श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] उन प्रभुने अनेक अवतार ले करके पृथ्वीके भारका हरण किया। उन्होंने अनेक प्रकारसे दैत्योंका वध करके देवताओंको उनके स्थान (पद)-पर स्थापित किया। दुष्टोंका निर्मूलन करनेमें सक्षम वे सज्जनोंका पालन करनेमें तत्पर रहते हैं॥ १४-१५॥ हे मुने! श्रवणमात्रसे सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाले गणेशजीके आख्यानपर आधारित इतिहासका श्रवण कीजिये, जिसे भगवान् विष्णुने कहा था॥ १६॥ [भगवान्] विष्णु बोले—पृथक्-पृथक् युगोंमें गणेशजी भिन्न-भिन्न नामवाले, भिन्न-भिन्न वाहनवाले, भिन्न-भिन्न कर्मोंवाले, भिन्न-भिन्न गुणोंवाले और भिन्न- भिन्न दैत्योंका संहार करनेवाले हुए हैं॥ १७॥ वे सत्ययुगमें सिंहवाहन, दस भुजाओंवाले, तेजोमय स्वरूपवाले, विशाल शरीरवाले, सबको वर देनेवाले और जितेन्द्रिय हुए। [उस समय] उनका नाम 'विनायक' था। त्रेतायुगमें वे मयूरवाहन, छः भुजाओंवाले और श्वेत वर्णवाले थे। [उस समय] वे 'मयूरेश्वर' नामसे त्रिभुवनमें विख्यात हुए॥ १८-१९॥ द्वापरमें वे रक्त वर्णवाले, मूषकवाहन और चतुर्भुज स्वरूपवाले हुए। [उस समय] देवताओं और मनुष्योंद्वारा पूजित उनकी 'गजानन'—इस नामसे प्रसिद्धि हुई॥ २०॥ कलियुगमें वे धूम्रवर्ण, अश्ववाहन और दो भुजाओंवाले होंगे। म्लेच्छोंकी सेनाओंका विनाश करनेवाले वे 'धूम्रकेतु'— इस नामसे विख्यात होंगे॥ २१॥ हे मुने! उन्होंने जिस-जिस दैत्यका हनन किया था, उस सबका अब मैं वर्णन करता हूँ। अंगदेशके एक नगरमें रौद्रकेतु नामक ब्राह्मण हुआ था॥ २२॥ वह सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वार्थका ज्ञाता, वेद- वेदांगोंका पारगामी विद्वान्, बृहस्पतिके सदृश [बुद्धिमान्], अग्निहोत्र करनेवाला, देवताओं-गौओं और ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाला, नित्य ईश्वरकी उपासना करनेवाला और सभी आगम-शास्त्रोंका पारंगत विद्वान् था॥ २३ १/२॥ उसकी पत्नीका नाम शारदा था, जो रूप और कान्तिसे सुशोभित थी। उसके सदृश सुन्दर स्त्री न तो अप्सराओंमें कोई थी, न आठ प्रकारकी नायिकाओंमें ही
[दायाँ स्तम्भ] कोई थी। उसके मुखकी कान्तिने चन्द्रमा [की कान्ति]- को पराजित कर दिया था, मानो जिसके कारण ही चिन्तासे वह क्षयग्रस्त हो गया था॥ २४-२५॥ अनेक दिव्य आभूषणोंसे आभूषित होकर वह इस धरातलको इस प्रकार जगमगाती थी, जैसे आकाशमण्डलको नक्षत्रमालाएँ द्योतित करती हैं॥ २६॥ शरत्कालीन कमलके समान नेत्रोंवाली वह शारदा शरत्कालीन चन्द्रमासे सुशोभित शारद (कार्तिक)मासमें किसी समय गर्भवती हो गयी। [उस समय] उसके शरीरके तेज [के आधिक्य]-से कुछ भी विदित नहीं होता था। उस समय वह साध्वी दोहद-सम्बन्धी जो- जो इच्छाएँ करती थी, उन सभी इच्छाओंको उसका पति पूरा करता था॥ २७-२८॥ इस प्रकार उसने नौवें मासमें जुड़वाँ पुत्रोंको जन्म दिया। वे दोनों अत्यन्त कान्तिमान् और माता-पिताके अन्तःकरणको आनन्दित करनेवाले थे। वे दोनों आजानुबाहु (घुटनोंतक लम्बी भुजाओंवाले) और बड़े-बड़े नेत्रोंवाले थे। उन्हें देखकर उनके पिता (रौद्रकेतु)-ने कहा—'आज मैं पितरोंके ऋणसे उऋण हो गया। आज मेरा तप धन्य हो गया, वंश धन्य हो गया और जन्म धन्य हो गया; जो मैंने इन दोनों पुत्रोंको देख लिया॥ २९-३० १/२॥ तत्पश्चात् उसने अर्घ्य आदिसे श्रेष्ठ द्विजोंका सम्यक् प्रकारसे पूजनकर और गणोंके स्वामी गणेशजीकी पूजा की, इसके बाद मातृकापूजनकर शीघ्र ही स्वस्तिवाचन करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंद्वारा आभ्युदयिक श्राद्ध और जातकर्म-संस्कार सम्पन्न कराया॥ ३१-३२॥ उसने ब्राह्मणोंका भक्तिपूर्वक सम्यक् प्रकारसे पूजनकर उन्हें अनेक प्रकारके दान दिये तथा वस्त्र, रत्न, धन आदिसे सुहृदोंको सम्मानित किया। पुत्र-जन्मसे अत्यन्त प्रसन्न उसने अनेक प्रकारके बाजे बजवाते हुए घर-घरमें शर्करा और ताम्बूल बँटवाया॥ ३३-३४॥ जैसे कोई ध्यानपरायण योगी सद्वस्तु परब्रह्म परमात्माका दर्शन प्राप्तकर प्रसन्न होता है, [वैसे ही वह पुत्रोंके जन्मपर प्रसन्न था।] तदनन्तर [सूतकके] दस दिन बीत जानेपर उसने ज्योतिर्विद् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको