श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 32, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
श्रीगणेशपुराण-सूक्तिसुधा
शुभं वाप्यशुभं कर्म न मुञ्चति नरं क्वचित्॥ यस्र्यां यस्यामवस्थायां कृतं भवति कर्म यत्। तस्यां तस्यामवस्थायां भुज्यते प्राणिभिर्ध्रुवम्॥ मनुष्यके द्वारा किया गया शुभ या अशुभ कर्म उसका कभी पीछा नहीं छोड़ता; जिस-जिस अवस्थामें जैसा-जैसा कर्म किया गया होता है, उस-उस अवस्थामें प्राणीको उसका फल भोगना पड़ता है, यह ध्रुव सत्य है। [उपासनाखण्ड २।२-३] दुःखस्य भोक्ता न परोऽस्ति नैव सुखस्य वा पूर्वकृतस्य जन्तोः। यथा यथा कर्मफलं प्रसक्तं तदेव भोग्यं स्वयमेव तादृक्॥ पूर्वकालमें किये गये [पाप या पुण्य] कर्मका फल दुःख या सुखके रूपमें प्राणीको स्वयं ही भोगना पड़ता है, दूसरा कोई उसे नहीं भोग सकता। जिस-जिस प्रकारसे कर्मफलको भोगना निश्चित होता है, उसे वैसे ही और स्वयंको ही भोगना पड़ता है। [उपासनाखण्ड २।२२] पितुर्वाक्ये रतो नित्यं श्रद्धया श्राद्धकृत्तथा। पिण्डदो यो गयायां तु स पुत्रः पुत्र उच्यते॥ पिताके वचनोंका पालन करनेमें नित्य रत रहनेवाला, [मरणोपरान्त] श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करनेवाला और गयामें पिण्डदान करनेवाला पुत्र ही पुत्र कहा जाता है। [उपासनाखण्ड २।२८] परोपकारं कुर्याच्च द्रव्यप्राणवचोऽमृतैः। परापकारं नो कुर्यादात्मस्तवनमेव च॥ धन, प्राण तथा अमृतरूपी (सहानुभूतिपूर्ण) वचनोंसे दूसरोंका उपकार करे, कभी किसीका अपकार न करे और न ही आत्मप्रशंसा करे। (उपासनाखण्ड ३।२५) विश्वासो यस्य नैव स्यात्तत्र नो विश्वसेत् क्वचित्॥ विश्वस्तेऽत्यन्तविश्वासो न कर्तव्यो बुभूषता। कृतवैरेऽथ विश्वस्ते कदापि न च विश्वसेत्॥ जो विश्वसनीय न हो, उसपर कभी भी विश्वास न करे। समृद्धिकी इच्छावाला राजा विश्वस्त व्यक्तिपर भी अत्यन्त विश्वास न करे। जिससे एक बार वैर हो गया हो, वह यदि पुनः विश्वस्त बन गया हो तथापि उसपर तो कभी भी विश्वास न करे। [उपासनाखण्ड ३।३०-३१] अधमो यदि निन्देत स्तुवीत यदि वा क्वचित्। न क्रुध्येन्न च तुष्येच्च किं तया किं तयापि च॥ यदि अधम व्यक्ति कभी निन्दा करे अथवा प्रशंसा करे तो न तो उसपर क्रोधित हो, न ही प्रसन्न; क्योंकि उसकी निन्दा या स्तुतिका क्या अर्थ!। [उपासनाखण्ड ३।३५] ऋणतो ब्राह्मणं चैव पङ्कतो गां समुद्धरेत्। अनृतं न वदेत् क्वापि सत्यं क्वापि न हापयेत्॥ ब्राह्मणका ऋणसे और गायका कीचड़से सम्यक् रूपसे उद्धार करे। कभी असत्य न बोले और कभी सत्यको न छोड़े। [उपासनाखण्ड ३।४०] क्षुब्धं प्रसन्नं हृदयं समीक्ष्या- पकारिणं चोपकरं हि वक्ति॥ क्षुब्ध या प्रसन्न हृदय स्वयं ही समीक्षा करके बता देता है कि कौन अपकारी है और कौन उपकारी। [उपासनाखण्ड ५।२६] विचार्य सम्यक् कर्तव्यं कर्म साध्वितरच्च यत्॥ कर्मोंकी गति बड़ी ही सूक्ष्म होती है, अतः सत्कर्म या दुष्कर्मको भलीभाँति विचारकर करना चाहिये। [उपासनाखण्ड १०।१७] बुद्ध्या युक्त्यार्जवेनापि गुरूणि च लघूनि च॥ कार्याणि साधयेद्धीमान् गर्वान्न च मत्सरात्। कार्य चाहे बड़े हों या छोटे; बुद्धिमान् मनुष्यको उन्हें बुद्धिद्वारा, युक्तिपूर्वक और विनम्रतासे सम्पन्न करना चाहिये न कि गर्व और मत्सर (ईर्ष्या)-पूर्वक। [उपासनाखण्ड १०।१८-१९] नालोकयेन्मुखं तेषां विमुखा ये गजानने। तेषां दर्शनमात्रेण विघ्नानि स्युः पदे पदे॥