भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 656 में से

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पृष्ठ 270

२६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बानबेवाँ अध्याय देवताओंको गणेशजीसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, देवताओं आदिद्वारा गणेशजीकी द्वादश मूर्तियोंकी स्थापना, गणेशजीके सुमुख आदि द्वादश नामोंके स्मरणका माहात्म्य, उपासनाखण्डके श्रवणकी महिमा तथा उपासनाखण्डका उपसंहार ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे वे सभी गणेशजीको प्रणाम करके और उनका स्तवन करके उन गणाध्यक्षसे पुनः बोले- 'आज हम लोग अत्यन्त धन्य हो गये हैं। हमारी तपस्या धन्य है, हमारा दान देना धन्य है, हमारा ज्ञान धन्य है, हमारे द्वारा किये गये यज्ञ-यागादि धन्य हैं, हमारे पूर्वज धन्य हैं और आज हमारे नेत्र धन्य हो गये हैं, जिनके द्वारा गजानन भगवान्का दर्शन किया गया है।' इस प्रकार उन देवों आदिके अमृतरूपी वचनों तथा उनके द्वारा की गयी स्तुतियोंसे वे द्विरदानन भगवान् गणेश अत्यन्त सन्तुष्ट हो गये और उन सुनते हुए कश्यपपुत्रोंसे गम्भीर वाणीमें बोले - ॥ १-३॥ [हे कश्यपपुत्रो!] आप सब लोगोंने मुझ निर्गुणका विग्रहके रूपमें जैसा प्रत्यक्ष दर्शन किया है, वैसा स्वरूप मैंने ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवताओंको भी नहीं दिखाया है। मैं तुम लोगोंके द्वारा की गयी इस स्तुतिसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ और वर देनेके लिये यहाँ उपस्थित हुआ हूँ, आप लोगोंको जो-जो भी अभीष्ट हो, उस सबका आप मुझसे वरण कर लें ॥ ४-५॥ हे मुनीश्वर ! उन भगवान् गणेशके द्वारा इस प्रकार कहे गये उन कश्यपपुत्रोंमें जिसका जो अभिलषित था, वह उसने उन गजाननसे माँगा ॥ ६ ॥ मेरे चार मुखोंके द्वारा भी उन वरदानोंका असंख्य होनेके कारण यथार्थ वर्णन नहीं किया जा सकता। अतः मैंने संक्षेपमें ही आपको बताया ॥ ७॥ जिन-जिन वरोंको कश्यपपुत्रोंने गणेशजीसे माँगा था, उन सभीको वे वर उन्होंने प्रदान किये। गणेशजी उन सभीसे पुनः बोले- 'यह स्तोत्र मुझे अत्यन्त प्रिय है, जो व्यक्ति तीनों सन्ध्यासमयोंमें इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह विद्यावान् तथा पुत्रवान् हो जायगा। वह आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, कीर्तिका विस्तार, विजय एवं अभ्युदयको प्राप्त करेगा और अपनी सभी अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेगा तथा अन्तमें परम पदको प्राप्त करेगा' ॥ ८-९ ॥ वे गणोंके अधिपति गणेशजी पुनः बोले- 'जो व्यक्ति तीन दिनोंतक तीनों संध्याकालोंमें इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसके सभी कार्य सिद्ध हो जायँगे ॥ १०॥ जो आठ दिनोंतक इन आठ श्लोकोंका एक बार पाठ करेगा और चतुर्थी तिथिको आठ बार इस स्तोत्रको पढ़ेगा, वह आठों सिद्धियोंको प्राप्त कर लेगा ॥ ११ ॥ जो एक मासतक प्रतिदिन दस बार इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह राजाके द्वारा बन्धनमें डाले गये प्राणदण्डके भागी व्यक्तिको उस बन्धनसे मुक्त कर डालेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ १२ ॥ इस स्तोत्रके पाठसे विद्याका अभिलाषी विद्याको प्राप्त करता है। पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाला पुत्र प्राप्त करता है, भार्याकी कामनावाला भार्या प्राप्त करता है तथा धनार्थी व्यक्ति धन प्राप्त करता है। परम श्रद्धा-भक्तिके साथ भगवान् गणेशजीका ध्यान करते हुए इस स्तोत्रका प्रतिदिन इक्कीस बार पाठ करनेसे सम्पूर्ण मनोरथोंकी प्राप्ति होती है।' इस प्रकार कहनेके अनन्तर सम्पूर्ण जगत्के आधार, सुन्दर मुखवाले वे भगवान् गजानन सभीके देखते-देखते अन्तर्धान हो गये ॥ १३-१४१/२॥ तदनन्तर देवताओंने सुन्दर मुखमण्डलवाली एक मूर्तिका निर्माण किया और उसे रत्ननिर्मित एक विशाल मन्दिरमें प्रतिष्ठापित किया और अत्यन्त विख्यात उनका 'सुमुख' यह नाम रखा। उस मूर्तिका पूजन करके तथा उसे प्रणाम करके सभी देवता अपने-अपने स्थानोंके लिये चले गये। अपने-अपने कर्तव्योंमें तत्पर रहनेवाले उन सभी मुनियोंने भी [गणेशजीकी एक उत्तम मूर्तिकी स्थापना करके उसकी] पूजा की और 'एकदन्त' यह प्रसिद्ध नाम रखा ॥ १५-१७१/२ ॥ गन्धर्वों तथा किन्नरोंने अत्यन्त श्रेष्ठ सुवर्णमय मन्दिरमें गणेशजीकी एक दूसरी उत्तम प्रतिमा स्थापित Kalyana Visheshank 2021_Section_10_1_Back