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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 656 में से

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पृष्ठ 276

२७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- एवं पल्लवोंसे सुशोभित था। वहाँ पर्वतोंकी विशाल गुफाएँ तथा अनेक प्रकारकी प्रस्तर-शिलाएँ थीं ॥ ४॥ वहाँ रहते हुए उन दोनोंने महान् तपस्या प्रारम्भ कर दी। वहाँ वे दोनों एक अँगूठेपर स्थित होकर मनको एकाग्र रखते हुए नारदजीद्वारा उपदिष्ट मंगलमयी पंचाक्षरी विद्याका जप करते थे और भगवान् शंकरका ध्यान करते थे। ऐसा करते हुए वे दोनों एक हजार वर्षोंतक निराहार रहे, [तत्पश्चात्] दो हजार वर्षों तक उन्होंने मात्र वायुका ही भक्षण किया, [तदनन्तर] एक सहस्र वर्षपर्यन्त वे दोनों सूखे पत्तोंका आहार करते रहे ॥ ५-७॥ इस प्रकार [पंचाक्षरी महाविद्याका] जप करते हुए उन दोनोंको दस सहस्र वर्ष बीत गये, तब उनकी इस महान् तपस्यासे उनके तेजमें बहुत वृद्धि हो गयी ॥ ८॥ [उनके उस तेजसे] सूर्य मन्द किरणोंवाले हो गये थे और उनका प्रकाश क्षीण प्रतीत होता था। उन दोनों (देवान्तक और नरान्तक)-का शरीर भस्मसे लेपित था, उन्होंने व्याघ्रचर्म, गजचर्म और अक्षमाला धारण कर रखी थी। वे दोनों उषाकालमें पुष्पों और पल्लवोंसे भगवान् शम्भुका पूजन करते थे। हे वत्स! उन दोनोंके अद्भुत तेजके प्रभावसे उस तपोवनमें सिंह और हाथी आदि जन्मजात शत्रुतावाले प्राणी भी वैररहित हो गये थे ॥ ९-१०१/२ ॥ उनके इस प्रकारके तपसे प्रसन्न पाँच मुखों और तीन नेत्रोंवाले भगवान् शंकरने उन्हें [दर्शन दिये]। उनके दस भुजाएँ थीं, वामभागमें अपर्णा (पार्वतीजी) विराजमान थीं, शिरोभागमें गंगाजी [की धारा] शोभायमान थीं और उन्होंने अपने दाहिने हाथमें डमरु ले रखा था॥ ११-१२॥ नागहारसे समायुक्त उनके गलेमें रुण्डमाला सुशोभित हो रही थी। नीलिमासे युक्त कण्ठवाले वे वृषभपर आरूढ़ थे और अपनी प्रभासे आकाशको प्रकाशित कर रहे थे। अनेक प्रकारके अलंकारोंसे युक्त और गौर वर्णके शरीरवाले उन्होंने चन्द्रमाको सिरपर धारण कर रखा था-ऐसे परमात्मा (शिव)-को देखकर वे दोनों अत्यन्त हर्षको प्राप्त हुए ॥ १३-१४॥ [पहले तो] वे दोनों [हर्षातिरेकसे] नृत्य करने लगे, तत्पश्चात् उन्होंने [भगवान् शिवको] साष्टांग प्रणाम किया, तदनन्तर उन दोनोंने उन देवाधिदेवसे कहा- हे देव! हम दोनोंके माता-पिता धन्य हैं, हमारे जन्म, नेत्र, तप, कुल और शरीर धन्य हैं, जो [हम] आप महेश्वरका दर्शन कर रहे हैं॥ १५-१६॥ आप वेदान्तके द्वारा भी अगोचर और अगम्य हैं, आपके वर्णनमें वाणी आदि इन्द्रियाँ भी उपावृत्त हो (लौट) जाती हैं, आगम और छहों शास्त्र भी आपको जाननेमें कुण्ठित अर्थात् असफल हो जाते हैं, आप मनकी सीमासे परे हैं॥ १७॥ आपकी स्तुति करनेमें सहस्र मुखवाले शेषनाग और सनकादि मुनिगण भी सक्षम नहीं हैं। आप सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा, पालनकर्ता और संहारक हैं। आप रंकको राजा और राजाको रंक कर देते हैं, आप सर्पको कंगन और कंगनको सर्प बना देते हैं। आप निर्धनको धनी और धनवान्‌को निर्धन कर देते हैं ॥ १८-१९१/२ ॥ उन दोनोंकी इस प्रकारकी वाणी सुनकर उमापति महादेवजी बोले- 'तुम दोनोंको साधुवाद है। मैंने तुम्हारे अमृततुल्य वचनोंका प्रसन्नतापूर्वक श्रवण किया। मैं तुम दोनोंकी तपस्यासे प्रसन्न होकर पार्वतीसहित वृषारूढ़ हो ध्यानरत तुम दोनोंको वर देने आया हूँ। तुम दोनों मुझसे अपने अभीष्ट वर माँग लो' ॥ २०-२११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] तब अन्धकासुरके शत्रु भगवान् शिवके इन वचनोंको सुनकर उन दोनों- नरान्तक और देवान्तकने हर्षगद्गद वाणीमें कहा कि 'हे देवेश्वर ! हे सर्वेश्वर ! हे जगदीश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं, यदि हमें वरदान देना चाहते हैं और हम दोनोंपर अनुग्रह करना चाहते हैं, तो देवताओं, राजाओं, यक्षों, राक्षसों, पिशाचों, मानवों, सर्पों, गन्धर्वों, अप्सराओं, किन्नरों, सभी अस्त्र-शस्त्रों, वन्य और ग्राम्य पशुओं, ग्रहों-नक्षत्रों, भूतों, दानवों, असुरों, कृमियों और कीड़ों-मकोड़ों आदिसे भी दिन या रात्रिमें आपकी कृपासे हम दोनोंकी मृत्यु कदापि न हो। हे जगदीश ! हमें त्रैलोक्यका राज्य और अपने चरणोंकी