भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 656 में से

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पृष्ठ 37

सम्पादकीय लेख— श्रीगणेशपुराण—एक परिचय

अत्यन्त प्राचीन कालकी बात है, सौराष्ट्रदेशके प्रसिद्ध देवनगरमें शास्त्र-मर्मज्ञ सोमकान्त नामक धर्मपरायण एक नरेश थे। वे अतिशय सुन्दर, विद्वान्, धनवान्, तेजस्वी एवं पराक्रमी थे। उनकी बुद्धिमती, अनिन्द्य सुन्दरी, धर्मपरायणा सती पत्नीका नाम सुधर्मा था। सुधर्माके गर्भसे हेमकण्ठ नामक अत्यन्त सुन्दर, शूर, पराक्रमी एवं विद्या-विनय-सम्पन्न पुत्र उत्पन्न हुआ। हेमकण्ठ अपने माता-पिताके सर्वथा अनुकूल था और वह सोमकान्तके शासन-कार्यमें दक्षतापूर्वक सहयोग प्रदान करता रहता था। रूपवान्, विद्याधीश, क्षेमंकर, ज्ञानगम्य और सुबल नामक पाँच स्वामिभक्त अमात्य भी राजा सोमकान्तकी प्रत्येक रीतिसे सेवा किया करते। सोमकान्तके राज्यमें प्रजा समृद्ध एवं सुखी थी। वह सर्वथा निरापद जीवन व्यतीत करती थी। साधु और ब्राह्मण निश्चिन्त होकर श्रीभगवान्की आराधना किया करते थे। सहसा सोम-तुल्य राजा सोमकान्तको गलितकुष्ठ हो गया। उनके शरीरमें सर्वत्र घाव हो गये। उनसे रक्त और पीब बहने लगा। नरेशने प्रख्यात चिकित्सकोंसे अनेक उपचार करवाये, किंतु उनसे उनको कोई लाभ नहीं हुआ। यशस्वी नरपति अत्यन्त निर्बल तो हो ही गये थे, उनके व्रणोंमें कीड़े पड़ गये और उनसे दुर्गन्ध निकलने लगी। अत्यन्त दुखी होकर देवनगर-नरेशने अपना शेष जीवन अरण्यमें जाकर तपश्चरणमें व्यतीत करनेका निश्चय किया। उन्होंने विधिपूर्वक अपने सुयोग्य पुत्र हेमकण्ठको आचार, धर्म और नीतिकी शिक्षा दी। तदनन्तर उसे राज्य-पदपर अभिषिक्त कर दिया। नरेशने अपने परम बुद्धिमान् एवं राजभक्त क्षेमंकर, रूपवान् और विद्याधीश नामक अमात्यत्रयको युवराजके सहयोगसे सुचारूरूपसे राज्य-संचालनका आदेश प्रदान किया। तदनन्तर राजा सोमकान्तने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा की। फिर उन्हें विविध प्रकारके व्यंजनोंसे तृप्तकर बहुमूल्य दक्षिणाएँ प्रदान कीं। राजा वनके लिये प्रस्थित हुए तो प्रजावत्सल नरेशके वियोगकी कल्पनासे समस्त प्रजा व्याकुल हो गयी। हेमकण्ठके दुःखकी सीमा नहीं थी। वह प्रजाके साथ रोता हुआ पिताके साथ पीछे-पीछे चल रहा था, किंतु नरेशने अपनी सहधर्मिणी सुधर्मा तथा सुबल और ज्ञानगम्य— दो अमात्योंके अतिरिक्त अन्य सबको समझाकर लौट जानेका आदेश दिया। हेमकण्ठको विवशतः अपनी प्रजाके साथ लौटना पड़ा। चिन्तित, दुखी, पीड़ित, निराश और उदास नरेश अपनी पत्नी सुधर्मा और दोनों अमात्योंके साथ वनके कष्ट सहते चले जा रहे थे। सती सुधर्मा अपने पतिकी निरन्तर सेवा किया करती और दोनों मन्त्री उनके लिये फल-फूल ढूँढ़कर ले आते। इस प्रकार यात्रा करते हुए वे सघन वनमें एक सरोवरके तटपर पहुँचे। सोमकान्त व्रणोंकी पीड़ा और यात्राके कष्टसे लेट गये थे। सुधर्मा उनके चरण दबा रही थी। दोनों मन्त्री फल-मूलके लिये कुछ दूर निकल गये थे। उसी समय

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