भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 656 में से

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अङ्क ] * श्रीगणेशपुराण-सूक्तिसुधा * ३३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वासनासहितादाद्यात्संसारकारणाद् दृढात्। अज्ञानबन्धनाज्जन्तुर्बुद्ध्वायं मुच्यतेऽखिलात् ॥ वासना; जो कि संसारका मूल और दृढ़ कारण है, और वही अज्ञानका बन्धन है, इसे जानकर प्राणी सबसे मुक्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।२१] क्रियायामक्रियाज्ञानमक्रियायां क्रियामतिः। यस्य स्यात्स हि मर्त्येऽस्मिँल्लोके मुक्तोऽखिलार्थकृत् ॥ क्रियामें अक्रियाका ज्ञान और अक्रियामें क्रियाकी बुद्धि जिसकी होती है, वही इस लोकमें सभी कर्मोंका करनेवाला होकर भी मुक्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।२४] कर्माङ्कुरवियोगेन यः कर्माण्यपि चेह वा। तत्त्वदर्शननिर्दग्धक्रियमाहुर्बुधा बुधम् ॥ जो कर्मोंके अंकुरसे रहित अर्थात् संकल्प और कामनारहित कर्म करते हैं, तत्त्वके जाननेसे उस बुद्धिमान्‌की सारी क्रियाएँ दग्ध हो जाती हैं, ऐसा पण्डितजन कहते हैं। [क्रीडाखण्ड १४०।२५] निरीहो निगृहीतात्मा परित्यक्तपरिग्रहः। केवलं वैग्रहं कर्माचरन्नायाति पातकम् ॥ जो इच्छारहित, आत्मजित् एवं सम्पूर्ण परिग्रहका परित्याग किये हैं, ऐसे व्यक्ति यदि शरीरनिमित्तक (जीवननिर्वाहार्थ) कर्म भी करें तो उन्हें कुछ पातक नहीं लगता। [क्रीडाखण्ड १४०।२७] अद्वन्द्वोऽमत्सरो भूत्वा सिद्ध्यासद्ध्योः समश्च यः। यथाप्राप्तीह सन्तुष्टः कुर्वन् कर्म न बद्ध्यते ॥ जो द्वन्द्व और ईर्ष्याहीन होकर सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टि रखते हुए जो कुछ प्राप्ति हो, उसीमें सन्तुष्ट रहते हैं, ऐसे प्राणी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते। [क्रीडाखण्ड १४०।२८] सर्वेषां भूप यज्ञानां ज्ञानयज्ञः परो मतः। अखिलं लीयते कर्म ज्ञाने मोक्षस्य साधने ॥ हे राजन्! सब यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। मोक्षसाधक ज्ञानयज्ञमें सब कर्म क्षीण हो जाते हैं। [क्रीडाखण्ड १४०।३९] भक्तिमानिन्द्रियजयी तत्परो ज्ञानमाप्नुयात्। लब्ध्वा तत्परमं मोक्षं स्वल्पकालेन यात्यसौ ॥ इन्द्रियोंको वशमें करनेवाला भक्तिमान्, तत्पर पुरुष ही ज्ञानको प्राप्त कर सकता है और ज्ञान प्राप्त होनेसे थोड़े समयमें ही वह मुक्तिको प्राप्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।४७] भक्तिहीनोऽश्रद्दधानः सर्वत्र संशयी तु यः। तस्य शं नापि विज्ञानमिह लोकोऽथ वा परः ॥ जो भक्तिहीन, श्रद्धारहित और सर्वत्र संदिग्ध चित्तवाला है, उसे कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती, न ज्ञान होता है तथा उसका इहलोक और परलोक नष्ट हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४०।४८] जेतारः षड्रिपूणां ये शमिनो दमिनस्तथा। तेषां समन्ततो ब्रह्म स्वात्मज्ञानां विभात्यहो ॥ जो काम-क्रोधादि छहों शत्रुओंको जीत चुके हैं, जो शम और दमका पालन करते हैं, उन आत्मज्ञानियोंको सर्वत्र ब्रह्म ही दीखता है। [क्रीडाखण्ड १४१।२५] यो निग्रहं दुर्ग्रहस्य मनसः सम्प्रकल्पयेत्। घटीयन्त्रसमादस्मान्मुक्तः संसृतिचक्रकात् ॥ [हे राजन्!] जो निग्रह करनेमें कठिन इस मनका नियमन करता है, वह घटीयन्त्रके समान घूमनेवाले इस संसारचक्रसे मुक्त हो जाता है। [क्रीडाखण्ड १४२।२०] यं यं देवं स्मरन् भक्त्या त्यजति स्वं कलेवरम्। तत्तत्सालोक्यमायाति तत्तद्भक्त्या नराधिप ॥ भक्तिपूर्वक जिस-जिस देवताको स्मरण करता हुआ प्राणी अपने कलेवरका त्याग करता है, हे राजन्! उनकी भक्ति करनेसे उन्हींके लोकको प्राप्त होता है। [क्रीडाखण्ड १४३।१७] अनन्यशरणो यो मां भक्त्या भजति भूमिप। योगक्षेमौ च तस्याहं सर्वदा प्रतिपादये ॥ हे राजन्! जो अनन्यशरण होकर भक्तिसे मेरा भजन करता है, मैं सदा उसके योगक्षेम (मंगल)-का विधान करता हूँ। [क्रीडाखण्ड १४३।२०] कामो लोभस्तथा क्रोधो दम्भश्चत्वार इत्यमी। महाद्वाराणि वीचीनां तस्मादेतांस्तु वर्जयेत् ॥ काम, लोभ, क्रोध, दम्भ-ये नरकके चार महाद्वार हैं, इस कारण इनको त्यागना चाहिये। [क्रीडाखण्ड १४७।२३]