे। वेद-पाठ हो रहा था और यज्ञ-धूमसे समस्त आश्रम पावनताका विग्रह बना हुआ था। सोमकान्त, उनकी पत्नी सुधर्मा और दोनों मन्त्रियोंने व्याघ्रचर्मपर आसीन परम तेजस्वी तपस्वी महर्षि भृगुको देखा तो दण्डकी भाँति उनके चरणोंपर गिर पड़े। नरेशने हाथ जोड़कर निवेदन किया—'प्रभो! आपके दर्शनसे मेरे पुण्य उदित हो गये। मैंने जीवनभर धर्मका पालन किया है, किंतु पता नहीं, मेरे किस महान् पातकसे मेरी ऐसी दुर्दशा हो रही है कि मेरा जीवन दुर्बह हो गया है। मेरे सभी प्रयत्न विफल हो गये हैं। अब मैं आपकी शरणमें हूँ। आपके आश्रममें हिंस्र पशुओंने भी अपना सहज वैर त्याग दिया है। दयामय! आप मुझपर दया करें।' नरेशके करुण वचन सुन महर्षि भृगु कुछ क्षणोंके लिये ध्यानस्थ हुए और फिर उन्होंने उनसे कहा— 'राजन्! तुम चिन्ता मत करो। मैं तुम्हें रोगसे छूटनेका उपाय बताऊँगा। अभी तुमलोग यात्रासे थके हुए हो; स्नान, भोजन और विश्राम करो।' वहाँ सबने तेल लगाकर स्नान किया और फिर वे भोजन करने बैठे। अनेक प्रकारके सुस्वादु षड्रस व्यंजन थे। राजा, रानी और अमात्य उक्त पवित्रतम आहारसे पूर्ण तृप्त हुए और फिर परम त्यागी महर्षि भृगुके आश्रममें राज्योचित व्यवस्थासे चकित-विस्मित नरेश अपनी पत्नी एवं सेवकोंसहित सुकोमल शय्यापर विश्राम करने लगे। रात्रि व्यतीत हुई। अरुणोदय हुआ। महर्षि भृगु स्नान, संध्या, जप और होम आदिसे निवृत्त हुए ही थे कि दैनिक कृत्य कर राजा सोमकान्तने अपनी सहधर्मिणी सुधर्मा एवं अमात्योंसहित महामुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनके सम्मुख बैठ गये। 'राजन्! पूर्वके जिन कुकर्मोंसे तुम्हें गलितकुष्ठकी यह दारुण यातना सहनी पड़ रही है, उसे बता रहा हूँ; तुम ध्यानपूर्वक सुनो!' करुणहृदय महात्मा भृगु राजा सोमकान्तको उनके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाते हुए कहने

अङ्क ] * श्रीगणेशपुराण-एक परिचय * ३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

लगे—'विन्ध्यगिरिके निकट कोल्हार नामक सुन्दर नगरमें चिद्रूप नामक एक धन-वैभवसम्पन्न वैश्य था। पतिके अनुकूल जीवन व्यतीत करनेवाली उसकी सुन्दरी पत्नीका नाम सुभगा था। तुम उसी सुभगाके पुत्र थे। तुम्हारा नाम था कामद।' एकमात्र पुत्र होनेके कारण माता-पिताने तुम्हारा अतिशय प्रीतिपूर्वक पालन किया। युवक होनेपर कुटुम्बिनी नामक सुन्दरी और सद्धर्मपरायणा युवतीसे तुम्हारा विवाह हुआ। कुटुम्बिनीके गर्भसे तुम्हारे सात कन्याएँ और पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। कुछ समय बाद तुम्हारे पिता चिद्रूपका शरीरान्त हो गया। तुम्हारी पतिपरायणा माता सुभगा अपने पतिके साथ सती हो गयी। तुम धनसम्पन्न और पूर्ण स्वतन्त्र थे। दुराचरणमें तुमने अपना सर्वस्व नष्ट कर दिया। यहाँतक कि घर भी बिक गया। तुम्हारी सरला पत्नी समझाती, पर तुम उसकी उपेक्षा कर देते। विवशतः वह अपनी संततियोंके साथ अपने पिताके घर जाकर जीवन- निर्वाह करने लगी। तुम दुराचरण-सम्पन्न सर्वथा निरंकुश थे। बलपूर्वक दूसरेका धन छीनकर मद्य, मांस और परस्त्रीका सेवन करते। तुम्हारी दुष्टता पराकाष्ठापर पहुँच गयी, तब राजाज्ञासे तुम नगरसे निर्वासित कर दिये गये। तुम वनमें पहुँचे। वहाँ तुम दस्यु-जीवन व्यतीत करने लगे। तुमसे भयभीत होकर मनुष्य ही नहीं, पशु भी प्राण बचाकर भागते थे। तुम पर्वतकी गुफामें रहते थे। तुम्हारे श्वशुरने तुमसे भयभीत होकर तुम्हारी पत्नी और बच्चोंको तुम्हारे पास पहुँचा दिया। तुम्हारी पत्नीके पास वस्त्राभरण थे और तुम्हारे पुत्र भी तेजस्वी थे; किंतु तुम रात्रिमें यात्रियोंको लूटकर उनके धन और स्त्रीका उपभोग करते। तुम सर्वथा निर्दय और हृदयहीन हो गये थे। एक बार एक ब्राह्मण अपनी युवती पत्नीके साथ उधरसे जा रहे थे। तुमने उन्हें पकड़ लिया। ब्राह्मणने करुण प्रार्थना की, धर्मोपदेश दिया, पर तुमपर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तुमने उन दीन ब्राह्मणदेवताका मस्तक उतार लिया। इस प्रकार तुम प्रतिदिन स्त्री, वृद्ध और बालकोंकी निर्दयतापूर्वक हत्या करते ही रहे। तुम सर्वथा विवेक- भ्रष्ट हो गये थे। तुम्हारा यौवन तो हत्या, लूट, परधन एवं पर- दारापहरणमें बीता; पर देखते-ही-देखते वृद्धावस्था आ गयी। तुम निर्बल हो गये। तुम्हारा शरीर काँपने लगा और तुमको अनेक प्रकारके कष्ट होने लगे। इस स्थितिमें तुम्हारा स्वजन या हितैषी कोई नहीं रहा। पुत्र और नौकर आदि सभी तुम्हारा तिरस्कार करते रहते। तुम निरन्तर दुखी रहने लगे। तुमने सोचा, 'अपना शेष धन दान कर दूँ।' तुम्हारी प्रार्थनासे एक ब्राह्मण वनमें गये। उनकी प्रार्थनापर ऋषिगण तुम्हारे पास आये, पर जब तुमने अपना धन उन्हें स्वीकार करनेके लिये आग्रह किया, तो वे तुरंत उलटे पैर वापस चले गये। सबने एक ही बात कही—'तेरे-जैसे अधम, हत्यारे, मद्यप, परस्त्रीगामी एवं क्रूरतम पापात्माका दिया धन लेनेका साहस कौन करेगा?' तुम रोगाक्रान्त थे। मुनियों और ब्राह्मणोंके वचन सुन मन-ही-मन पश्चात्ताप करने लगे। तुम्हारा हृदय हाहाकार कर रहा था, पर कोई वश नहीं था। तुम्हारे पास चाँदी, सोना और रत्नादि अधिक थे। तुमने ब्राह्मणोंके परामर्शसे एक पुरातन गणेश-मन्दिरका जीर्णोद्धार करवाया। मन्दिरके भव्य और आकर्षक बनवानेमें तुम्हारा सारा धन समाप्त हो गया। कुछ तुम्हारी स्त्री और कुछ तुम्हारे पुत्रों और मित्रोंने ले लिया। कुछ ही समय बाद तुम्हारा देहावसान हो गया। यमदूतोंने तुम्हें बड़ी यातना दी। यमके पूछनेपर तुमने पहले पुण्यकर्मोंका फल प्राप्त करना स्वीकार किया। फलतः अत्यधिक कान्तिपूर्ण गणेश-मन्दिरका जीर्णोद्धार करानेके कारण तुम सुन्दर राजा सोमकान्त हुए और तुम्हें अत्यन्त रूपवती धर्मपत्नी भी प्राप्त हो गयी।''

३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] सर्वथा निःस्पृह, परम वीतराग, दयामूर्ति महर्षि भृगु राजा सोमकान्तको उसके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुना रहे थे, किंतु ऋषि-वचनोंपर उसे विश्वास नहीं हुआ। राजाके मनमें सन्देह उत्पन्न होते ही उनके शरीरसे विविध रंगके पक्षी निकल पड़े और उनके अंग-प्रत्यंग नोच-नोचकर खाने लगे। दुःखसे छटपटाते हुए राजाने महामुनि भृगुसे करुण प्रार्थना की—'मुनिनाथ! आपके इस वनमें पशु भी अपना सहज वैर त्याग देते हैं, फिर आपकी शरणमें आये मुझ कुष्ठीको ये पक्षी कष्ट क्यों दे रहे हैं? आप कृपापूर्वक मेरी रक्षा करें।' 'तुमने मेरे वचनपर सन्देह किया, इस कारण मैंने तुम्हें इतना अनुभव करा दिया। अब ये पक्षी शीघ्र चले जायँगे।' महर्षिने क्षणभर ध्यानस्थ होनेके अनन्तर कहा—'तुम्हारे पातक महान् हैं, तथापि मैं उन्हें दूर करनेका उपाय बताऊँगा।' 'हुं' महामुनि भृगुके उच्चारण करते ही समस्त पक्षी अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर महात्मा भृगुने राजा सोमकान्तको गणेशका 'अष्टोत्तरशतनाम' सुनाया और उससे अभिमन्त्रित जल राजाके शरीरपर छिड़क दिया। उक्त जलका छींटा पड़ते ही राजाकी नासिकासे एक छोटा काले मुखवाला बालक धरतीपर गिर पड़ा। थोड़ी ही देरमें वह अत्यन्त विशाल और भयानक हो गया। उसके मुखसे अग्निकी ज्वालाएँ निकल रही थीं। वहाँ सर्वत्र रक्त और पीब फैल गया। भयाक्रान्त आश्रम- वासियोंको भागते देखकर महर्षि भृगुने उस पुरुषसे उसका परिचय पूछा। उक्त भयानक पुरुषने उत्तर दिया—'मैं प्रत्येक प्राणीके शरीरमें रहनेवाला पापपुरुष हूँ। आपके अभिमन्त्रित जलका छींटा पड़नेसे इस राजाके शरीरसे निकला हूँ। आप मुझे निवास एवं भक्ष्य प्रदान कीजिये; अन्यथा मैं आपके सम्मुख ही सबके साथ इस राजा सोमकान्तको भी खा जाऊँगा।'

[दायाँ स्तम्भ] महामुनि भृगुने वहाँसे हटकर एक शुष्क आम्रवृक्षके कोटरकी ओर संकेत करते हुए उक्त पापपुरुषसे कहा— 'नीच! तू सूखे पत्तोंको खाकर इस कोटरमें रह; अन्यथा मैं तुझे भस्म कर दूँगा।' महामुनि भृगुकी वाणी सुनकर पापपुरुषने उस वृक्षका स्पर्श किया ही था कि पक्षियोंसहित वृक्ष तुरंत जलकर भस्म हो गया। मुनिसे भयभीत पापपुरुष भी उस भस्ममें छिप गया। इसके अनन्तर महर्षि भृगुने राजा सोमकान्तके समीप जाकर कहा—'जब तुम 'गणेशपुराण' सुनना प्रारम्भ करोगे, तब इस भस्मसे पुनः नया आम्रवृक्ष उगेगा। जिस प्रकार यह वृक्ष धीरे-धीरे बढ़ता जायगा, उसी प्रकार तुम्हारे पाप भी नष्ट होते जायँगे।' चकित होकर नरेशने अत्यन्त विनयपूर्वक महर्षिसे पूछा—'मुनिवर! ऐसा पुराण तो मैंने न कहीं देखा और न सुना ही है। वह कहाँ प्राप्त होगा और उसके वक्ता कहाँ हैं?' दयालु मुनि भृगुने कहा—'पहले उसे वेदगर्भ ब्रह्माने महर्षि व्यासको सुनाया था और उनकी कृपासे वह पापनाशक 'गणेशपुराण' मुझे प्राप्त हुआ। तुम तीर्थमें जाकर पहले 'गणेशपुराण'-श्रवणका संकल्प कर लो।' महर्षि भृगुकी आज्ञासे राजा सोमकान्तने प्रख्यात भृगुतीर्थमें स्नान किया और फिर पवित्र मनसे हाथमें जल लेकर संकल्प किया—'मैं श्रद्धा और विधिपूर्वक गणेशपुराण-श्रवण करूँगा।' राजाके आश्चर्यकी सीमा नहीं थी। संकल्पका जल धरतीपर छोड़ते ही वे पूर्णतया रोगमुक्त होकर पूर्ववत् सुन्दर और तेजस्वी हो गये। गलितकुष्ठकी पीड़ाकी बात तो दूर—शरीरपर उसका कोई चिह्न भी कहीं शेष नहीं रहा। हर्षमग्न नरेश महामुनिके समीप पहुँचे तो उनके चरणोंपर गिर पड़े। उन्होंने अत्यन्त विनयपूर्वक कहा—'मुनिनाथ! अत्यन्त आश्चर्यकी बात है कि

अङ्क] * श्रीगणेशपुराण-एक परिचय * ३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गणेशपुराण-श्रवणके संकल्पका जल छोड़ते ही मेरी सारी व्याधियाँ दूर हो गयीं।' महामुनिने राजाका हाथ पकड़कर उठाया और उन्हें बैठनेके लिये एक आसन दिया। राजाने हाथ जोड़कर कहा- 'दयामय ! आपकी दयासे मेरा सारा कष्ट दूर हो गया। अब आप कृपापूर्वक मुझे 'गणेशपुराण' की कथा सुनाइये।' मुनिवर भृगुने कहा- 'राजन् ! मैं यह पुराण तुम्हें सुनाता हूँ; ध्यानपूर्वक सुनो।' महर्षिने पापनाशक परम पावन गणेशपुराणकी कथा प्रारम्भ करनेके पूर्व उसकी निर्विघ्न समाप्तिके लिये सर्वप्रथम गणेश-वन्दना की- नमस्तस्मै गणेशाय ब्रह्मविद्याप्रदायिने । यस्यागस्त्यायते नाम विघ्नसागरशोषणे ॥ 'जिनका नाम विघ्नोंका समुद्र सोख लेनेके लिये अगस्त्यका काम करता है, उन ब्रह्म-विद्या-प्रदाता गणेशको नमस्कार है।' (गणेशपुराण १।१।१) इस प्रकार गणेशपुराण गणेश-वन्दनसे प्रारम्भ हुआ। पुराण-शब्दका साधारण अर्थ है- पुराना। जिस ग्रन्थमें पुरातन कथाओंका संकलन है, वह 'पुराण' है। किंतु 'पुराण' शब्दकी व्याख्या अत्यन्त विस्तृत है। श्रीमद्भागवत (१२।७।९-१०)-के मतानुसार पुराणके दस लक्षण हैं- सर्गोऽस्याथ विसर्गश्च वृत्ती रक्षान्तराणि च। वंशो वंशानुचरितं संस्था हेतुरपाश्रयः ॥ दशभिर्लक्षणैर्युक्तं पुराणं तद्विदो विदुः। "पुराणोंके पारदर्शी विद्वान् बतलाते हैं कि पुराणोंके दस लक्षण हैं- 'विश्वसर्ग, विसर्ग, वृत्ति, रक्षा, मन्वन्तर, वंश, वंशानुचरित, संस्था (प्रलय), हेतु (ऊति) और अपाश्रय।' किंतु श्रीलोमहर्षण सूतने पुराणके निम्नलिखित पाँच लक्षणोंका ही उल्लेख किया है- सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ 'मन्वन्तरविज्ञान, सृष्टिविज्ञान, प्रतिसृष्टिविज्ञान, वंशविज्ञान और वंशानुचरितविज्ञान।' ये पाँचों लक्षण भी पाँच-पाँच प्रकारके बताये गये हैं; किंतु विस्तार-भयसे यहाँ उनका उल्लेख नहीं किया जा रहा है। 'पुराण' अनादि हैं। प्रारम्भमें एक ही पुराण था, पर था अत्यन्त विस्तृत। उसकी श्लोक-संख्या शतकोटि थी। उसे लोकपितामहने ऋषियोंको सुनाया था। फिर वेदार्थ-दर्शनकी शक्तिके साथ अनादिकालीन पुराणको लुप्त होते देखकर भगवान् कृष्णद्वैपायनने पुराणोंका प्रणयन किया। उन्होंने पुराणोंकी श्लोक-संख्या चार लाख कर दी और उन पुराणोंमें निष्ठाके अनुरूप आराध्यकी प्रतिष्ठाकर कृपामूर्ति महर्षि व्यासने चारों वर्णोंके लिये वेदार्थ सहज सुलभ कर दिया। अष्टादश पुराण प्रसिद्ध हैं, किंतु कुछ विद्वान् उनके महापुराण, उपपुराण, अतिपुराण और पुराण भेद करते हैं और इन प्रत्येककी भी अष्टादश संख्या बतलाते हैं।* इस प्रकार गणेशपुराण अतिपुराण है, किंतु इस पंच- *(१) महापुराण-ब्राह्म, पद्म, शिव, विष्णु, भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड और ब्रह्माण्ड। (२) उपपुराण-भागवत, माहेश्वर, ब्रह्माण्ड, आदित्य, पराशर, सौर, नन्दिकेश्वर, साम्ब, कालिका, वारुण, औशनस्, मानव, कापिल, दुर्वासस्, शिवधर्म, बृहन्नारदीय, नारसिंह और सनत्कुमार। (३) अतिपुराण-कार्तव, ऋजु, आदि, मुद्गल, पशुपति, गणेश, सौर, परानन्द, बृहद्धर्म, महाभागवत, देवी, कल्कि, भार्गव, वसिष्ठ, कौर्म, गर्ग, चण्डी और लक्ष्मी। (४) पुराण-बृहद्विष्णु, शिव उत्तरखण्ड, लघु बृहन्नारदीय, मार्कण्डेय, वह्नि, भविष्योत्तर, वराह, स्कन्द, वामन, बृहद्वामन, बृहन्मत्स्य, स्वल्पमत्स्य, लघुवैवर्त और पाँच प्रकारके भविष्य। जनसामान्यमें महापुराणोंके अतिरिक्त अन्य सभी पुराणोंकी प्रसिद्धि प्रायः उपपुराणोंके रूपमें ही है।

४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 लक्षणात्मक गणेशपुराणकी अपनी विशिष्टता है। आदिदेव गणपतिके उपासकोंका तो यह प्राणप्रिय कण्ठहार है ही, समस्त आस्तिक-समुदायका अत्यन्त प्रिय और आदरणीय ग्रन्थ है। गणेश-साहित्यमें इसका स्थान प्रधान है। 'मुद्गलपुराण' से भी प्राचीन होनेके कारण स्वाभाविक ही इसकी मान्यता अधिक है। श्रुतियोंमें जिस सर्वात्मा, सर्वत्र, अनादि, अनन्त, अखण्ड-ज्ञानसम्पन्न पूर्णतम परमात्मा और उनके पंचदेवात्मक स्वरूपका वर्णन किया गया है, उसके अनुसार परब्रह्म परमेश्वर गणेशका विस्तृत विवेचन 'गणेशपुराण' में किया गया है। वहाँ आदिदेव गणेशको प्रणवरूपी बताया गया है और कहा गया है कि 'समस्त देवता और मुनि उन्हीं परमप्रभुका स्मरण करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र उन्हींकी पूजा करते हैं। वे सर्वकारण-कारण प्रभु ही समस्त जगत्‌के हेतु हैं। उन्हींकी आज्ञासे विधाता सृष्टि रचते हैं, विष्णु पालन एवं शिव संहार करते हैं। उन्हीं परमप्रभुके आदेशसे सूर्यदेव चलते हैं, वायु बहती है, पृथ्वीपर वृष्टि होती है और अग्नि प्रज्वलित होती है। अमित महिमामय प्रभु मंगलमय हैं, करुणामय हैं।' गणेशपुराण दो खण्डोंमें विभक्त है। पूर्वार्ध (उपासना- खण्ड)-में ९२ अध्याय और ४,०९३ श्लोक हैं। दूसरा उत्तरार्ध (क्रीडाखण्ड) १५५ अध्यायमें पूर्ण हुआ है। उसकी श्लोक-संख्या ६,९८६ है। इस प्रकार सम्पूर्ण गणेशपुराण २४७ अध्यायों और ११,०७९ श्लोकोंमें वर्णित है। पुराणकी दृष्टिसे इसका कलेवर भी लघु नहीं है। इसके प्रधान विषय प्रथमेश्वर गणेश ही हैं। अत्यन्त प्रांजल भाषामें गणेश-स्वरूप, गणेश- तत्त्व, गणेश-महिमा, गणेश-मन्त्र-माहात्म्य एवं गणेशकी सुमधुर लीला-कथाके माध्यमसे महिमामय गणेश- स्तवन 'गणेशपुराण' में इस प्रकार वर्णित हैं कि श्रोता अन्ततक भगवान् गणेशके ध्यानमें तन्मय रहता है। लीला-कथा उसके मर्मको स्पर्श करती चलती है। गणेशपुराणमें आद्यन्त सत्त्वकी प्रतिष्ठा एवं तमका विरोध पाया जाता है। आसुरी प्रवृत्तियोंके विनाश एवं दैवी-सम्पदाओंकी स्थापना एवं वृद्धिके लिये ही गजमुखकी अवतारणा होती है। एक बार ग्रन्थ आरम्भ कर लेनेपर पाठक और श्रोताके लिये उसे बीचमें छोड़ देना सहज सम्भाव्य नहीं होता। किंतु गणेशके गम्भीरतम वचनोंको समझनेके लिये विद्या, बुद्धि एवं गहन विचारके साथ श्रद्धा और भक्ति भी अपेक्षित है। शौनकमुनिने बारह वर्षोंका ज्ञानयज्ञ किया था। वहाँ अठारह पुराणोंकी मंगलमयी कथा हुई थी। उस कथासे अतृप्त ऋषियोंने सूतजीसे श्रीभगवान्‌की भुवनपावनी लीला-कथा और सुनानेकी प्रार्थना की। तब सूतजीने उन्हें गणेशपुराण सुनाकर तृप्त किया। यज्ञके नष्ट होनेपर दक्ष अत्यन्त दुखी थे। उस समय महर्षि मुद्गलने उन्हें गणेशपुराणकी लीला-कथा सुनायी और वहीं ब्रह्मासे सुने हुए महर्षि व्यास-कथित गणेशपुराणको महामुनि भृगुने देवनगरनरेश सोमकान्तको उनके लौकिक एवं पारलौकिक मंगलके लिये सुनानेकी कृपा की। उपासनाखण्डमें परात्पर परमेश्वर, सच्चिदानन्दघन

अङ्क] * श्रीगणेशपुराण-एक परिचय * ४१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गणेशका विस्तृत वर्णन है। गणेश जगत्कर्ता, जगत्स्वरूप, | गणेश प्रत्येक युगमें त्रैलोक्यविजयी अजेय असुरके जगत्पालक, जगदाधार, सर्वसमर्थ, सर्वान्तर्यामी, सर्वत्र | वधके लिये अवतरित होते हैं। अनीति, अधर्म एवं एवं सर्वान्तरात्मा हैं। ब्रह्मादि देव उनकी इच्छाका | अनाचरणसम्पन्न असुरोंका विनाश होता है और धर्ममूर्ति अनुसरण करते हैं। वे भक्तोंके विघ्नोंका विनाश करनेवाले | परमात्मा गजानन धर्मकी स्थापना करते हैं। धरणीका मंगलमूर्ति, मंगलालय, विघ्नकर्ता, विघ्नहर्ता एवं विघ्नराज | भार उतरता है और दुखी देवता, ऋषि तथा ब्राह्मणादि हैं। वे परब्रह्मस्वरूप सर्वानन्द-प्रदाता सर्वानन्दमय हैं। | प्रसन्न होकर अपने धर्मका पालन करने लगते हैं। पितामहने सृष्टिरचना प्रारम्भ की, उस समय | सत्ययुगमें परमप्रभु गणेशका प्रथम अवतार गणेशने उन्हें सहायता प्रदान की। इस वर्णनके अनन्तर | महोत्कट विनायकके रूपमें हुआ था। परमतेजस्वी महर्षि भृगुने गृत्समद, रुक्मांगद एवं त्रिपुरासुरका वृत्तान्त | परमप्रभु विनायकके दस भुजाएँ थीं और सिंह उनका सुनाया। फिर उन्होंने महिमामय 'गणेशसहस्रनाम' का | वाहन था। वे महात्मा कश्यपकी परम सती सहधर्मिणी गान किया। इसी 'गणेशसहस्रनाम' के द्वारा भगवान् | अदितिके यहाँ प्रकट हुए थे। उस अवतारमें उन्होंने देवान्तक शंकर त्रिपुर-वध करनेमें सफल हुए। | और नरान्तक-जैसे दुर्दान्त असुरोंका वध किया था। इसके बाद गणेशपार्थिव-पूजा, गणेशव्रत, संकष्ट- | त्रेतामें इन त्रैलोक्यत्राता प्रभुने शिवप्रिया पार्वतीके चतुर्थीव्रत, अंगारकचतुर्थीव्रत एवं उसका माहात्म्य सुनाकर | यहाँ अवतार लिया। उनकी अंगकान्ति चन्द्र-तुल्य महामुनिने सोमकान्तको गणेशद्वारा चन्द्रमाको शाप- | थी। उनके छः हाथ थे और उनका वाहन मयूर प्रदान एवं उनपर अनुग्रहकी कथा सुनायी। तदनन्तर | था। उन्होंने माता-पिता, ऋषियों, ऋषिपत्नियों एवं उन्होंने दूर्वा-माहात्म्यका वर्णन किया। | मुनि-पुत्रोंको अलौकिक सुख प्रदान किया। तदनन्तर फिर उपासनाखण्डमें पुत्रप्राप्त्यर्थ संकष्टचतुर्थीव्रतके | अनेक असुरोंके साथ वरप्राप्त महादैत्य सिन्धुका वधकर सोद्यापन वर्णनके अनन्तर तारकासुर-वध, काम-दहन, | त्रैलोक्यमें धर्मकी स्थापना की। देवता, मुनि, ब्राह्मणों परशुरामका तप एवं उन्हें गणेश-दर्शनकी प्राप्ति आदि | एवं सद्धर्मपरायण पुरुषोंका दुःख दूर हुआ; उन्हें कथाओंमें सर्वत्र करुणामूर्ति प्रभु गणेशकी करुणा, | सुख-शान्ति प्राप्त हुई। उनकी भक्तवत्सलता एवं महिमाके दर्शन होते हैं। | द्वापरमें सिन्दूरासुरके क्रूरतम शासनमें त्रैलोक्य इसके बाद स्कन्दोत्पत्ति, मदनकी पुनरुत्पत्ति, देवर्षि | विकल-विह्वल हो गया था। देवता और ऋषि आदि नारदकी प्रेरणासे शेषके द्वारा गजाननकी आराधना | तपस्वी गिरि-गुफाओं और अरण्योंमें छिप गये थे। उस एवं स्तुतिका विशद वर्णन करते हुए गजवक्त्रका | समय परमप्रभु विनायक गौरीके यहाँ प्रकट हुए। अपने माहात्म्य गान किया गया है। गजवक्त्रके मंगलमय नाम | दिये वचनके अनुसार उन्होंने भगवान् शिवसे कहा कि और रूपका निरूपण करनेके साथ उपासनाखण्ड पूरा | 'आप मुझे राजा वरेण्यकी सद्यःप्रसूता सहधर्मिणी पुष्पिकाके हुआ है। | समीप पहुँचा दें।' आशुतोष शिवकी आज्ञासे नन्दी उन्हें इसके अनन्तर गणेशपुराणके उत्तरार्ध (क्रीडाखण्ड)- | वरेण्य-पत्नी पुष्पिकाके प्रसूति-गृहमें रख आये। में देवाधिदेव गजमुखके अवतरित होकर पृथ्वीका भार | वे परमप्रभु अरुणवर्णके थे। उनके चार भुजाएँ थीं उतारनेकी पुण्यमयी कथाका वर्णन किया गया है। उन | और उनका वाहन मूषक था। उनका नाम 'गजानन' कथाओंमें गणेशकी बाल-लीलाओं, असुर-संहार एवं | प्रसिद्ध हुआ। भक्तोंकी कामना-पूर्तिका मर्मस्पर्शी चित्रण है। गणेशपुराणके | महर्षि पराशर एवं उनकी सती धर्मपत्नी वत्सलाने क्रीडाखण्डके अनुसार सर्वसमर्थ भक्तवत्सल करुणामय | अत्यन्त प्रीतिपूर्वक उन परमप्रभु गजाननका पालन

४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

किया। उन दयामयने महादैत्य सिन्दूरको मुक्ति प्रदानकर त्रैलोक्यकी भयानक विपत्तिका निवारण किया। तदनन्तर करुणामय गजाननने अपने पिता राजा वरेण्यके अशेष कल्याणके लिये उन्हें अमृतमय उपदेश दिया। वह 'गणेशगीता' के नामसे प्रसिद्ध है। इस गीतामें भगवान् गजाननने सर्वप्रथम सांख्यसारतत्त्वका प्रतिपादन किया है। तदनन्तर कर्मयोग, ज्ञानयोग एवं कर्मसंन्यास-योगका निरूपण कर योगाभ्यासकी प्रशंसा करते हुए बुद्धि-योग और उपासना-योगका सुविस्तृत वर्णन किया है। फिर करुणामय प्रभु गजाननने विश्वरूपदर्शन एवं क्षेत्रज्ञानज्ञेय-विवेकका अत्यन्त प्रभावोत्पादक निरूपण करते हुए योगोपदेशपूर्ण एवं विविध कल्याणकर वचनोंसे अपना सदुपदेश पूर्ण किया। गोपालनन्दन योगेश्वर श्रीकृष्ण-कथित श्रीमद्भगवद्गीताकी भाँति यह गणेशगीता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं परमोपयोगी है। श्रीमद्भगवद्गीताके प्रायः समस्त विषय इस गणेशगीतामें आ गये हैं। इसके अनन्तर गणेशपुराणमें कलिमें होनेवाले अधर्म एवं अनाचारका वर्णन करते हुए इस युगके अन्तमें सर्वभूतहितैषी गणेशके अवतारका वर्णन है। कलिमें जब पापका साम्राज्य व्याप्त हो जायगा, तब वे प्रभु गणेश श्याम कलेवरमें अवतरित होंगे। उनका नाम 'धूम्रकेतु' होगा। उनके दो भुजाएँ होंगी। अश्वा- रूढ़ धूम्रकेतु पापोंका सर्वनाश कर धर्मकी प्रतिष्ठा कर देंगे और फिर सत्ययुगके मंगलमय चरणोंसे धरती प्रमुदित होगी। राजा सोमकान्तने यह पुण्यमयी गणेश-लीला- कथा अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एक वर्षतक सुनी। उस कथा-श्रवणके अद्भुत प्रभावसे वे रोगसे सर्वथा मुक्त एवं परम पवित्र हो गये। उनके लिये पवित्रतम गणेश- लोकसे विमान अवतीर्ण हुआ। गणेश-दूतोंने राजासे उस विमानमें बैठनेकी प्रार्थना की, तब अत्यन्त उपकृत भाग्यवान् राजा सोमकान्तने महर्षि भृगुके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी अनुमति प्राप्तकर अपनी सहधर्मिणी और अमात्य-द्वयसहित विमानमें बैठ गणेश-लोकके लिये प्रस्थित हुए। विमानमें आरूढ़ होनेपर राजाके पूछनेपर गणेश-दूतोंने काशी विश्वेश्वरके आवरणगत रहनेवाले छप्पन गणेशका नाम और उनके स्मरणका माहात्म्य सुनाया। पुराणके अन्तिम अध्यायमें उसके श्रवणका माहात्म्य गान किया गया है। गणेशपुराणके पाठ, श्रवण और उसकी पूजाकी तो अमित महिमा बतायी ही गयी है, ग्रन्थरत्नके लिखने और उसे घरमें रखनेका भी फल बतलाते हुए कहा गया है— यस्य गेहे गणेशस्य पुराणं लिखितं भवेत्। न तत्र राक्षसा भूताः प्रेताश्च पूतनादयः ॥ ग्रहा बालग्रहा नैव पीडां कुर्वन्ति कर्हिचित्। तद्गृहं हि गणेशेन रक्ष्यते सर्वदा स्वयम् ॥ इदं पुराणं शृणुयात् पूजयेद् वा समाहितः। तस्य दर्शनतः पूता भवन्ति पतिता नराः ॥ (श्रीगणेशपुराण २।१५५।९-११) इस प्रकार इन ललित कथाओंके माध्यमसे इस पुराणके द्वारा पाठकों एवं श्रोताओंको आसुरी प्रवृत्तियोंसे सतत सजग रहनेकी प्रेरणा तो प्राप्त होती ही है, दैवी सम्पदाओं एवं उनके मूलस्रोत परब्रह्म परमेश्वर गजवक्त्रके चरणकमलोंमें श्रद्धा और भक्ति भी उदित होती है। उस श्रद्धा-भक्तिसे दयामय गणेश सहज ही द्रवित होकर भक्तका लोक एवं परलोक—दोनों सफल कर देते हैं।* अनन्त जन्मोंकी ज्वाला सदाके लिये शान्तकर अक्षय सुख-शान्ति प्रदान कर देते हैं। निश्चय ही यह गणेश-पुराण गणेशोपासकोंके लिये सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ-रत्न है।


  • पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्। (श्रीगणेशपुराण २। १५५। २९)

उपासना-खण्ड

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीमन्महर्षिकृष्णद्वैपायनव्यासविरचित श्रीगणेशपुराण [ पूर्वार्ध ] उपासना-खण्ड पहला अध्याय ऋषियों और सूतजीके संवादके प्रसंगमें गणेशजीकी महिमा और राजा सोमकान्तके चरित्रका वर्णन

नमस्तस्मै गणेशाय ब्रह्मविद्याप्रदायिने। यस्यागस्त्यायते नाम विघ्नसागरशोषणे ॥ ब्रह्मविद्याके प्रदाता उन गणेशजीको नमस्कार है, जिनका नाम अगस्त्यमुनि*की भाँति विघ्नरूपी समुद्रको सुखानेवाला है ॥ १ ॥ ऋषियोंने कहा—हे महाबुद्धिमान् वेदशास्त्रविशारद सूतजी ! आप समस्त विद्याओंके निधिरूप (खजाने) हैं, आपसे बढ़कर श्रेष्ठ वक्ता नहीं मिल सकता। हमारे जन्म-जन्मान्तरीय महान् पुण्योंका उदय हुआ है, जो कि आप-जैसे सर्वज्ञ सत्पुरुषका दर्शन हो रहा है। इस संसारमें हम सब सर्वाधिक धन्य हैं, हमारा जीवन सफल जीवन है। हमारे पूर्वज, हमारा वेद-शास्त्रोंका अध्ययन, हमारी तपस्याका श्रम—ये सब धन्य हो गये। [वक्ताओंमें] श्रेष्ठ [हे सूतजी] ! आपने हमें अठारह पुराणोंको विस्तारपूर्वक सुनाया है, हमारी अन्य पुराणोंको भी सुननेकी इच्छा है, अतः उन्हें भी सुनायें ॥ २-५ ॥ हम सब शौनकजीद्वारा आयोजित द्वादशवर्षीय महासत्रमें नियुक्त हैं, आपद्वारा कराये जानेवाले कथामृतपानके अतिरिक्त हमारे श्रमका निवारण किसी प्रकार नहीं हो सकता ॥ ६ ॥

सूतजी बोले—पुण्य कर्ममें निरत हे महाभाग्यशाली [ऋषियो] ! आप लोगोंके द्वारा अत्यन्त उत्तम प्रश्न किया गया है; क्योंकि राग-द्वेषरहित, सम चित्तवाले साधुजनोंकी बुद्धि संसारके उपकारमें लगी रहती है ॥ ७ ॥ हे द्विजगण ! मुझे भी कथाओंके कहनेमें ही सन्तोष प्राप्त होता है, अतः मैं आप सब साधु चरितवाले सत्पुरुषोंको विशेष रूपसे कथा सुनाऊँगा ॥ ८ ॥ [अष्टादश महापुराणों, जिनकी कथा मैं सुना चुका

  • महाभारत-वनपर्व, अध्याय १०५ में वर्णित है कि अगस्त्यमुनिने समुद्रके सम्पूर्ण जलका पानकर उसे सुखा दिया था।

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४४          * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् *          [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ]

हूँ, के अतिरिक्त] गणेश, नारदीय, नृसिंह आदि वैसे ही अन्य अठारह उपपुराण भी हैं, उनमें जो गणेशजीसे सम्बन्धित गणेशपुराण है, उसका प्रवचन मैं सर्वप्रथम करूँगा, जिसका कि विशेष रूपसे मर्त्यलोकमें श्रवण दुर्लभ है ॥ ९-१० ॥ जिस गणेशपुराणके स्मरणमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है, जिसके प्रभावको कहनेमें [सहस्र मुखवाले] शेषजी और चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, तो भी आप सबकी आज्ञासे मैं इसको संक्षेपमें कहूँगा। बहुत- से जन्मोंके पुण्योंके एकत्र होनेसे ही इसका श्रवण होता है, पाखण्डियों, नास्तिकों और पापकर्मियोंको इसका श्रवण सम्भव नहीं होता ॥ ११-१२१/२ ॥ श्रीगणेशजी तत्त्वतः नित्य, निर्गुण और अनादि हैं; इसलिये उनके स्वरूपका कथन किसीके लिये सम्भव नहीं है; फिर भी उनकी उपासनामें निरत भक्तोंद्वारा उन्हें सगुणरूपमें निरूपित किया जाता है ॥ १३-१४॥ ॐकाररूपी जो भगवान् [गणेश] वेदोंमें सर्वप्रथम प्रतिष्ठित हैं, मुनिगण तथा इन्द्रादि देवगण जिनका हृदयमें सदा स्मरण करते रहते हैं, ब्रह्मा, ईशान (शिव), इन्द्र और विष्णु जिनका सतत पूजन करते हैं, जो समस्त जगतोंके हेतु और सम्पूर्ण कारणोंके भी कारण हैं, जिनकी आज्ञासे ब्रह्माजी [विश्वका] सृजन करते हैं, जिनकी आज्ञासे विष्णु पालन करते हैं, जिनकी आज्ञासे भगवान् शंकर संहार करते हैं, जिनकी आज्ञासे सूर्य संचरण (भ्रमण) करते हैं, जिनकी आज्ञासे पवनदेव प्रवहमान होते हैं, जिनकी आज्ञासे जल सभी दिशाओंमें प्रवाहित होता है, जिनकी आज्ञासे ग्रह-नक्षत्र (उल्कापिण्ड) पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं, जिनकी आज्ञासे तीनों लोकोंमें अग्नि प्रज्वलित होती है, उन भगवान् गणेशका जो गुप्त चरित है, जिसे किसीके समक्ष प्रकट नहीं किया गया है, उसे मैं आप सबसे कहता हूँ। हे द्विजगण! आप लोग आदरपूर्वक उसे सुनें ॥ १५-१९ ॥ इसे पूर्वकालमें ब्रह्माजीने अमिततेजस्वी व्यासजीसे कहा था, उन्होंने इसे भृगुजीसे और भृगुजीने इसे [राजा] सोमकान्तसे कहा- ॥ २० ॥


[दायाँ स्तम्भ]

जिन्होंने करोड़ों व्रतों, यज्ञों, तपस्याओं, दानों और तीर्थसेवनद्वारा पुण्य अर्जित किया है, हे श्रेष्ठ द्विजगणो! उन्हींकी बुद्धि इस गणेशसंज्ञक पुराणके श्रवणमें प्रवृत्त होती है। जिनका मन स्त्री, पुत्र, भूमि आदि सांसारिक मायाजालमें आसक्त नहीं होता, हे श्रेष्ठ मुनिगण! भगवान् मयूरेश (गणेशजी)-की कथाका वे ही सादर श्रवण करते हैं। अब आप लोग सोमकान्तके आख्यानके माध्यमसे इसकी (गणेशपुराणकी) महिमाका श्रवण करें ॥ २१-२३ ॥ सौराष्ट्र देशमें स्थित देवनगरमें सोमकान्त नामका एक राजा हुआ, जो वेद और शास्त्रके तत्त्वको जानने- वाला तथा धर्मशास्त्रके प्रयोजनभूत विहित कर्मानुष्ठानमें रत रहनेवाला था ॥ २४ ॥ जब वह प्रस्थान करता तो दस सहस्र गजारोही, उसके दुगुने अर्थात् बीस सहस्र अश्वारोही और छः हजार रथारोही उसका अनुगमन करते थे। साथ ही असंख्य पैदल सैनिक, आग्नेयास्त्रधारी तथा दो तरकस धारण करनेवाले धनुर्धारी भी उसके साथ होते थे ॥ २५-२६ ॥ उसने बुद्धिसे बृहस्पतिको, धन-सम्पत्तिसे कुबेरको, क्षमासे पृथ्वीको और गाम्भीर्यसे महासागरको जीत लिया था। उस राजाने अपनी प्रकाशमयी आभासे सूर्य और कान्तिसे चन्द्रमाको, प्रतापसे अग्निको और सौन्दर्यसे कामदेवको जीत लिया था ॥ २७-२८ ॥ उसके पाँच मन्त्री थे, जो प्रबल शक्तिशाली, दृढ़ पराक्रमी, नीतिशास्त्रके तत्त्वार्थको जाननेवाले और शत्रु- राष्ट्रका ध्वंस करनेवाले थे ॥ २९ ॥ उनमेंसे प्रथमका नाम रूपवान्, दूसरेका विद्याधीश, तीसरेका क्षेमंकर, चौथा ज्ञानगम्य और पाँचवाँ सुबल नामवाला था ॥ ३० ॥ ये सभी नित्य राज्यकार्य करनेवाले और राजाके अत्यन्त प्रिय थे। इन्होंने अनेक देशोंपर आक्रमण करके अपने पराक्रमसे उन्हें विजित किया था ॥ ३१ ॥ ये सभी अत्यन्त सुन्दर थे तथा अनेक प्रकारके आभूषणों और वस्त्रोंसे अलंकृत रहते थे। उस राजाकी सुधर्मा नामक गुणशालिनी पत्नी थी, जिसके रूपको


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उ०ख०-अ०२ ] * गलित कुष्ठसे पीड़ित राजा सोमकान्तका वनमें जानेका निश्चय करना * ४५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 देखकर [कामदेवकी पत्नी] रति तथा रम्भा और | रहती थी तथा पतिसेवा और उनके वचनोंके पालनमें तिलोत्तमा [-जैसी स्वर्गकी अप्सराएँ] भी लज्जित हो | सदा सन्नद्ध रहती ॥ ३६१/२ ॥ जाती थीं; वे न कहीं सुख पाती थीं, न कहीं सुख मानती | इन (दम्पती)-के एक हेमकण्ठ नामवाला शुभ थीं ॥ ३२-३३ ॥ | लक्षणोंसे युक्त पुत्र हुआ, जो दस हजार हाथियोंके समान वह अपने कानोंमें अनेक रत्नोंसे जड़ित और | बलशाली, बुद्धिमान्, पराक्रमी और शत्रुओंको सन्ताप स्वर्णनिर्मित सुन्दर कर्णफूल, कण्ठमें सोनेका हार तथा | देनेवाला था ॥ ३७१/२ ॥ मोतियोंकी माला, कटिप्रदेशमें रत्नमयी करधनी, पैरोंमें | हे श्रेष्ठ द्विजगण! इस प्रकार (-की गुण-समृद्धिसे वैसे ही नूपुर तथा हाथों और पैरोंकी अँगुलियोंमें उत्तम | परिपूर्ण) सोमकान्त पृथ्वीका एक श्रेष्ठ राजा हुआ। प्रकारकी अँगूठियाँ एवं अनेक रंगोंके सहस्रों बहुमूल्य | उसने सम्पूर्ण राजाओंको अपने वशमें करके इस पृथ्वीपर वस्त्र धारण करती थी ॥ ३४-३५१/२ ॥ | राज्य किया। वह नित्य धर्ममें रत रहनेवाला, यज्ञकर्ता, वह भगवद्भजन, दान एवं अतिथि-सत्कारमें लगी | दानी और त्यागी था ॥ ३८-३९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें पुराणोपक्रममें 'सोमकान्तवर्णन' नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥ दूसरा अध्याय गलित कुष्ठसे पीड़ित राजा सोमकान्तका वनमें जानेका निश्चय करना सूतजी बोले-हे ऋषियो! आप सब अब | राजा सोमकान्तने प्रयत्नपूर्वक मनको स्थिर करके मन्त्रियोंसे सोमकान्तके दुष्कृत्यको सुनें, उस धर्मशील राजाको | कहा- ॥ ६ ॥ पूर्वजन्मोंके कर्मफलसे अकस्मात् अत्यन्त दुःखदायी | राजाने कहा-मेरे राज्य और रूपको धिक्कार गलित कुष्ठ हो गया ॥ १ १/२ ॥ | है; [मेरे] बल, जीवन और धनको धिक्कार है! न जाने मनुष्यके द्वारा किया गया शुभ या अशुभ कर्म | मेरे किस कर्मका बीज इस कष्टके रूपमें [प्रस्फुटित उसका कभी पीछा नहीं छोड़ता; जिस-जिस अवस्थामें | होकर] समुपस्थित हुआ है ॥ ७ ॥ जैसा-जैसा कर्म किया गया होता है, उस-उस अवस्थामें | जिस [शरीर]-की कान्तिसे सोम (चन्द्रमा)-को प्राणीको उसका फल भोगना पड़ता है, यह ध्रुव सत्य | जीतकर मैं सोमकान्त कहलाया; जिससे मैंने साधुओं, है ॥ २-३ ॥ | दीनों, श्रोत्रिय ब्राह्मणों और सभी आश्रमोंके लोगों, अनेक घावोंसे युक्त, इधर-उधर बहते हुए रक्तवाले, | जनपदके निवासियों और अन्य लोगोंका भी पुत्रवत् मवाद और खूनसे लथपथ राजा (सोमकान्त) कीड़ोंद्वारा | पालन किया; जिसके द्वारा मैंने अपने बाणोंसे भयंकर काटकर विह्वल कर दिये जाते थे। उस समय वे | रूपवाले शत्रुओंको जीत लिया; जिसके द्वारा मैंने सम्पूर्ण दुःखरूपी सागरमें उसी प्रकार निमग्न हो जाते थे, | पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया; सम्यक् रूपसे देवाधिदेव जैसे समुद्रमें बिना नौकाके मनुष्य। उस समय उन्हें | परमात्मा सदाशिवका आराधन किया; जो दुष्टोंके संगसे ऐसी पीड़ा प्राप्त होती थी, जैसी कि सर्पके डसनेसे | रहित और चित्तका निग्रह करनेवाला था, पूर्वकालमें मैंने होती है ॥ ४-५ ॥ | अपने जिस शरीरके द्वारा रुचिकर सुगन्धियोंका विशेषरूपसे उन राजाका शरीर क्षयरोगसे ग्रस्त रोगीकी भाँति | सेवन किया था, वही आज सड़े हुए मांसकी गन्धवाला हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया। सभी इन्द्रियोंके रोगयुक्त | हो गया है, अतः मेरा जीवन निरर्थक है; इसलिये मैं हो जानेसे वे चिन्तासे व्याकुल हो उठे। तदनन्तर उन | आप सबकी अनुमति लेकर वनमें जाऊँगा ॥ ८-१२ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_3_2_Front

४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- मेरे बुद्धि-पराक्रम-सम्पन्न पुत्र हेमकण्ठको आप सब राज्य-संचालनहेतु अभिषिक्त करें और अपने पराक्रमसे उसकी रक्षा करें॥ १३॥ हे महामन्त्रियो! अब मैं लोकमें अपना मुख किसीको नहीं दिखलाऊँगा; न मुझे [अब] राज्यसे कोई प्रयोजन है, न स्त्रीसे, न जीवनसे और न धनसे। अब मैं वनमें जाकर अपना हितसाधन करूँगा॥ १४१/२ ॥ सूतजी बोले—हे श्रेष्ठ द्विजगण! ऐसा कहकर मवाद, रक्त और पसीनेसे लथपथ वे (राजा सोमकान्त) आँधीके झोंकेसे उखड़े हुए वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े। [उस समय] मन्त्रियों और स्त्रियोंका वहाँ महान् कोलाहल हो रहा था॥ १५-१६॥ क्षणभरमें ही लोगोंका वहाँ अत्यन्त दारुण हाहाकार होने लगा। तब मन्त्रियोंने वस्त्रसे पोंछकर, हवा करके, शीघ्र लाभ करनेवाली औषधियों और मन्त्रोंका प्रयोग करके उन्हें सचेतन किया और उन राजा सोमकान्तके स्वस्थ होनेपर उनसे मन्त्रियोंने इस प्रकार कहा—॥ १७-१८॥ मन्त्रियोंने कहा—हे राजन्! आपकी कृपासे सभी मनुष्योंके लिये दुर्लभ देवराज इन्द्रके तुल्य सुखोंका हमने भोग किया, अब हम आपके बिना कैसे रह सकते हैं? पशुओंका वध करनेवाले कसाईकी भाँति कैसे जीवन धारण कर सकते हैं? आपका पुत्र बलवान् है, शत्रुओंका नाश करनेवाला है और राजकोष भी प्रभूत धनसे सम्पन्न है, अतः वह अकेला ही राज्य कर सकता है। हम लोग सारे सुखोंका त्याग करके आपके साथ ही वनको चलते हैं॥ १९-२०॥ सूतजी बोले—तदनन्तर [राजा सोमकान्तकी रानी] सुधर्माने कहा कि हे श्रेष्ठ मन्त्रियो! मैं ही अकेली राजाकी सेवाके लिये इनके साथ वनको जाऊँगी और आप लोग मेरे पुत्रके साथ राज्यका भलीभाँति रक्षण- पालन करें॥ २१॥ पूर्वकालमें किये गये [पाप या पुण्य] कर्मका फल दुःख या सुखके रूपमें प्राणीको स्वयं ही भोगना पड़ता है, दूसरा कोई उसे नहीं भोग सकता। जिस-जिस प्रकारसे कर्मफलको भोगना निश्चित होता है, उसे वैसे ही और स्वयंको ही भोगना पड़ता है॥ २२॥ मैंने भी इनके साथ अनेक प्रकारके सुखोंका भोग और राज्य किया है। मुनियोंका कथन है कि नारीको इहलोक और परलोक—दोनोंमें पतिका ही अनुगमन करना चाहिये॥ २३॥ तब विनीत और शोकसंतप्त पुत्र हेमकण्ठने [अपने पिता] राजा सोमकान्तसे उस समय यह वचन कहा—॥ २४॥ हेमकण्ठ बोला—हे नृपश्रेष्ठ! आपके बिना मुझे राज्य, पत्नी, धनसंचय तथा प्राणोंसे भी कोई प्रयोजन नहीं है॥ २५॥ हे धर्मपालक! जैसे बिना तेलके दीपक और बिना प्राणोंके शरीर व्यर्थ हैं, वैसे ही हे राजन्! आपके बिना राज्य भी व्यर्थ है॥ २६॥ सूतजी बोले—मन्त्रियों, रानी सुधर्मा और पुत्र हेम- कण्ठके अमृतके समान वचनोंको सुनकर प्रसन्नमन सोम- कान्तने पुत्रसे इस प्रकार धर्मानुकूल बात कही—॥ २७॥ राजा बोले—पिताके वचनोंका पालन करनेमें नित्य रत रहनेवाला, [मरणोपरान्त] श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करनेवाला और गयामें पिण्डदान करनेवाला पुत्र ही पुत्र कहा जाता है*॥ २८॥ इसलिये मेरी आज्ञा मानकर मन्त्रियोंसहित तुम नीतिपूर्वक राज्य करो और सम्पूर्ण प्रजाका पुत्रवत् अनुशासन करो॥ २९॥ धर्मशास्त्रोंके तत्त्वार्थको जाननेवाला, नीतिज्ञ, सबको सन्तुष्ट करनेवाला, पितरोंका उद्धार करनेवाला और जो स्वयं भी पुत्रवान् है, उसीको पुत्र कहा जाता है॥ ३०॥ हे उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले [पुत्र]! गलित कुष्ठवाला मैं अत्यन्त निन्दित हूँ, अतः पत्नी सुधर्माके साथ मैं वनमें जाऊँगा, इसका तुम समर्थन करो॥ ३१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'सोमकान्तकुष्ठप्राप्तिवर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ॥ २॥

  • जीवतो वाक्यकरणात् क्षयाहे भूरिभोजनात्। गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता॥ (श्रीमद्देवीभागवत ६।४।१५) Kalyana Visheshank 2021_Section_3_2_Back

तीसरा अध्याय

उ०ख०-अ०३]* * राजा सोमकान्तका राजकुमार हेमकण्ठको सदाचार और राजनीतिकी शिक्षा देना * .४७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

तीसरा अध्याय राजा सोमकान्तका राजकुमार हेमकण्ठको सदाचार और राजनीतिकी शिक्षा देना

सूतजी बोले—तत्पश्चात् राजाने उठकर पुत्रको | इन्द्रके अनुज, नियन्ता, पापोंको दूर करनेवाले, शत्रुओंका दाहिने हाथसे पकड़कर राजमहलके अग्रभागमें [स्थित | नाश करनेवाले और संसारसे मुक्तिके हेतु हैं॥ ८॥ उस कक्षमें] प्रवेश किया, जहाँ वे सर्वदा मन्त्रणा करते | [ श्रीशिव-प्रातःस्मरण—] मैं चन्द्रमाको थे; जहाँ बहुत-से रत्नोंसे युक्त, मोती और मूँगेसे जड़ा | [मुकुटरूपमें] सिरपर धारण करनेवाले गिरिराजन्न्दिनी हुआ स्वनिर्मित दिव्य सिंहासन इन्द्रासनकी भाँति | पार्वतीके पति त्रिपुरारि भगवान् शिवको प्रातः नमस्कार शोभायमान हो रहा था॥ १-२॥ | करता हूँ; जो बाघम्बरको [कटिप्रदेशमें] लपेटे रहनेवाले, वहाँ आसीन होनेपर वे दोनों-पिता-पुत्र दो | कामदेवको भस्म करनेमें दयारहित, नारायण और इन्द्रको होनेपर भी प्रत्येक रत्नमें प्रतिबिम्बित होनेसे अनेक दीख | वर देनेवाले, देवताओं और सिद्धोंसे सेवित तथा त्रिशूल- रहे थे, मानो वे जनसमुदायसे आवृत (घिरे) हों॥ ३॥ | डमरू एवं सर्पोंको धारण करनेवाले हैं॥ ९॥ अपने कुलकी कीर्तिके विस्तारके लिये राजाने | [ श्रीसूर्य-प्रातःस्मरण— ] मैं पापोंका हरण कृपापूर्वक पुत्रसे सर्वप्रथम आचार, तदनन्तर अनेक | करनेवाले दिनके अधिपति भगवान् सूर्यदेवको प्रातः प्रकारकी नीतियोंका वर्णन किया॥ ४॥ | नमस्कार करता हूँ; जो गहन अन्धकारका हरण करनेवाले, सोमकान्त बोले—जब रात्रि एक प्रहर शेष रहे, | श्रेष्ठ जनोंद्वारा वन्दित, वेदत्रयीस्वरूप, देवशत्रुओंकी तब पुरुषको जग जाना चाहिये। तत्पश्चात् शय्याका | मायाका नाश करनेवाले, ज्ञानके एकमात्र हेतु, अमितशक्ति त्याग करके पवित्र स्थानमें बैठकर गुरुका स्मरण करना | और उदार भाववाले हैं॥ १०॥ चाहिये॥ ५॥ | [देवी-प्रातःस्मरण—] मैं लौकिक ऐश्वर्यकी तदनन्तर इष्ट देवताका चिन्तन करके उन्हें स्तुतिपूर्वक | कारणरूपा गिरिराजनन्दिनी सुरेश्वरी भगवती पार्वतीको प्रणाम करे और पृथिवीकी हे जगन्मये ! मेरे पादस्पर्शको | प्रातः नमस्कार करता हूँ; जो संसाररूपी समुद्रसे आत्यन्तिक क्षमा* करें-ऐसा कहकर प्रार्थना करे॥ ६॥ | रूपसे पार लगानेवाली, तीन नेत्रोंवाली, महत्तत्त्वाडिकी [ इष्टदेवरूप पंचदेवों- श्रीगणेश, विष्णु, शिव, | कारणरूपा मूलप्रकृति, देवशत्रुओंकी मायाका नाश करने- सूर्य और देवीकी स्तुतियाँ इस प्रकार हैं-] | वाली, मायामयी और देवताओं तथा श्रेष्ठ मुनियोंद्वारा [ श्रीगणेश-प्रातः स्मरण—] मैं गणोंके स्वामी | नमस्कृत हैं॥ ११॥ श्रीगणेशजीको प्रातः नमस्कार करता हूँ; जो सम्पूर्ण | इसी प्रकार अन्य देवताओं और मुनियोंका स्मरण कारणोंके कारण, ब्रह्मादि देवताओंको वर देनेवाले, | करके तथा मानसिक उपचारोंसे पूजन करके क्षमा- सम्पूर्ण आगमोंके ज्ञाता, धर्म-अर्थ और कामरूपी फल | प्रार्थना करे॥ १२॥ देनेवाले, मुमुक्षुजनोंको मोक्ष देनेवाले, वाणीसे अनिर्वचनीय | तत्पश्चात् ब्राह्मण स्वच्छ सफेद मिट्टी, क्षत्रिय तथा अनादि और अनन्त रूपवाले हैं॥ ७॥ | लाल मिट्टी और वैश्य-शूद्र काली मिट्टी एवं जलपात्र [ श्रीविष्णु-प्रातःस्मरण-] मैं उग्र पराक्रमवाले | लेकर गाँवके नैर्ऋत्यकोण (दक्षिण-पश्चिम दिशा)-में लक्ष्मीपति श्रीविष्णुको प्रातः नमस्कार करता हूँ; जो | जायें। नदीके किनारे, ऊसर और दीमककी बाँबी तथा अपने भक्तजनोंके रक्षणके लिये अनेक अवतार लेनेवाले, | ब्राह्मणके घरकी मिट्टी कभी न खोदे ॥ १३-१४॥ क्षीरसागरमें निवास करनेवाले, देवताओंके अधिपति | तदनन्तर धरतीको घास-फूस आदिसे ढककर

  • समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले । विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ॥

४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दिनमें उत्तराभिमुख और रात्रिमें दक्षिणकी ओर मुख करके मल-मूत्रका त्यागकर पहले तृण-काष्ठादिसे मनुष्य पुरीषेन्द्रियको स्वच्छकर तत्पश्चात् मिट्टी और जलसे पाँच बार उसका प्रक्षालन करे॥ १५-१६॥ तदनन्तर बायें हाथको दस बार, दोनों हाथोंको सात बार, मूत्रेन्द्रियको एक बार और पुनः बायें हाथको तीन बार धोना चाहिये॥ १७॥ मूत्रविसर्जन करनेपर दोनों हाथोंको सदा दो बार और दोनों पैरोंको एक बार धोना चाहिये। यह शौचविधि गृहस्थोंके लिये ही कही गयी है॥ १८॥ ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करनेवालेको इसका दुगुना, वानप्रस्थीको तिगुना और संन्यासीको चार गुना शुद्धि करनी चाहिये। रात्रिमें सबको इसकी आधी ही शुद्धि मौन रहते हुए करनी चाहिये॥ १९॥ स्त्री और शूद्रको [उपर्युक्त शुद्धि]-की आधी शुद्धि दिनमें और चौथाई शुद्धि रात्रिमें करनेका विधान है। शुद्धिके पश्चात् दूधवाले या काँटेदार वृक्षकी लकड़ी (दातून)-को [उस वृक्षसे] इस प्रकार प्रार्थनापूर्वक लेकर दाँत और जीभको साफ करे-हे वनस्पते! तुम मुझे बल, ओज, यश, तेज, पशु, बुद्धि, धन, मेधा (धारणाशक्ति), ब्रह्मज्ञान प्रदान करो॥ २०-२११/२॥ तदनन्तर पहले शीतल जलसे मलका हरण करनेवाला स्नान करे, फिर अपने गृह्यसूत्रमें कहे गये मन्त्रोंसे स्नान करनेके बाद सन्ध्योपासना करे। तत्पश्चात् जप, हवन, स्वाध्याय, तर्पण और देवपूजन करे। तदनन्तर बलिवैश्वदेव, अतिथि-सत्कार और ब्राह्मणावलोकनके उपरान्त स्वयं भोजनकर पुराणका श्रवण और दान करे, परनिन्दासे सदा दूर रहे॥ २२-२४॥ धन, प्राण तथा अमृतरूपी (सहानुभूतिपूर्ण) वचनोंसे दूसरोंका उपकार करे, कभी किसीका अपकार न करे और न ही आत्मप्रशंसा करे। गुरुद्रोह, वेदनिन्दा, नास्तिकताका भाव, पापीकी सेवा, निषिद्ध पदार्थोंका भक्षण और परस्त्रीगमन न करे॥ २५-२६॥ अपनी पत्नीका परित्याग न करे और ऋतुकालमें सहवास करे। माता-पिता, गुरु और गायकी सदा सेवा- शुश्रूषा करे॥ २७॥ दीनों, अन्धों और कृपणों (जो दयाके पात्र हैं)- को वस्त्रसहित अन्न प्रदान करे। प्राणोंके संकटमें आ जानेपर भी कभी सत्यका त्याग न करे। जिनपर ईश्वरकी कृपा है, ऐसे साधुजनोंका पालन करे॥ २८१/२॥ अपराधके अनुसार धर्मशास्त्रोंका विशेष रूपसे अवलोकनकर या विद्वानोंसे पूछकर नीतिज्ञ [राजा]-को दण्ड देना चाहिये। जो विश्वसनीय न हो, उसपर कभी भी विश्वास न करे। समृद्धिकी इच्छावाला राजा विश्वस्त व्यक्तिपर भी अत्यन्त विश्वास न करे। जिससे एक बार वैर हो गया हो, वह यदि पुनः विश्वस्त बन गया हो, तो उसपर तो कभी भी विश्वास न करे॥ २९-३१॥ षड्गुणों१ (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और संश्रय)-का प्रयोग करके राजा अपने राष्ट्रका सम्वर्धन करे तथा अपनी शक्तिके अनुसार दान करे, अन्यथा राष्ट्र क्षीण होने लगता है॥ ३२॥ शत्रुके व्याकुल अर्थात् संकटग्रस्त होनेपर उसपर चढ़ाई करना अधर्म कहा जाता है। राजाको चारदृष्टि (गुप्तचररूपी नेत्रोंवाला), दूतवक्त्र (दूतरूपी मुखवाला) और उद्यद्दण्ड (उठे हुए दण्डवाला) होना चाहिये। अर्थात् राजा गुप्तचरके नेत्रों और दूतके मुखसे सूचनाओंको प्राप्त करे और तदनुसार सेनाको तैयार रखे॥ ३३॥ दण्डके ही भयसे सभी लोग अपने-अपने धर्मोंमें व्यवस्थित रहते हैं, अन्यथा अपने और परायेका कोई नियम ही नहीं रहेगा। यदि अधम व्यक्ति कभी निन्दा करे अथवा प्रशंसा करे तो न तो उसपर क्रोधित हो, न ही प्रसन्न; क्योंकि उसकी निन्दा या स्तुतिका क्या अर्थ ! ॥ ३४-३५॥ जिसने पूर्वकालमें अपकार किया हो, परंतु पुनः शरणमें आ जाय तथा जो पूर्वकालमें धनिक रहा हो [परंतु किसी कारण निर्धन हो गया हो], उनका सदैव परिपालन करना चाहिये॥ ३६॥ [राजाको मन्त्रियोंके साथ की गयी] मन्त्रणाको सदा गुप्त रखना चाहिये; क्योंकि वह (मन्त्रणा) १. सन्धिं च विग्रहं चैव यानमासनमेव च। द्वैधीभावं संश्रयं च षड्गुणांश्चिन्तयेत्सदा॥ (मनुस्मृति ७। १६०)

उ०ख०-अ०४ ] * सोमकान्तका वनगमन * ४९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 राज्यका मूल (आधार) कही जाती है। राजा कामादि | विद्याधीश नामक मन्त्रियोंको बुलवाया और शुभ मुहूर्त छः शत्रुओं* (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह तथा | देखकर [राज्याभिषेकके लिये आवश्यक] सामग्रियोंका मत्सर)-को जीतकर तत्पश्चात् अन्य शत्रुओंपर विजय | संकलनकर अनेक स्थानोंसे वेदके विद्वान्, यज्ञकर्ममें प्राप्त करे ॥ ३७ ॥ | निष्णात ब्राह्मणों, महान् राजाओं, महारानियों, अपने श्रेष्ठ राजा कभी किसीकी आजीविकाका उच्छेद, | सुहृज्जनों, सभी वर्गोंके प्रमुख लोगों और श्रेष्ठ नागरिकोंको प्रजाका विनाश, देवसम्पत्तिका हरण, वन-उपवनोंका | शत्रुओंका नाश करनेवाले अपने पुत्रके राज्याभिषेक- विनाश तथा देवालयों और स्मारकोंका ध्वंस न करे ॥ ३८ ॥ | समारोहका अवलोकन करनेके लिये आमन्त्रित पर्वकालमें दान दे, यशके लिये त्याग करे, मित्रके | किया ॥ ४२-४५ १/२ ॥ साथ छल न करे और गोपनीय विषयका कथन स्त्रियोंसे | तदनन्तर गणेशजीका और इष्टदेवताका यथाविधि न करे ॥ ३९ ॥ | पूजनकर मातृकाओंका पूजन और स्वस्तिवाचन करवाकर ब्राह्मणका ऋणसे और गायका कीचड़से सम्यक् | आभ्युदयिक श्राद्धकर और ब्राह्मणोंको भोजनादिसे सन्तुष्टकर रूपसे उद्धार करे। कभी असत्य न बोले और कभी | उन राजा सोमकान्तने वेदमन्त्रोंके उद्घोषके साथ पुत्र सत्यको न छोड़े ॥ ४० ॥ | हेमकण्ठका राज्याभिषेक करवाकर अपने तीन प्रमुख मन्त्रियों, प्रजा और सेवकोंके चित्तका हरण करनेवाला | मन्त्रियोंसे इस प्रकार कहा- ॥ ४६-४८ ॥ बने और सदा ब्राह्मणों एवं देवताओंको नमस्कार | राजा बोले- हे मन्त्रियो ! मैं अपने इस पुत्रको करे ॥ ४१ ॥ | आप लोगोंके हाथमें सौंपता हूँ। 'यह मेरा ही पुत्र है'— सूतजी बोले- इस प्रकार राजाने जैसे स्वयं | इस प्रकारकी बुद्धि आप लोगोंकी [मेरे इस पुत्रमें सदा] [परम्परासे] सुना था, वैसे ही धर्मशास्त्रके साथ | रहे। नीतिनिपुण आपलोगोंने जैसे मेरी आज्ञाओंका पालन आचार, नीतिशास्त्र एवं अन्य उपयोगी विषयोंकी शिक्षा | किया है, वैसे ही सभी वर्गोंके प्रमुखजनोंके साथ मिलकर अपने पुत्र हेमकण्ठको देकर क्षेमंकर, रूपवान् और | इसके भी राज्य-संचालनमें सहयोग दें ॥ ४९-५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'आचारादिनिरूपण' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥ चौथा अध्याय सोमकान्तका वनगमन सूतजी बोले- राज्याभिषेक सम्पन्न होनेपर उन | धन दिया ॥ २-४ ॥ राजा सोमकान्तने ब्राह्मणोंका पूजन किया और उन्हें | तदनन्तर पूर्वजन्मार्जित दोषोंके कारण दुःख और अंगभूत दक्षिणाके साथ दस सहस्र गौएँ तथा मणि, मोती | शोकसे युक्त राजा सोमकान्तने अत्यन्त मलिन और और मूँगे प्रदान किये। उन्होंने उन सबको हाथी, गौएँ, | अपवित्र अवस्थामें वनके लिये प्रस्थान किया ॥ ५ ॥ घोड़े, धन, रेशमी परिधान देकर सन्तुष्ट किया ॥ १ १/२ ॥ | उनके जाते ही लोगोंमें महान् हाहाकार मच गया। उन्होंने राजाओं, राजपत्नियों, उनके सेवकों, ग्रामप्रमुखों | सब लोग अपना-अपना कार्य छोड़कर राजाके पीछे चल तथा गुणीजनोंको यथायोग्य अनेक देशोंके सुवर्णजटित | दिये ॥ ६ ॥ वस्त्रों, कश्मीर देशमें निर्मित अनेक रंगोंके श्रेष्ठ वस्त्रोंको | मन्त्रिगण, राजाकी पत्नी सुधर्मा, पुत्र हेमकण्ठ तथा प्रदान किया। साथ ही मन्त्रियोंको अन्य अर्थात् पूर्वमें | सुहृद्गण भी उठते, गिरते, लुढ़कते, दौड़ते और रोते हुए दिये गये ग्रामोंके अतिरिक्त अनेक ग्राम और बहुत-सा | उनके पीछे गये ॥ ७ ॥

  • कामः क्रोधस्तथा लोभो मदमोहौ च मत्सरः । (किराता० १।९ पर मल्लिनाथकृत घण्टापथ टीका)

५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मन्त्रियों और नगरके लोगोंने भी दुखी होकर राजाको रोका। दो गव्यूति* (चार कोस) जानेके बाद श्रमित होकर राजा रुक गये॥ ८॥ [वहाँ] उन्होंने अनेक वृक्षोंसे घिरी हुई और शीतल जलसे सम्पन्न वापी (बावड़ी)-को देखकर सभी नागरिकों, मन्त्रियों और स्वजनोंसे कहा— ॥ ९॥ हे सज्जनो! दीर्घकालतक राज्य करते हुए मैंने जो अपराध किये हों, उनके लिये आप लोग [मुझे] क्षमा करें; मैं आप लोगोंको हाथ जोड़कर नमस्कार करता हूँ॥ १०॥ मैं आप सबसे निवेदन करता हूँ कि दैववश मुझे यह जो [रोग] प्राप्त हो गया है, इससे मेरे प्रति आप लोग अपने स्नेहको कम न करियेगा और मेरे पुत्रपर अपनी कृपा बनाये रखियेगा॥ ११॥ आप सभी आये हुए लोग स्त्रियों और वृद्धोंसहित नगरको वापस जायँ और मेरे पुत्रद्वारा पालित होते हुए दुःखरहित होकर निवास करें॥ १२॥ मैं प्रसन्न चित्तसे वन जाऊँ, इसके लिये आप सब लोग अनुज्ञा प्रदान करें [और घर लौट जायँ]। आप लोगोंके जानेके बाद ही मेरा मन शान्त हो सकेगा॥ १३॥ [अतः] आप लोग मेरे ऊपर यह महान् उपकार करनेकी कृपा करें; मैं दुखी हूँ, मरनेकी इच्छा करता हूँ, पर निष्ठुर वचन बोलनेका मुझमें उत्साह नहीं है॥ १४॥ मेरा यह जन्म-जन्मान्तरमें अर्जित किया गया महान् पाप ही है, जिसके कारण मुझे राज्यके हितैषी प्रजाजनोंसे वियोग हो रहा है; परंतु मैं क्या करूँ? मैं तो गलित कुष्ठसे पीड़ित हूँ। सभीको अपने किये सुकृत (पुण्यकर्मों) और दुष्कृत (पापकर्मों)-का फल भोगना ही पड़ता है॥ १५-१६॥ सूतजी बोले—राजाकी इस प्रकारकी बात सुनकर उनके सुहृज्जन मूर्च्छित हो गये, कुछ लोग अत्यन्त दुखी होकर अपने हाथोंसे अपना सिर पीटने लगे। उनमेंसे जो कुछ विद्वान् लोग थे, वे पूर्वकालमें उत्पन्न हुए राजाओंके चरितोंकी चर्चाकर राजाको और परस्पर [एक-दूसरेको भी] सान्त्वना देने लगे॥ १७-१८॥ उस स्थितिको देखकर कुछ अन्य लोग अनिर्वचनीय अवस्थाको उसी प्रकार पहुँच गये, जैसे आत्मस्वरूपका ज्ञान होनेपर ज्ञानवृत्तिवाले योगी॥ १९॥ कुछ धैर्यशाली लोगोंने अपने दुःखका नियमन करके वन जानेको उद्यत उन दुखी राजा सोमकान्तसे इस प्रकार कहा— ॥ २०॥ लोगोंने कहा—हे प्रजावत्सल! जैसे अग्नि उष्णताका और जल शीतलताका त्याग नहीं करता, समुद्र अपनी मर्यादाका और सूर्य अपने प्रकाशकत्व गुणका त्याग नहीं करता; वैसे ही आपको हमारा पालन-पोषण करके फिर त्यागकर जाना उचित नहीं है। हम आपके बिना नगरको वापस कैसे जा सकते हैं?॥ २१-२२॥ जैसे नक्षत्रोंसे भरा होनेपर भी बिना चन्द्रमाके आकाश सुशोभित नहीं होता, वैसे ही शत्रुओंका दमन करनेवाले हे राजन् ! आपके बिना यह नगर शोभा नहीं देता ॥ २३ ॥ हे स्वामी! हम सब भी आपके साथ दो-तीन तीर्थोंकी यात्रापर चलेंगे; [हमें विश्वास है कि] तीर्थ- सेवनसे आपका रूप कान्तिमान् हो जायगा ॥ २४॥ तदनन्तर हम लोग आपके साथ महान् हर्षपूर्वक मंगलवाद्योंकी ध्वनिके साथ बन्दीजनोंको आगे करके ध्वज-पताकाओंसे सुसज्जित नगरमें आयेंगे ॥ २५॥ सूतजी बोले—इस प्रकार उनके वचनोंको सुनकर क्रोध और दुःखसे परिपूर्ण राजाने उन सबको नमस्कार करके 'ऐसा न करो, ऐसा न करो' बार-बार कहा॥ २६॥ तदनन्तर स्नेह और करुणापूर्ण भावोंसे युक्त हेमकण्ठने मन्त्रियोंके साथ पुत्रवत्सल राजासे विनयपूर्वक निवेदन किया— ॥ २७॥ पुत्र (हेमकण्ठ)-ने कहा—मैं आपके बिना [नगरमें] जाने, राज्य करने और जीवित रहनेमें भी उत्साह नहीं रखता हूँ। मैंने इससे पूर्व कभी आपका वियोग नहीं देखा है, तो फिर उसे कैसे सहन करूँ?॥ २८॥ राजा (सोमकान्त)-ने कहा—इसीलिये मैंने

  • गव्यूतिः स्त्री क्रोशयुगम्। (अमरकोश २। १। १८)

उ०ख०-अ०५] * सुधर्मा-च्यवन-संवाद * ५१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पहले ही तुम्हें उत्तम नीतिशास्त्रके सहित धर्मशास्त्रका | या गाड़े गये धनमें ही स्थित रहता है, वैसे ही वनमें चले उपदेश किया है। तुम्हें उस मंगलमय उपदेशको व्यर्थ | जानेपर भी मेरा मन तुम्हींमें लगा रहेगा। दैवयोगसे यदि नहीं करना चाहिये॥ २९ ॥ | [ मेरा कुष्ठ रोग दूर हो गया और] मैं सुन्दर शरीरवाला ऐसा सुना जाता है कि पूर्वकालमें नीतिज्ञ और परम | हो गया, तो पुनः घरको लौट आऊँगा ॥ ३३-३४ ॥ बुद्धिमान् जमदग्निनन्दन परशुरामने पिताके कहनेपर | मेरी आज्ञाका पालन करनेसे जैसा तुम्हें धर्मलाभ माताको मार डाला था ॥ ३० ॥ | होगा, वैसा मेरे साथ चलनेसे नहीं, इसलिये तुम [पिताकी आज्ञासे ही] श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मणके | [नगरको] जाओ और मैं भी [वनको] जाता हूँ॥ ३५ ॥ साथ राज्य छोड़कर वन चले गये और [ पितृसदृश | सूतजी बोले-तब मन्त्रियों, नगरके निवासियों ज्येष्ठ भ्राताकी आज्ञासे ही] बिना कारण पूछे लक्ष्मण | और पुत्र (हेमकण्ठ)-ने महान् कष्टके साथ वापस सीताको वनमें छोड़ आये थे॥ ३१ ॥ | लौटनेका मन बनाकर राजाको नमस्कार किया। राजाने इसलिये हे हेमकण्ठ! तुम तीनों मन्त्रियोंके साथ | भी आशीर्वाद एवं अभिनन्दनपूर्वक लौटनेका आदेश शीघ्र ही नगरको जाओ और मेरी आज्ञाका पालन करते | दिया और सब लोग राजाकी प्रदक्षिणाकर नगरके लिये हुए मेरे द्वारा प्रदान किये गये राज्यका शासन करो ॥ ३२ ॥ | निकल पड़े ॥ ३६-३७ ॥ जैसे परमात्मतत्त्वके विद्वान् व्यक्तिका चित्त उसके | तब छत्र और ध्वजसे सुशोभित माननीय हेमकण्ठने लौकिक कार्योंमें लगे रहनेपर भी परमात्मामें ही संलग्न | गज-अश्व-रथ और पैदल सैनिकोंसे युक्त महान् सेनाको रहता है, जैसे सामान्य जनोंका चित्त अपने द्वारा रखे गये | आगे करके नगरको प्रस्थान किया ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'हेमकण्ठपुरप्रवेशन' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥ पाँचवाँ अध्याय सुधर्मा-च्यवन-संवाद सूतजी बोले- [हेमकण्ठने] तत्पश्चात् (राजासे | मैं पातिव्रत धर्मके कारण पराधीन हूँ ॥ ४-५ ॥ विदा लेकर) माताके पास आकर स्नेहसे व्याकुल | सूतजी बोले-ऐसा सुनकर पुत्र हेमकण्ठने अपने बुद्धिसे उससे कहा कि हे माता ! मुझ निरपराधका त्याग | सुहृज्जनोंके साथ माताको प्रणाम किया और उनकी आप कैसे कर रही हैं ? ॥ १ ॥ | प्रदक्षिणा करके और उनकी आज्ञा प्राप्तकर नगरको पुत्र (हेमकण्ठ)-ने कहा-'यह पुत्र भी हमारे | प्रस्थान किया ॥ ६ ॥ साथ चले'- ऐसा आपको पिताजीसे कहना चाहिये। | उस समय वह नगर इन्द्रके नगर अर्थात् स्वर्गलोककी यदि आपके अनुरोधपर वे मुझे साथ ले चलेंगे, तब मैं | भाँति नागरिकोंद्वारा ध्वजाओं, पताकाओं और पल्लवोंसे आप दोनोंकी सेवा करूँगा, मेरी बुद्धि राज्य करनेमें नहीं | अलंकृत किया गया था और उसके मार्गोंको सुगन्धित है। वह राज्य मुझे क्या सुख देगा, जो आप दोनोंसे रहित | द्रव्य आदिसे सींचा गया था ॥ ७॥ हो ! ॥ २-३ ॥ | [तदनन्तर] राजाने स्वजनोंको वस्त्र और पान सुधर्माने कहा-हे महाबाहु ! दुःख और शोकसे | देकर विदा किया और अपने ऐश्वर्यसम्पन्न भवनमें प्रवेश युक्त राजा इस समय मेरी बात नहीं मानेंगे। इसलिये मेरी | किया; उस समय उसे हर्ष और शोक दोनों था ॥ ८ ॥ आज्ञासे तुम [नगरको] जाओ। पुत्र! स्त्रियोंके लिये | [उसने] प्रजाका पुत्रवत् पालन करते हुए धर्मपूर्वक पतिके अतिरिक्त अन्य कोई देवता मान्य नहीं होता और | राज्य किया और धर्म-अर्थ-काम-मोक्षकी जैसी शिक्षा