श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 38, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- जल भरनेके लिये कलश लिये एक तेजस्वी मुनिकुमार सरोवरके तटपर पहुँचे। सती सुधर्माने उन मुनिपुत्रसे पूछा—'आप किसके पुत्र हैं और यहाँ कैसे पधारे हैं?' अत्यन्त मधुर वाणीमें ऋषिकुमारने उत्तर दिया— 'मैं महात्मा भृगुकी सती पत्नी पुलोमाका पुत्र हूँ। च्यवन मेरा नाम है। आपलोग कौन हैं और इस निबिड़ वनमें कैसे आये हैं?' अत्यन्त दुखी सुधर्माने मुनिकुमारसे अपना विस्तृत परिचय देते हुए कहा—'महात्मन्! परम प्रतापी, समस्त ऐश्वर्योंका उपभोग करनेवाले मेरे स्वामी पता नहीं, किस कर्मका फल भोग रहे हैं? ऋषि स्वाभाविक दयालु होते हैं। आप दयापूर्वक हमारे कल्याणका कोई उपाय कीजिये।' अत्यन्त दुःखके कारण रानीके नेत्रोंसे आँसू बहने लगे। मुनिपुत्र च्यवनने चुपचाप सरोवरके जलसे कलश भरा और शीघ्रतासे अपने आश्रम पहुँचे। वहाँ महर्षि भृगुने उनसे विलम्बका कारण पूछा तो उन्होंने राजा सोमकान्तकी दुर्दशा और उनकी पत्नीकी अद्भुत सेवाका अत्यन्त करुण वर्णन सुनाया। कृपामय महात्मा भृगुने अपने पुत्रसे कहा—'बेटा! तुम उन लोगोंको यहीं ले आओ।' च्यवन पुनः सरोवर-तटपर पहुँचे। तबतक राजाके दोनों अमात्य भी वहाँ आ गये थे। च्यवनने महारानीसे कहा—'माता! मेरे तपस्वी पिताने आपलोगोंको आश्रममें बुलाया है।' सुधर्मा अत्यन्त प्रसन्न हुई। वह अपने पति एवं सेवकोंसहित मुनिपुत्रके पीछे-पीछे महर्षिके आश्रम- पर पहुँची। महर्षि भृगुका आश्रम अत्यन्त पवित्र एवं सुखद था। उसमें सर्वत्र विविध प्रकारके सुगन्धित पुष्प खिले थे। आश्रममें वृक्षोंपर विविध प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे थे। विडाल, नेवला, बाज, मयूर, सर्प, गज, गाय, सिंह और व्याघ्र आदि सभी प्राणी अपना वैरभाव त्यागकर एक साथ सुखपूर्वक रह रहे थे। वेद-पाठ हो रहा था और यज्ञ-धूमसे समस्त आश्रम पावनताका विग्रह बना हुआ था। सोमकान्त, उनकी पत्नी सुधर्मा और दोनों मन्त्रियोंने व्याघ्रचर्मपर आसीन परम तेजस्वी तपस्वी महर्षि भृगुको देखा तो दण्डकी भाँति उनके चरणोंपर गिर पड़े। नरेशने हाथ जोड़कर निवेदन किया—'प्रभो! आपके दर्शनसे मेरे पुण्य उदित हो गये। मैंने जीवनभर धर्मका पालन किया है, किंतु पता नहीं, मेरे किस महान् पातकसे मेरी ऐसी दुर्दशा हो रही है कि मेरा जीवन दुर्बह हो गया है। मेरे सभी प्रयत्न विफल हो गये हैं। अब मैं आपकी शरणमें हूँ। आपके आश्रममें हिंस्र पशुओंने भी अपना सहज वैर त्याग दिया है। दयामय! आप मुझपर दया करें।' नरेशके करुण वचन सुन महर्षि भृगु कुछ क्षणोंके लिये ध्यानस्थ हुए और फिर उन्होंने उनसे कहा— 'राजन्! तुम चिन्ता मत करो। मैं तुम्हें रोगसे छूटनेका उपाय बताऊँगा। अभी तुमलोग यात्रासे थके हुए हो; स्नान, भोजन और विश्राम करो।' वहाँ सबने तेल लगाकर स्नान किया और फिर वे भोजन करने बैठे। अनेक प्रकारके सुस्वादु षड्रस व्यंजन थे। राजा, रानी और अमात्य उक्त पवित्रतम आहारसे पूर्ण तृप्त हुए और फिर परम त्यागी महर्षि भृगुके आश्रममें राज्योचित व्यवस्थासे चकित-विस्मित नरेश अपनी पत्नी एवं सेवकोंसहित सुकोमल शय्यापर विश्राम करने लगे। रात्रि व्यतीत हुई। अरुणोदय हुआ। महर्षि भृगु स्नान, संध्या, जप और होम आदिसे निवृत्त हुए ही थे कि दैनिक कृत्य कर राजा सोमकान्तने अपनी सहधर्मिणी सुधर्मा एवं अमात्योंसहित महामुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनके सम्मुख बैठ गये। 'राजन्! पूर्वके जिन कुकर्मोंसे तुम्हें गलितकुष्ठकी यह दारुण यातना सहनी पड़ रही है, उसे बता रहा हूँ; तुम ध्यानपूर्वक सुनो!' करुणहृदय महात्मा भृगु राजा सोमकान्तको उनके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाते हुए कहने