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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 39

अङ्क ] * श्रीगणेशपुराण-एक परिचय * ३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

लगे—'विन्ध्यगिरिके निकट कोल्हार नामक सुन्दर नगरमें चिद्रूप नामक एक धन-वैभवसम्पन्न वैश्य था। पतिके अनुकूल जीवन व्यतीत करनेवाली उसकी सुन्दरी पत्नीका नाम सुभगा था। तुम उसी सुभगाके पुत्र थे। तुम्हारा नाम था कामद।' एकमात्र पुत्र होनेके कारण माता-पिताने तुम्हारा अतिशय प्रीतिपूर्वक पालन किया। युवक होनेपर कुटुम्बिनी नामक सुन्दरी और सद्धर्मपरायणा युवतीसे तुम्हारा विवाह हुआ। कुटुम्बिनीके गर्भसे तुम्हारे सात कन्याएँ और पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। कुछ समय बाद तुम्हारे पिता चिद्रूपका शरीरान्त हो गया। तुम्हारी पतिपरायणा माता सुभगा अपने पतिके साथ सती हो गयी। तुम धनसम्पन्न और पूर्ण स्वतन्त्र थे। दुराचरणमें तुमने अपना सर्वस्व नष्ट कर दिया। यहाँतक कि घर भी बिक गया। तुम्हारी सरला पत्नी समझाती, पर तुम उसकी उपेक्षा कर देते। विवशतः वह अपनी संततियोंके साथ अपने पिताके घर जाकर जीवन- निर्वाह करने लगी। तुम दुराचरण-सम्पन्न सर्वथा निरंकुश थे। बलपूर्वक दूसरेका धन छीनकर मद्य, मांस और परस्त्रीका सेवन करते। तुम्हारी दुष्टता पराकाष्ठापर पहुँच गयी, तब राजाज्ञासे तुम नगरसे निर्वासित कर दिये गये। तुम वनमें पहुँचे। वहाँ तुम दस्यु-जीवन व्यतीत करने लगे। तुमसे भयभीत होकर मनुष्य ही नहीं, पशु भी प्राण बचाकर भागते थे। तुम पर्वतकी गुफामें रहते थे। तुम्हारे श्वशुरने तुमसे भयभीत होकर तुम्हारी पत्नी और बच्चोंको तुम्हारे पास पहुँचा दिया। तुम्हारी पत्नीके पास वस्त्राभरण थे और तुम्हारे पुत्र भी तेजस्वी थे; किंतु तुम रात्रिमें यात्रियोंको लूटकर उनके धन और स्त्रीका उपभोग करते। तुम सर्वथा निर्दय और हृदयहीन हो गये थे। एक बार एक ब्राह्मण अपनी युवती पत्नीके साथ उधरसे जा रहे थे। तुमने उन्हें पकड़ लिया। ब्राह्मणने करुण प्रार्थना की, धर्मोपदेश दिया, पर तुमपर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तुमने उन दीन ब्राह्मणदेवताका मस्तक उतार लिया। इस प्रकार तुम प्रतिदिन स्त्री, वृद्ध और बालकोंकी निर्दयतापूर्वक हत्या करते ही रहे। तुम सर्वथा विवेक- भ्रष्ट हो गये थे। तुम्हारा यौवन तो हत्या, लूट, परधन एवं पर- दारापहरणमें बीता; पर देखते-ही-देखते वृद्धावस्था आ गयी। तुम निर्बल हो गये। तुम्हारा शरीर काँपने लगा और तुमको अनेक प्रकारके कष्ट होने लगे। इस स्थितिमें तुम्हारा स्वजन या हितैषी कोई नहीं रहा। पुत्र और नौकर आदि सभी तुम्हारा तिरस्कार करते रहते। तुम निरन्तर दुखी रहने लगे। तुमने सोचा, 'अपना शेष धन दान कर दूँ।' तुम्हारी प्रार्थनासे एक ब्राह्मण वनमें गये। उनकी प्रार्थनापर ऋषिगण तुम्हारे पास आये, पर जब तुमने अपना धन उन्हें स्वीकार करनेके लिये आग्रह किया, तो वे तुरंत उलटे पैर वापस चले गये। सबने एक ही बात कही—'तेरे-जैसे अधम, हत्यारे, मद्यप, परस्त्रीगामी एवं क्रूरतम पापात्माका दिया धन लेनेका साहस कौन करेगा?' तुम रोगाक्रान्त थे। मुनियों और ब्राह्मणोंके वचन सुन मन-ही-मन पश्चात्ताप करने लगे। तुम्हारा हृदय हाहाकार कर रहा था, पर कोई वश नहीं था। तुम्हारे पास चाँदी, सोना और रत्नादि अधिक थे। तुमने ब्राह्मणोंके परामर्शसे एक पुरातन गणेश-मन्दिरका जीर्णोद्धार करवाया। मन्दिरके भव्य और आकर्षक बनवानेमें तुम्हारा सारा धन समाप्त हो गया। कुछ तुम्हारी स्त्री और कुछ तुम्हारे पुत्रों और मित्रोंने ले लिया। कुछ ही समय बाद तुम्हारा देहावसान हो गया। यमदूतोंने तुम्हें बड़ी यातना दी। यमके पूछनेपर तुमने पहले पुण्यकर्मोंका फल प्राप्त करना स्वीकार किया। फलतः अत्यधिक कान्तिपूर्ण गणेश-मन्दिरका जीर्णोद्धार करानेके कारण तुम सुन्दर राजा सोमकान्त हुए और तुम्हें अत्यन्त रूपवती धर्मपत्नी भी प्राप्त हो गयी।''