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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 271, कुल 656 में से

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पृष्ठ 271

उ०ख०-अ०१२ ] * देवताओंको गणेशजीसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति * २६९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 की और अनेक प्रकारसे उसकी भलीभाँति पूजा करके उस मूर्तिका 'कपिल' यह उत्तम नाम रखा। इसी प्रकार गुह्यकों, चारणों तथा सिद्धोंने गणेशजीकी एक दूसरी मूर्तिका निर्माण किया और उस श्रेष्ठ मूर्तिकी बहुत बड़े मन्दिरमें स्थापना की। स्थापना-प्रतिष्ठाके अनन्तर उन्होंने प्रणाम किया और उसका पूजन किया। उन सभीने यथार्थ नामवाला उसका 'गजकर्ण' यह प्रसिद्ध नाम रखा। उसके कृपाप्रसादसे वे सभी विमानपर आरूढ़ होकर देवलोकको गये॥ १८-२१॥ मनुष्योंने 'लम्बोदर' इस नामसे गणेशजीकी मूर्ति स्थापित की। वन्य जीवों ने एक दूसरी श्रेष्ठ मूर्ति स्थापित की और 'विकट' इस नामसे उसकी पूजा की। तदनन्तर वे वनको चले गये। इसी प्रकार पर्वतों तथा वृक्षोंने एक दूसरी मूर्तिकी स्थापनाकर उसकी पूजा की तथा उसका 'विघ्ननाशन' यह नाम रखकर वे पृथ्वीमें अवस्थित हो गये। उन गणेशजीकी कृपासे वे पर्वत तथा वृक्ष भी कीर्तिको प्राप्त हुए॥ २२-२४॥ सभी पक्षियोंने रत्नमयी तथा स्वर्णमयी मूर्तिकी स्थापना की। उन्होंने उस मूर्तिका 'गणाधिप' यह नाम रखा, तदनन्तर उस मूर्तिका पूजन किया और उसे प्रणाम किया॥ २५॥ सभी सर्पोंने गणनायक गणेशजीकी एक मूर्ति स्थापित की और उन्होंने उसका 'धूम्रकेतु' यह प्रसिद्ध नाम रखा। सभी जलाशयोंने एक शुभ प्रतिमाकी स्थापना की और उस मूर्तिका 'गणाध्यक्ष' यह नाम रखकर बड़े ही महोत्सवके साथ उसका पूजन किया॥ २६-२७॥ कृमि तथा कीटादिगणोंने और वनस्पतियों एवं ओषधियोंने मिलकर गणेशजीकी एक श्रेष्ठ मूर्ति स्थापित की, जो 'भालचन्द्र' नामसे प्रसिद्ध हुई॥ २८॥ दूसरे सचेतन प्राणियोंने विनायक गणेशजीकी एक महान् मूर्ति बनाकर रत्ननिर्मित मन्दिरके मध्य उसकी प्रतिष्ठा की, गणेशजीकी वह मूर्ति 'गजानन' इस नामसे विख्यात हुई। उस मूर्तिका उन्होंने भक्ति-भावपूर्वक पूजन किया। वह 'गजानन' नामक गणेश-प्रतिमा सभीकी सभी अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाली है। जिन-जिन सचेतन प्राणियोंने उस गजानन नामक महामूर्तिका पूजन किया था, वे अपनी-अपनी जातिमें महान् कीर्तिको प्राप्त हुए। भगवान् गणेशजीकी कृपासे सभी अपने-अपने कार्यमें दक्ष हुए तथा अत्यन्त सुखी हो गये॥ २९-३० १/२॥ [ब्रह्माजी बोले-हे व्यासजी!] गणेशजीके प्रत्येक नामका वर्णन करनेकी सामर्थ्य मुझमें नहीं है। उनके अनन्त नामोंमेंसे सार-सार ग्रहणकर उनके सहस्रनाम स्तोत्रकी रचना की गयी है। उन सहस्र नामोंमें भी जो बारह नाम सारभूत हैं, उनका मैंने निरूपण किया है। हे ब्रह्मन्! जैसे समुद्र-मन्थनके समय (अनन्त रत्नोंमेंसे) रत्नसागर समुद्रसे चौदह प्रधान रत्न निकले हैं, वैसे ही ये बारह नाम हैं। इस प्रकार मैंने संक्षेपमें गणेशजीकी नाम-महिमा बतलायी, उन्हें विस्तारसे बतलानेमें न तो (हजार मुखवाले) शेष समर्थ हैं, न भगवान् महादेव समर्थ हैं, न मैं (ब्रह्मा) समर्थ हूँ और न विष्णु ही समर्थ हैं तो फिर हे सत्यवतीनन्दन व्यासजी! अन्य इन्द्रादि देवताओं, मशक आदि प्राणियों, यक्षों तथा राक्षसोंकी क्या गणना? इसलिये सभी कार्यों [के आरम्भ]-में भगवान् गजाननका पूजन करना चाहिये॥ ३१-३५॥ जो विघ्नोंका समूल उच्छेद करनेवाले देवाधिदेव गणेशजीका पूजन नहीं करता है, वह दुरात्मा चाण्डालके समान दूरसे ही परित्याज्य है॥ ३६॥ मुनि बोले-[हे ब्रह्मन्!] उन बारह नामोंका आप मुझसे क्रमशः कथन कीजिये। उन नामोंका श्रवण करने तथा पाठ करनेसे सब कार्य निर्विघ्नतासे सम्पन्न हो जाते हैं॥ ३७॥ ब्रह्माजी बोले-सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशन, गणाधिप, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र तथा गजानन-इन बारह नामोंका जो विद्यारम्भ, विवाह, प्रवेश, यात्राप्रस्थान, संग्राम तथा संकटके समय पाठ करता है अथवा इन्हें सुनता है, तो उसके कार्यमें कोई विघ्न उपस्थित नहीं होता॥ ३८-४०॥ सभी विघ्न-बाधाओंको शान्त करनेके लिये श्वेत वस्त्र धारण करनेवाले, चन्द्रमाके समान श्वेत आभावाले, चार भुजाओंको धारण करनेवाले तथा प्रसन्न मुखमण्डलसे समन्वित भगवान् गणेशका ध्यान करना चाहिये॥ ४१॥ करोड़ों कन्यादानोंके करनेसे, करोड़ों यज्ञ तथा व्रत-उपवास करनेसे, विविध प्रकारकी तपस्याओं, सभी Kalyana Visheshank 2021_Section_10_2_Front