भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 656 में से

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पृष्ठ 277

क्री०ख०-अ०३ ] * देवान्तककी देवलोकपर विजय * २७५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 भक्ति भी प्रदान करें' ॥ २२-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले-तब उन दोनों भक्तोंके तपसे प्रसन्न शूलपाणि वृषध्वज भगवान् शंकर उनके द्वारा माँगे जानेवाले सभी वरदानोंको सुनकर उनसे बोले- ॥ २८ ॥ शिवजी बोले-जो भी अभिलषित वरदान [तुम दोनोंने] माँगे हैं, वे तुम्हें वैसे ही प्राप्त होंगे, उसमें अन्यथा कुछ भी नहीं होगा। तुम्हें किसीसे भय नहीं रहेगा, सब प्रकारसे तुम मृत्युसे रहित रहोगे और तुम्हें त्रैलोक्यका राज्य प्राप्त होगा। सबका अन्त कर देनेवाले यमराज भी तुम दोनोंसे भयभीत रहेंगे। ऐसा कहकर भगवान् शंकरने अभय प्रदान करनेवाला अपना करकमल उन दोनोंके सिरपर रखा ॥ २९-३० ॥ [तदनन्तर] उन दोनोंको अभीष्ट वरदान देकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। वे दोनों भी उनकी पूजा, परिक्रमा और वन्दनाकर उनसे अनुज्ञा ले उनके अन्तर्धान होनेपर अपने घर चले आये। उन दोनोंने प्रसन्नतापूर्वक अपने अत्यन्त प्रसन्न माता-पिताको प्रणाम किया ॥ ३१-३२ ॥ [तत्पश्चात्] उन दोनोंने माता-पिताका आलिंगनकर कर उनसे अपना सारा वृत्तान्त कहा। तब पिताने उन दोनोंका मस्तक सूँघकर प्रसन्नतापूर्वक कहा-'तुम दोनोंको भगवान् शंकरका दर्शन प्राप्त होने और सुन्दर वर प्राप्त होनेसे तुम्हारा जन्म और कुल पवित्र हो गया और तुम दोनोंने महान् यशका अर्जन किया ॥ ३३-३४ ॥ हे पुत्रो ! तुम्हारा वृत्तान्त सुनकर मेरे अंग शीतल (पुलकित) हो गये हैं और मुझे अमृतपानसदृश परम तृप्तिका अनुभव हो रहा है, इसमें सन्देह नहीं है' ॥ ३५ ॥ तदनन्तर माताद्वारा अभ्यंजन (तेल-उबटन, स्नानादि) कराये जानेके बाद उन दोनोंने पिता और वेदशास्त्रके विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ अनेक प्रकारके सुन्दर स्वादवाले अन्नों (व्यंजनों)-का भोजन किया ॥ ३६ ॥ तदनन्तर माताने अनेक प्रकारके अलंकारों और आभूषणोंसे दोनों पुत्रोंको अलंकृत किया तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया। फिर उनसे बहुत-से आशीर्वाद प्राप्त करके उन्हें प्रणामकर विदा किया। तत्पश्चात् उन दोनों [देवान्तक और नरान्तक]-ने [सुखपूर्वक] रात बितायी ॥ ३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'वरप्राप्तिका वर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥ तीसरा अध्याय देवान्तककी देवलोकपर विजय ब्रह्माजी बोले-[हे व्यास !] तदनन्तर देवान्तक एवं नरान्तक प्रातः उठकर गुरुजनोंका ध्यानकर तथा उनका पूजनकर और सम्पूर्ण देवताओंका स्मरणकर तथा उन्हें प्रणाम करके नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशामें गये। मल-मूत्रका त्यागकर और दन्त एवं जिह्वाका शोधनकर उन दोनोंने स्नान करके सन्ध्या-वन्दन एवं इष्टदेवोंका पूजन किया ॥ १-२ ॥ तदनन्तर उन दोनोंने ब्राह्मणोंका भक्तिपूर्वक पूजनकर उन्हें धन और वस्त्र प्रदान किये। फिर कांस्यपात्रस्थित घीमें [अपने मुखका] अवलोकनकर दक्षिणासहित उसे ब्राह्मणको दिया। उसके बाद स्वच्छ दर्पणमें मुख देखकर और वस्त्र धारणकर वे दोनों विचार करने लगे ॥ ३-४॥ ज्येष्ठ भ्राताने कहा-मैं महेश्वरके वरदानसे स्वर्गादिलोकोंकी विजय करूँगा और उन्हींके कृपाप्रसादसे तुम मृत्युलोक और पातालको विजित करो ॥ ५ ॥ ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] उन दोनोंने इस प्रकारका निश्चय किया और एक शुभ दिन देखकर उनमेंसे एक [ज्येष्ठ भ्राता]-ने वायुके समान वेगसे स्वर्गलोकको गमन किया ॥ ६ ॥ अमरावती पहुँचकर उसने उद्यान (नन्दनकानन)-परिसरको तोड़-फोड़ डाला और फेंटा कसकर वह बलशाली [देवान्तक] इन्द्रके सम्मुख जा खड़ा हुआ ॥ ७ ॥ उस समय शीघ्रतापूर्वक दौड़ते हुए देवताओंका महान् कोलाहल होने लगा। [वे कहने लगे-] 'यह कौन है ? यह कौन है ? यह इन्द्रके समीप कैसे आ गया?' ॥ ८॥