श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 273, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीमन्महर्षिकृष्णद्वैपायनव्यासविरचित [ श्रीगणेशपुराण ] [ उत्तरार्ध ] क्रीडाखण्ड पहला अध्याय देवान्तक और नरान्तकका जन्म तथा नारदजीका उन्हें पंचाक्षरी महाविद्याका उपदेश देना
[बायाँ स्तम्भ]
मुनिगण बोले— हे सूतजी! हे महामते! हम सबने आपके द्वारा सम्यक् रूपसे वर्णित आख्यानका आदरपूर्वक श्रवण किया; परंतु जैसे प्राणी प्रतिदिन अन्नका भक्षण करनेपर भी तृप्त नहीं होते, वैसे ही हमें भी [कथा- श्रवणसे] तृप्ति नहीं हो रही है, अतः आप अन्य कथाओंको कहिये, जिससे हम सब तृप्त हो सकें ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले— [हे मुनियो!] मैंने उपासनाखण्डका वर्णन किया, अब मैं आप सबके समक्ष क्रीडाखण्डका वर्णन करता हूँ। जिस प्रकारसे गणेशजीने अनेक दैत्योंका वध किया तथा सज्जनों, द्विजों एवं गौओंका पालन किया; उसे मैं अत्यन्त आदरपूर्वक सम्यक् रूपसे कहता हूँ, आप लोग एकाग्र चित्तसे श्रवण करें ॥ ३-४ ॥ मुनिगण बोले— [हे सूतजी!] आप जैसे-जैसे उस [गणेश] पुराणका वर्णन कर रहे हैं, वैसे-वैसे हमारी श्रवणेच्छा बढ़ती जा रही है, इसलिये आप उसका सम्यक् रूपसे कथन करते रहें, जिससे सभी लोग इस संसार-सिन्धुसे शीघ्र ही मुक्त हो जायें ॥ ५ ॥ सूतजी बोले— पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिसे अमित तेजस्वी व्यासजीसे कहा था और भृगु [मुनि]-ने जिसका [राजा] सोमकान्तके प्रति कथन किया था; उस [कथा-प्रसंग]-को मैं आप सबसे कहता हूँ॥ ६ ॥ व्यासजी बोले— हे कमलजन्मा ब्रह्माजी! हे
[दायाँ स्तम्भ]
विभो! गणेशजीके सुन्दर चरितका वर्णन कीजिये। उन प्रभुने जो-जो रूप धारण करके जो-जो [लीलाएँ] की हैं; हे ब्रह्मन्! उन्हें मेरे कहनेसे आप कृपा करके कहिये। इस उपासनाखण्डको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ७-८ ॥ उन गणेशजीने जिन-जिन अवतारोंके द्वारा जिन- जिन महाबली दैत्योंका वध किया है, उनके उन-उन कर्मोंको आप कहिये। आपके मुखकमलसे उनके बालचरित तथा अनेक प्रकारकी लीलाओंका श्रवणकर मेरे मनको विश्राम मिल जायगा ॥ ९-१० ॥ सूतजी बोले— [हे मुनियो!] व्यासजीके इस प्रकार पूछनेपर उनके अनेक प्रश्नोंको सुनकर कमलासन ब्रह्माजीने अनेक प्रकारकी दिव्य कथाओंको कहा ॥ ११ ॥ ब्रह्माजी बोले— हृदयको आनन्दित करनेवाले हे व्यास! तुमने उचित प्रश्न किया है। हे मुने! श्रोताके आदरपूर्वक कथा-श्रवण करनेसे वक्ताकी कथा सुनानेके प्रति प्रीति बढ़ जाती है ॥ १२ ॥ [हे व्यासजी!] तुम्हारे-जैसे पुण्यश्लोक श्रोताके प्रति मैं अत्यन्त गोप्य तथ्योंका भी प्रकाशन कर सकता हूँ; क्योंकि श्रोताके सत्कथाओंके श्रवणमें रुचि लेनेसे वक्ताकी कथा सुनानेकी शक्ति बढ़ जाती है ॥ १३ ॥ इस समय मैं तुमसे सम्पूर्ण गणेशचरितको कहूँगा,