श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 272, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
तीर्थों तथा पुण्यक्षेत्रोंकी यात्राओंसे, हजार भार (एक | निरूपण कर दिया। उन्होंने भी गणेशजीकी उपासनाके तौल) सुवर्णका दान करनेसे तथा अन्य करोड़ों प्रकारके | फलका अन्त नहीं पाया और न ही वे गणेशजीकी नाम- दानोंसे, कृच्छ्र, तप्तकृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायण व्रतोंको | महिमाको पूर्ण रूपसे जान पाये ॥ ५१ १/२ ॥ करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह गणेशजीके इन | भृगुजी बोले-हे राजन्! इस प्रकारसे बारह नामोंके पाठ करनेसे प्राप्त होनेवाले पुण्यके सौवें | गणेशजीकी वह अद्भुत महिमा मैंने आपको बतलायी, भागके बराबर भी नहीं है ॥ ४२-४३ १/२ ॥ | जिसे प्रसन्न हुए ब्रह्माजीने व्यासजीके समक्ष निरूपित जो मनुष्य प्रातःकाल उठ करके शौच-स्नान | किया था। हे राजन्! सोमकान्त ! [गणेशपुराणके] आदिसे निवृत्त हो पवित्र होकर समाहित चित्तसे श्रद्धा- | इस उपासनाखण्डका मैंने वर्णन किया, यदि आपको भक्तिपूर्वक इन बारह नामोंका पाठ करता है, उस | श्रवण करनेमें श्रद्धा हो तो मैं गणनाथ गणेशजीके व्यक्तिको कोई भी विघ्न बाधा नहीं पहुँचाते। उसके | अन्य चरितको भी बताऊँगा, जो कि सम्पूर्ण पापोंका सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं और अन्तमें वह मोक्ष प्राप्त | नाश करनेवाला है ॥ ५२-५४ ॥ करता है ॥ ४४-४५ ॥ | सूतजी बोले-हे शौनक आदि महर्षियो ! इस उसके दर्शन करनेसे सभी लोग पवित्र हो जाते हैं। | प्रकारसे मैंने विविध कथाओं तथा उनके मध्य आनेवाली इसलिये हे मुने ! शाक्त समुदायवाले हों, शैव हों या वैष्णव | अवान्तर कथाओंसे समन्वित गणेशजीकी उस उपासनाका हों—सभी गणेशजीके इन द्वादश नामोंका पाठ करके | वर्णन आपके समक्ष किया, जिसका वर्णन ब्रह्माजीने अपने सभी कार्योंको करते हैं, तो फिर गणेशजीको अपना | महर्षि वेदव्यासके लिये किया था और उसी पापनाशक इष्ट माननेवाले गाणेश-सम्प्रदायके लोग ऐसा करें तो | उपासनाका निरूपण महर्षि भृगुने राजा सोमकान्तके इसमें आश्चर्यकी कौन-सी बात है ? ॥ ४६-४७ ॥ | समक्ष किया था ॥ ५५-५६ ॥ हे ब्रह्मन्! इन बारह नामोंमेंसे किसी एक भी | जो व्यक्ति इस श्रेष्ठ गणेशपुराणका श्रवण करता नामका उच्चारण कार्यके प्रारम्भमें किये बिना कोई भी | है, वह सभी आपत्तियोंसे मुक्त होकर, अनेक भोगोंका कार्य सिद्ध नहीं होते। इसलिये किसी एक नामका | उपभोग करके, पुत्र-पौत्रादिसे सम्पन्न होकर ज्ञान- उच्चारण अवश्य करना चाहिये ॥ ४८ ॥ | विज्ञानसे समन्वित हो जाता है और गणेशजीकी कृपासे जो दुष्ट हैं, नास्तिक हैं, उनके भी जो-जो कार्य | उत्तम मुक्ति प्राप्त करता है। सैकड़ों करोड़ कल्प बीत सिद्ध होते हैं, [उसमें गणेशानुग्रह ही मुख्य हेतु है], वे | जानेपर भी उसका [इस संसारमें] पुनरागमन नहीं (नास्तिकादि) भी [वास्तवमें] नाम-महिमाको जाने | होता ॥ ५७-५८ १/२ ॥ बिना ही अर्थात् अज्ञानमें गणेशजीके बीजमन्त्रका उच्चारण | जो व्यक्ति अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक इस गणेश- करके अपना कार्य करते हैं ॥ ४९ ॥ | पुराणको सुनाता है तथा जो सुनता है—दोनों ही इस हे मुने ! इस प्रकार मैंने आपके समक्ष गणेशजीकी | पुराणके सुनने-सुनानेसे मिलनेवाले कहे गये फलको सम्पूर्ण महिमाको अत्यन्त संक्षेपमें बतलाया और उनकी | प्राप्त करते हैं, जिस प्रकार राजा सोमकान्तने अत्यन्त उपासनाका जो विविध प्रकारका फल है, उसका भी | श्रद्धा-भक्तिपूर्वक इस पुराणको सुननेसे [अभीष्ट] फलको अपनी बुद्धिके अनुसार निरूपण किया ॥ ५० ॥ | प्राप्त किया था, वैसे ही आप लोग भी सर्ववेत्ता और भगवान् विष्णुने जितना कहा था, उतनेका मैंने | सुखी हो जायेंगे ॥ ५९-६० ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'ब्रह्मा एवं व्यास और भृगु तथा सोमकान्तके संवादमें गजानन नाम- निरूपण' नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणका उपासनाखण्ड पूर्ण हुआ ॥