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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

क्री०ख०-अ०३ ] * देवान्तककी देवलोकपर विजय * २७५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 भक्ति भी प्रदान करें' ॥ २२-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले-तब उन दोनों भक्तोंके तपसे प्रसन्न शूलपाणि वृषध्वज भगवान् शंकर उनके द्वारा माँगे जानेवाले सभी वरदानोंको सुनकर उनसे बोले- ॥ २८ ॥ शिवजी बोले-जो भी अभिलषित वरदान [तुम दोनोंने] माँगे हैं, वे तुम्हें वैसे ही प्राप्त होंगे, उसमें अन्यथा कुछ भी नहीं होगा। तुम्हें किसीसे भय नहीं रहेगा, सब प्रकारसे तुम मृत्युसे रहित रहोगे और तुम्हें त्रैलोक्यका राज्य प्राप्त होगा। सबका अन्त कर देनेवाले यमराज भी तुम दोनोंसे भयभीत रहेंगे। ऐसा कहकर भगवान् शंकरने अभय प्रदान करनेवाला अपना करकमल उन दोनोंके सिरपर रखा ॥ २९-३० ॥ [तदनन्तर] उन दोनोंको अभीष्ट वरदान देकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। वे दोनों भी उनकी पूजा, परिक्रमा और वन्दनाकर उनसे अनुज्ञा ले उनके अन्तर्धान होनेपर अपने घर चले आये। उन दोनोंने प्रसन्नतापूर्वक अपने अत्यन्त प्रसन्न माता-पिताको प्रणाम किया ॥ ३१-३२ ॥ [तत्पश्चात्] उन दोनोंने माता-पिताका आलिंगनकर कर उनसे अपना सारा वृत्तान्त कहा। तब पिताने उन दोनोंका मस्तक सूँघकर प्रसन्नतापूर्वक कहा-'तुम दोनोंको भगवान् शंकरका दर्शन प्राप्त होने और सुन्दर वर प्राप्त होनेसे तुम्हारा जन्म और कुल पवित्र हो गया और तुम दोनोंने महान् यशका अर्जन किया ॥ ३३-३४ ॥ हे पुत्रो ! तुम्हारा वृत्तान्त सुनकर मेरे अंग शीतल (पुलकित) हो गये हैं और मुझे अमृतपानसदृश परम तृप्तिका अनुभव हो रहा है, इसमें सन्देह नहीं है' ॥ ३५ ॥ तदनन्तर माताद्वारा अभ्यंजन (तेल-उबटन, स्नानादि) कराये जानेके बाद उन दोनोंने पिता और वेदशास्त्रके विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ अनेक प्रकारके सुन्दर स्वादवाले अन्नों (व्यंजनों)-का भोजन किया ॥ ३६ ॥ तदनन्तर माताने अनेक प्रकारके अलंकारों और आभूषणोंसे दोनों पुत्रोंको अलंकृत किया तथा ब्राह्मणोंका पूजन किया। फिर उनसे बहुत-से आशीर्वाद प्राप्त करके उन्हें प्रणामकर विदा किया। तत्पश्चात् उन दोनों [देवान्तक और नरान्तक]-ने [सुखपूर्वक] रात बितायी ॥ ३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'वरप्राप्तिका वर्णन' नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २ ॥ तीसरा अध्याय देवान्तककी देवलोकपर विजय ब्रह्माजी बोले-[हे व्यास !] तदनन्तर देवान्तक एवं नरान्तक प्रातः उठकर गुरुजनोंका ध्यानकर तथा उनका पूजनकर और सम्पूर्ण देवताओंका स्मरणकर तथा उन्हें प्रणाम करके नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशामें गये। मल-मूत्रका त्यागकर और दन्त एवं जिह्वाका शोधनकर उन दोनोंने स्नान करके सन्ध्या-वन्दन एवं इष्टदेवोंका पूजन किया ॥ १-२ ॥ तदनन्तर उन दोनोंने ब्राह्मणोंका भक्तिपूर्वक पूजनकर उन्हें धन और वस्त्र प्रदान किये। फिर कांस्यपात्रस्थित घीमें [अपने मुखका] अवलोकनकर दक्षिणासहित उसे ब्राह्मणको दिया। उसके बाद स्वच्छ दर्पणमें मुख देखकर और वस्त्र धारणकर वे दोनों विचार करने लगे ॥ ३-४॥ ज्येष्ठ भ्राताने कहा-मैं महेश्वरके वरदानसे स्वर्गादिलोकोंकी विजय करूँगा और उन्हींके कृपाप्रसादसे तुम मृत्युलोक और पातालको विजित करो ॥ ५ ॥ ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] उन दोनोंने इस प्रकारका निश्चय किया और एक शुभ दिन देखकर उनमेंसे एक [ज्येष्ठ भ्राता]-ने वायुके समान वेगसे स्वर्गलोकको गमन किया ॥ ६ ॥ अमरावती पहुँचकर उसने उद्यान (नन्दनकानन)-परिसरको तोड़-फोड़ डाला और फेंटा कसकर वह बलशाली [देवान्तक] इन्द्रके सम्मुख जा खड़ा हुआ ॥ ७ ॥ उस समय शीघ्रतापूर्वक दौड़ते हुए देवताओंका महान् कोलाहल होने लगा। [वे कहने लगे-] 'यह कौन है ? यह कौन है ? यह इन्द्रके समीप कैसे आ गया?' ॥ ८॥

२७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ / Left Column] 'इसका वध करो, इसे कठोर बन्धनमें बाँधो, इस मनुष्यको दूर भगाओ'—ऐसा कहते हुए वे (देवता) दौड़ रहे थे। तब उसने सहसा बार-बार उछल-उछल और कूद-कूदकर उन्हें दूर भगा दिया। उसके [बार- बार] उछलने और कूदनेसे स्त्रियोंके गर्भ और बड़े-बड़े वृक्ष गिर गये। [उस समय] पर्वतों, वनों और खानोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी काँपने लगी। उसके शरीरकी कान्तिसे सारे श्रेष्ठ देवता काले पड़ गये॥ ९-११॥ जिस प्रकार रोगोंद्वारा जीता गया व्यक्ति शीघ्र ही विवर्ण (आभारहित) हो जाता है, वैसे ही उसे देखकर सारे देवता विवर्ण हो गये॥ १२॥ हे मुने! उस समय इन्द्र भी विह्वल और विवर्ण हो गये तथा कुछ देवगण तो दशों दिशाओंमें भाग चले और कुछ युद्धके लिये तैयार होने लगे। कुछ अत्यन्त भयभीत और अधीर हुए साधारण देवता उसकी शरणमें चले गये। तब इन्द्र हाथमें वज्र लेकर चार दाँतोंवाले [गजश्रेष्ठ ऐरावत] हाथीपर समारूढ़ हुए॥ १३-१४॥ [तदनन्तर] उन्होंने अत्यन्त भयंकर गर्जन किया, जिससे त्रैलोक्य कम्पायमान हो उठा। उन्होंने युद्धके लिये उद्यत श्रेष्ठ देवताओंको देखकर कहा—'तुम सब क्या देखते हो, जब वह असुर यहाँ आया, तो तुम्हारा पौरुष कहाँ चला गया था?' तब वे (देवगण) संग्रामके लिये उद्यत हो आगे बढ़े॥ १५-१६॥ देवताओंको युद्धके लिये उत्सुक देखकर देवान्तकने इन्द्रसे कहा—'हे शक्र! क्यों [व्यर्थ] श्रम करते हो? मुझे प्राप्त वरदानोंपर विचार करो। सम्पूर्ण प्राणियोंका अन्त कर देनेवाले यमराज भी मेरे भयसे त्रस्त होकर भाग गये। भगवान् शंकरके वरदानसे मैं तुम्हारे वज्रको तिनकेके समान मानता हूँ॥ १७-१८॥ मेरे श्वास छोड़नेमात्रसे तुम्हारे देखते-देखते देवता सब दिशाओंमें पलायन कर जाते हैं, इसलिये हे इन्द्र! मेरी बात सुनो और शान्तिपूर्वक अपने सभी पद (अधिकार) मुझे सौंप दो और तुम स्वयं यहाँ-वहाँ कहीं जाकर रहो, अन्यथा सब कुछ खोकर व्यर्थमें

[दायाँ स्तम्भ / Right Column] मृत्युको प्राप्त करोगे। हे देवराज! क्या तुम नहीं जानते कि मेरा नाम 'देवान्तक' है?'॥ १९-२०१/२॥ उसका इस प्रकारका वचन सुनकर इन्द्रका हृदय विदीर्ण हो गया। [उस समय उन] शतक्रतु इन्द्रके मुखसे प्रबल अग्नि इस प्रकार बाहर निकली, जैसे कि अत्यन्त तप्त तैलमें जलकी बूँदें गिरनेपर छींटे बाहर निकलते हैं॥ २१-२२॥ तदनन्तर क्रोधके आवेशमें इन्द्रने उससे कहा— 'तुम्हारे-जैसे कितने ही दानव मेरे द्वारा मारे गये हैं। रे नीच असुर! तुम जो इस समय वरदानके गर्वसे यहाँ आ गये हो, तो मेरे वज्र-प्रहारसे मारे जाकर तुम निश्चित ही धरतीपर गिरोगे॥ २३-२४॥ रे बलाभिमानी! तेरे इस नामका समास अन्यपद- प्रधान (बहुव्रीहि) है, जिसका आशय है देवतासे अन्तको प्राप्त होनेवाला। [तूने भ्रमवश अपने नामको तत्पुरुष समासान्त अर्थात् देवताओंका अन्त करनेवाला मान लिया है], अगर तुझमें शक्ति है तो उसका प्रदर्शन कर, केवल डींग मत हाँक। तदनन्तर [ऐसा कहकर] इन्द्रने उसका वध करनेके उद्देश्यसे वज्रको मुट्ठीसे कसकर पकड़कर उसपर प्रहार किया तो वज्र [उसके शरीरसे टकराकर] उसी प्रकार सैकड़ों टुकड़े हो गया, जैसे मिट्टीका बना कोई पात्र हाथसे छूटकर चूर-चूर हो जाता है। देवान्तक [उस प्रहारसे] बिना व्याकुल हुए रणक्षेत्रमें खड़ा रहा, उसके शरीरका रोम भी नहीं टूटा॥ २५-२६॥ तदनन्तर उसने उन देवश्रेष्ठ इन्द्रकी पीठपर मुक्केसे प्रहार किया। इससे वे वैसे ही गिर पड़े, जैसे आँधी आनेसे वृक्ष गिर पड़ते हैं॥ २७॥ उसके इस प्रकारके पराक्रमको जानकर बल दैत्यका वध करनेवाले इन्द्र पलायन कर गये। [यह देखकर देवान्तक] उनके पीछे उसी तरह वेगपूर्वक दौड़ा, जैसे मृगसमूहोंके पीछे सिंह दौड़ता है॥ २८॥ अपना भयंकर मुख फैलाकर उसने भागते हुए उन इन्द्रसे कहा—'अब तुम क्यों भागे जा रहे हो, तुम्हारी

क्री०ख०-अ०३ ] * देवान्तककी देवलोकपर विजय * २७७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बड़ी-बड़ी बातें कहाँ चली गयीं ? ॥ २९ ॥ हे इन्द्र ! सम्पूर्ण देवसमूहोंके साथ तुम मेरे सामने आओ; क्योंकि श्रेष्ठ वीर पीठ दिखाकर भागनेवालोंको नहीं मारते' । [ऐसा कहकर] उसने स्वयं उन देवताओंके आगे आकर उन्हें मारा। उसने उनके मुखपर थप्पड़ मारकर उनका प्राणान्तकर उन्हें गिरा दिया ॥ ३०-३१ ॥ उसने किसीको घुमाकर पृथ्वीपर पटक दिया, तो किसीको पाद-प्रहार, किसीको मुष्टि-प्रहार और कुछ अन्य देवताओंको कुहनीके प्रहारसे मार डाला ॥ ३२ ॥ उसने कुछ अन्य देवताओंका गला पकड़कर उन्हें तबतक घसीटा, जबतक कि उनका प्राणान्त नहीं हो गया। उसने कुछ देवताओंके घुटने तोड़ डाले तो कुछकी भुजाएँ। कुछ देवताओंकी जँघाएँ तोड़कर उसने उन्हें दूर फेंक दिया। कुछ देवता ऊपरकी ओर मुख करके कुछ नीचेकी ओर मुख किये गिरे पड़े थे और [भूतलपर अपना] मुख पटक रहे थे। कुछ चलनेमें असमर्थ हो गये थे ॥ ३३-३४ ॥ कुछ देवता दुखित होकर मन-ही-मन विचार कर रहे थे कि जगदीश्वरने क्या अकस्मात् प्रलय प्रारम्भ कर दिया। वे सभी देवता वैसे ही छिन्न-भिन्न [अंगोंवाले] हो गये थे, जैसे सिंहसे पीड़ित होकर हाथी हो जाते हैं। तदनन्तर उस जयशील देवान्तकने उसी प्रकार स्वयं गर्जन किया, जैसे मेघोंके गर्जन करनेपर मयूरमण्डली गर्जन करने लगती है। उस समय सूर्य भी अपनी भास्करी नामक पुरीको छोड़कर दूर चले गये ॥ ३५-३७ ॥ [उस समय] सभी देवता अपने-अपने पदों (अधिकारों)-को छोड़कर पलायन कर गये। तब वह निर्भय मनसे स्वयं इन्द्रपदपर आसीन हो गया ॥ ३८ ॥ सभी देवता [उस समय उससे भयभीत होकर] हिमालयकी श्रेष्ठ गुफाओंमें चले गये और कन्द-मूल- फलका आहार करते हुए [बड़े ही] कष्टसे दिन बिताने लगे ॥ ३९ ॥ तदनन्तर पृथ्वीसे तथा सभी दिशाओंसे अगणित दैत्य-दानवोंने अनेक प्रकारके द्रव्यों, अनेक तीर्थोंसे लाये हुए जल तथा अनेक ऋषियोंद्वारा उच्चारित मन्त्र-समूहों और शंख-भेरी-मृदंग एवं दुन्दुभियोंकी ध्वनिके साथ उस देवान्तकका अभिषेक किया ॥ ४०-४१ ॥ तत्पश्चात् दैत्योंने अपने उस स्वामीसे कहा- 'दैत्यकुलमें आपके सदृश न तो कोई हुआ है, न होगा। आप हम सबको आज्ञा करें' ॥ ४२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] इस प्रकार उसने इन्द्र एवं उनके अग्रगामी (प्रधान) देवताओंको अकेले ही जीत लिया और देवताओंपर राज्य किया तथा अमरावतीकी रक्षा की ॥ ४३ ॥ तदनन्तर वह करोड़ों दैत्योंसे घिरा हुआ सत्यलोक (ब्रह्मलोक)-को गया। तब ब्रह्माजी भी [उससे भयभीत होकर] वहीं चले गये, जहाँ देवता पहलेसे गये थे, उस समय वह कभी तो ब्रह्माजीके [हंसयुक्त] विमानपर आरोहण करता था और कभी इन्द्रके वाहन ऐरावतपर। तदनन्तर एक नायकको वहाँ (ब्रह्मलोकमें) स्थापितकर (शासन-सूत्र सौंपकर) वह (देवान्तक) वैकुण्ठलोकको गया, परंतु उसके पहुँचनेके पूर्व ही भगवान् श्रीहरि लक्ष्मीजीके साथ क्षीरसागरको चले गये। तब उसने अपने एक परम विश्वासपात्र दैत्यको वहाँ नियुक्तकर [अन्य दैत्योंसे] विचार-विमर्श करते हुए कहा - ॥ ४४-४६ ॥ हे दैत्यो! बताओ, मैंने किसे नहीं जीता है ? मैं कहाँ जाऊँ। तब उन दैत्योंने कहा कि 'देवताओंका कोई भी स्थान अब शेष नहीं है ॥ ४७ ॥ अब आप विभिन्न लोकपालोंके पदोंपर दैत्यजनोंको नियुक्तकर निर्भय होकर और अन्य कार्य छोड़कर केवल अमरावतीका संरक्षण करें'। मन्त्रियोंद्वारा दिये गये इस उचित परामर्शको सुनकर देवान्तकने परम प्रसन्नतापूर्वक उनके कथनानुसार कार्य किया ॥ ४८-४९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'स्वर्गविजय-वर्णन' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

चौथा अध्याय

२७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चौथा अध्याय नरान्तककी भूलोक और नागलोकपर विजय

व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे प्रकारकी मायाओंका ज्ञान रखनेवाले अत्यन्त बलवान् देवान्तकके चरितका भक्तिपूर्वक श्रवण किया, अब आप दैत्योंको वहाँ भेजा। वे वहाँ गरुड़का रूप धारण करके मुझे यह बतायें कि नरान्तकने क्या किया ? ॥ १ ॥ गये और उन श्रेष्ठ नागोंका भक्षण करने लगे ॥ १०-११ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! हे सत्यवतीपुत्र ! तुम्हारे उन दानवोंके द्वारा असंख्य नागोंका भक्षण कर [गणेशजीसे सम्बन्धित कथाओंके प्रति] परम आदरभावको लिये जानेके उपरान्त मोतियों, रत्नों, अनेक प्रकारके देखकर अब मैं तुमसे उसे कहूँगा, संयतचित्त होकर उसे सुन्दर दिव्य वस्त्र और दस हजार नागकन्याओंको साथ श्रवण करो। अनेक दैत्यसमूहोंसे घिरे हुए नरान्तकने लिये शेषनाग उनके सम्मुख गये। उन्होंने वह सब पृथ्वीपर जाकर विध्वंसका ताण्डव मचा दिया, उसने [उपहारके रूपमें] उन्हें देकर उन असुरोंसे सन्धि कर कुछ राजाओंको मार डाला ॥ २-३ ॥ ली ॥ १२-१३ ॥ बहुत-से राजाओंको मारा गया देखकर [शेष] उन अनन्त सिरवाले शेषनागने नरन्तकके आदेशानुसार सभी राजा उसकी शरणमें चले आये। जिस प्रकार उसका शासन स्वीकार कर लिया और वार्षिक कर देना ज्ञानसे अज्ञान और सूर्योदयसे अन्धकार पलायमान हो भी स्वीकार कर लिया ॥ १४ ॥ जाता है, उसी प्रकार वह जिस-जिस [शत्रु] सेनाकी तब भी उस दैत्य (नरान्तक) -ने अनेक दैत्योंसहित ओर देखता था, वह दसों दिशाओंमें भाग खड़ी होती एक श्रेष्ठ दैत्यको रसातलमें सर्वाध्यक्षके रूपमें नियुक्त थी। इस प्रकार नरान्तकने सम्पूर्ण भूमण्डलको अपने करवाया और साथ ही वहाँ नियुक्त उस दैत्यको वशमें कर लिया ॥ ४-५ ॥ नरान्तकने अपने इस आदेशकी सूचना भिजवायी कि जो राजा उसकी शरणमें आ गये थे, उनको 'यदि तुम नागोंमें कोई विकृति (विद्रोहकी भावना) अधीनता स्वीकार कर लेनेके कारण उसने उन्हें उनके देखो, तो दूतके मुखसे हमें सूचित करो। हम सम्पूर्ण पदोंपर पुनः स्थापित कर दिया और जो मार डाले गये नागोंका वध कर डालेंगे' ॥ १५-१६१/२ ॥ थे, उनके पुत्रोंको करदाता [राजा]-के रूपमें नियुक्त कर उसे इस प्रकारकी शिक्षा देकर उन सभी दैत्योंने दिया। जो राजा उससे युद्ध करनेको उद्यत हुए थे, उनको मृत्युलोकमें स्थित नरान्तकके पास जाकर सारा वृत्तान्त भी उसने अपना सेवक बना लिया और अपने मनोनुकूल उससे कहा। मृत्युलोक और पाताललोकमें उत्पन्न दैत्योंको उनके पदोंपर स्थापित कर दिया ॥ ६-७ ॥ होनेवाली वे सभी वस्तुएँ जो स्वर्गलोकमें दुर्लभ थीं, उन्हें उसने समुद्ररूपी वलयसे घिरी हुई [सम्पूर्ण] तथा [दोनों लोकोंके] सम्पूर्ण वृत्तान्त नरान्तक देवान्तकके पृथ्वीका पालन किया। [उस समय] उसके आतंकस्पी लिये सदा भेजा करता था ॥ १७-१९ ॥ भारसे देवता, मनुष्य और किन्नर अत्यन्त पीड़ित हो उसी प्रकार देवान्तक भी उसके लिये वह सब कुछ गये। यज्ञ और स्वाध्यायकर्मसे रहित मुनिजन [उस भेजा करता था, जो भूतलपर दुर्लभ है। इस प्रकार वे समय] पर्वतोंकी गुफाओंमें चले गये। 'वेदका त्याग दोनों परम प्रसन्नतापूर्वक त्रैलोक्यका राज्य करते थे ॥ २० ॥ करना दोषयुक्त है'- ऐसा विचारकर वे मनमें ही वेदका [ राजा ] सोमकान्त बोले- [ हे मुने !] उन अभ्यास करते थे। आतंकित मनवाले होनेके कारण दोनोंका वध किस रूपसे, किस अस्त्र-शस्त्रसे, किस तपस्या भी नहीं कर पा रहे थे ॥ ८-९१/२ ॥ अवतारद्वारा और कैसे हुआ ? वह सब मुझे बतलाइये ॥ २१ ॥ तब नरान्तकने नागलोकको जीतनेकी इच्छासे अनेक भृगुजी बोले- [हे राजन् ! व्यासजीद्वारा] इसी

क्री०ख०-अ०५] * अदितिके तपसे प्रसन्न गणेशजीकी उनके पुत्ररूपमें अवतरित होनेकी स्वीकृति * २७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रकारका प्रश्न किये जानेपर चतुर्मुख ब्रह्माजीने व्यासजीके | जिस अस्त्र-शस्त्रसे मारा था तथा ब्रह्मा [आदि प्रति परम प्रसन्नतापूर्वक जो कथा कही थी, उसे ही मैं | देवताओं]-ने अपने-अपने लोकोंको जिस प्रकार [पुनः] तुमसे कहता हूँ॥ २२॥ | प्राप्त किया था और देवताओंको भी अपने अधिकारोंकी ब्रह्माजी बोले- हे मुने! दुर्जय और वरगर्वित | प्राप्ति हुई, वह सब कहता हूँ। हे मुने! आदरपूर्वक उन दोनोंको जिसने अवतार लेकर, जिस रूपसे और | सुनो॥ २३-२४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'व्यासप्रश्न' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥ पाँचवाँ अध्याय अदितिकी तपस्यासे प्रसन्न गणेशजीका उनके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण करनेकी स्वीकृति देना ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] कश्यप [ऋषि] | [प्रश्न] हो, उसे तुम सम्यक् रूपसे पूछो, मैं उसे मेरे ही मानस पुत्र हैं, जो अत्यन्त बुद्धिमान्, पुण्यशाली, | बतलाऊँगा ॥ ९॥ धर्मशील, तपस्वी, जितेन्द्रिय, अत्यन्त दयावान्, संसारमें | अदिति बोली- इन्द्रादि देवगणोंको तो मैंने पुत्ररूपमें सभीके दुःखों और शोकका शमन करनेवाले, ध्यानमें | प्राप्त किया है, किंतु जो परमात्मा चिदानन्द परात्पर स्थित होकर भूत-भविष्य और वर्तमानको जान लेनेवाले, | ईश्वर हैं, वे जब मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त हों, तो मेरा मन मानसिक संकल्पसे सृष्टि और संहार कर सकनेवाले, | शान्त हो; मेरे मनमें उनकी सेवा करनेकी इच्छा है। आप वेदान्तके पारगामी विद्वान्, सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्त्विक | उस उपायको बतलायें, जिससे वे [परम प्रभु] मेरे पुत्र अर्थका ज्ञान रखनेवाले तथा मिट्टीके ढेले और सुवर्णमें | हों और मेरा मन कृतकृत्य हो ॥ १०-१११/२॥ तुल्यबुद्धि रखनेवाले हैं॥ १-३॥ | मुनि बोले- हे महाभाग्यशालिनि! तुमने बहुत अदिति उनकी ज्येष्ठ पत्नी थी, जो उन्हें अत्यन्त | उचित प्रश्न किया है, तुम्हारी बात मुझे अत्यन्त सन्तुष्टि प्रिय थी। वह सम्पूर्ण [शुभ] लक्षणोंसे सम्पन्न थी, तीनों | देनेवाली है॥ १२॥ लोकोंमें उसका सौन्दर्य अनुपमेय था। वह अपने | जैसे प्यासे व्यक्तिको जल और भूखेको भोजन पातिव्रतके तेजसे तीनों लोकोंको भस्म कर सकनेमें सक्षम | सन्तुष्टिकारक होता है, वैसे ही हे देवि! तुम्हारी [यह] थी। शेषनाग भी अपने सहस्र मुखोंसे जिसके गुणोंका | बात मुझे अत्यन्त सन्तुष्टि देनेवाली है॥ १३॥ वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। [श्रेष्ठ] गुणोंकी प्राप्तिके | किंतु हे देवि! बिना पुण्यके परमात्मा कैसे अपने लिये अष्ट नायिकाएँ भी जिसकी सेवा करती थीं। | पुत्र बनेंगे, अतः मैं तुमको उपाय बताता हूँ, उसे हृदयमें इन्द्रादि देवगणोंको जिस पापरहिताने जन्म दिया था, वह | स्थिर करो॥ १४॥ मूलप्रकृतिरूपा [देवी] वहाँ उस रूपमें (मुनिपत्नीके | हे प्रिये! जो इन्द्रियातीत [परमात्मा] श्रुतियों और रूपमें) निवास करती थी। उसने किसी समय अपने | ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी अगोचर, निर्गुण, निरहंकार, प्रसन्न मनवाले पतिसे प्रसन्नतापूर्वक कहा- ॥ ४-७॥ | निष्काम और अद्वितीय है, जो मायाका विषय नहीं है, हे स्वामिन्! मैं कुछ पूछना चाहती हूँ, कृपा करके | मायाको नचानेवाला है, मायावियोंको भी मोहित करनेवाला उसे बतलायें; क्योंकि हे प्रभो! किसी सदाचारिणी | है, मायासे परे होते हुए भी मायाका आधार है, स्त्रीकी पतिके अतिरिक्त कोई अन्य गति नहीं होती ॥ ८॥ | कारणातीत है, मायाका विस्तार करनेवाला है, जगत्प्रपंचके कश्यपजी बोले- हे कल्याणकारिणि! हे निष्पाप | कारणका भी कारण है- वह अनुष्ठानके बिना साकार प्रिये! तुमने उचित ही कहा है; तुम्हारे मनमें जो भी | स्वरूपमें कैसे आ सकता है? ॥ १५-१७॥

२८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अदिति बोली—हे महामुने! मुझे इस समय किसका ध्यान करना चाहिये, कौन-सा अनुष्ठान करना चाहिये और किस मन्त्रसे करना चाहिये? वह मुझे बताइये ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यास !] अदितिके इस प्रकार पूछनेपर कश्यपमुनिने उसे [गणेशजीके] पंचाक्षर नाममन्त्रका उपदेश दिया, जो प्रारम्भमें 'ॐ'काररूप पल्लवसे युक्त, चतुर्थी विभक्तिसे समन्वित और अन्तमें 'नमः' पदवाला था। उन्होंने ध्यानसहित एवं न्यास और देवतासे युक्त पुरश्चरणकी सम्पूर्ण विधिको उसे बतलाया ॥ १९-२० ॥ हे ब्रह्मन् ! तब उसने परम प्रसन्नतापूर्वक अपने पति कश्यपजीको प्रणाम किया और आदरपूर्वक उनका पूजन किया। तदनन्तर उनसे आज्ञा लेकर वृक्षों और लताओंसे संयुक्त तथा वायु एवं अन्य उपद्रवोंसे रहित स्थानवाले वनमें तपस्याके लिये चली गयी ॥ २१-२२॥ वहाँ वह अदिति स्नान करके पवित्र वस्त्र धारणकर सुन्दर आसनपर बैठ गयी और चित्तवृत्तियोंका निरोधकर संयत मनसे देवाधिदेव गणेशजीका ध्यान करती हुई, यथाविधि न्यास करके गणेशजीका स्मरण करती हुई उनके परम मन्त्रका जप करने लगी ॥ २३-२४ ॥ अपनी मानसिक वृत्तियोंको गणेशजीके अतिरिक्त अन्य किसीमें न ले जानेवाली वह उनके दर्शनकी अभिलाषासे निराहार रहते हुए तथा वायुमात्रका भक्षण करते हुए उनके ध्यान और मन्त्रजपमें संलग्न रहती थी। उसके तपके प्रभावसे सभी प्राणी वैररहित हो गये थे। [उसके तपसे] पराभूत सभी देवता यही चिन्ता करते थे कि ये न जाने क्या प्राप्त करेंगी! ॥ २५-२६ ॥ अदितिने इस प्रकार सौ वर्षोंतक महान् तपस्या की। उसके अनेक प्रकारके कष्टों तथा स्त्री होते हुए भी उस प्रकारके धैर्यको देखकर करोड़ों सूर्योंके समान प्रभाववाले तेजःपुंज गणाधिपति भगवान् विनायक उसके सम्मुख प्रकट हो गये ॥ २७-२८ ॥ वे हाथीके सदृश मुखवाले, दस भुजाओंसे युक्त और कुण्डलोंसे सुशोभित थे। कामदेवसे भी अधिक सुन्दर शरीरवाले वे सिद्धि और बुद्धिसे समायुक्त थे। वे [कण्ठमें] वर्षाजलसे उत्पन्न मोतियोंकी माला, [हाथमें] परशु, [कमरमें] सोनेकी करधनी धारण किये हुए थे और उनके [ललाटपर] कस्तूरीका तिलक लगा हुआ था। उन्होंने नाभिदेशपर सर्प धारण कर रखा था और उन [मंगलमय प्रभु]-के [श्रीविग्रहपर] दिव्य वस्त्र सुशोभित थे ॥ २९-३० १/२॥ उस महान् तेजोरशिको अपने सम्मुख देखकर अदिति भयभीत हो काँपने लगीं, उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिये और वे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ३११/२॥ जप और ध्यान भूलकर वे अपने मनमें यह चिन्ता करने लगीं कि मेरे सम्मुख यह कौन आ गया? यह क्या अद्भुत घटना घटी है ! मैं अपना जप और ध्यान भी भूल गयी हूँ! कहीं ये वही परमेश्वर तो नहीं हैं, [जिनका मैं ध्यान करती हूँ] अपने महान् तेजसे दिशाओंको आलोकित करते हुए मुझे वर देनेके लिये आये हैं—इस प्रकार जब वे व्याकुल थीं, तभी भगवान् गणेश उनसे बोले— ॥ ३२-३४॥ विनायक बोले- हे देवि ! तुम दिन-रात मनमें जिसका ध्यान करती हो, मैं वही हूँ। तुम्हारी निष्ठा और दुष्कर तपस्या देखकर तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। हे सुव्रते ! तुम्हारे इस तपसे मैं सन्तुष्ट हूँ, तुम्हारे हृदयमें जिन-जिन वरोंकी कामना हो, वे मुझसे माँग लो, मैं उन्हें दूँगा ॥ ३५-३६ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [ हे व्यास !] तब उन गणेशजीके वचन सुनकर अदिति स्वस्थ हुई। विनम्र भाववाली उसने दोनों हाथ जोड़कर विनायकको प्रणाम किया और जो मनसे अतर्क्य हैं, ऐसे उन देवाधिदेव गणेशजीसे वह कहने लगी - ॥ ३७१/२॥ अदिति बोली- हे अखिलेश्वर! आप ही इस विश्वकी संरचना करते हैं, इसका पालन करते हैं और इसका संहार करनेवाले भी आप ही हैं। आप नित्य हैं, निरंजन हैं, भगवान् हैं, निर्गुण हैं, अहंकारसे रहित हैं, विविध रूप धारण करनेवाले हैं, शाश्वत हैं, योगद्वारा जाननेयोग्य हैं, तथा अखिल मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाले हैं ॥ ३८-३९ ॥

क्री०ख०-अ०६ ] * दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीके पास जाना * २८१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हे विनायक! इस समय आप सौम्य स्वरूप करनेके लिये वनमें गयी और मैंने वहाँ महान् तप किया। धारणकर वर प्रदान करें। हे देवेश्वर! यदि आप तदनन्तर वे भगवान् गजानन महान् प्रकाशपुंजके रूपमें मुझपर प्रसन्न हैं और यदि आप वर देना चाहते हैं, मुझे वर प्रदान करनेके लिये आये। उनका वह स्वरूप तो हे भगवन्! आप मेरी पुत्रताको प्राप्त करें, इसीसे देखकर मैं भयभीत हो गयी, तब मैंने उन विनायकदेवकी मैं कृतकृत्य होऊँगी। तभी मैं आपकी सेवा कर प्रार्थना की॥ ४४-४५॥ पाऊँगी, तभी सज्जनोंकी रक्षा होगी और तभी दुष्टजन हे मुनिश्रेष्ठ! उन्होंने मुझे विविध प्रकारके वर विनाशको प्राप्त करेंगे। साथ ही लोगोंकी कृतकृत्यता प्रदान किये। तदनन्तर वे गजानन 'तुम्हारे पुत्रके रूपमें भी होगी॥ ४०-४१ १/२॥ जन्म ग्रहण करूँगा'-ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये। विनायक बोले-मैं तुम्हारे पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण हे मुने! तब मैं आपके प्रभावसे सफल मनोरथवाली करूँगा, साधुजनोंकी रक्षा करूँगा, दुष्टोंका संहार करूँगा होकर अपने आश्रममें आ गयी॥ ४६ १/२॥ और तुम्हारी भी सम्पूर्ण मनोकामनाओंको पूर्ण ब्रह्माजी बोले-हे मुनीश्वर! इस प्रकार उसके करूँगा॥ ४२ १/२॥ द्वारा कथित वरदान-सम्बन्धी अमृतमय वचनोंको सुनकर ब्रह्माजी बोले-ऐसा कहकर देवाधिदेव वे विनायक वे मुनिश्रेष्ठ कश्यपजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और अत्यन्त अन्तर्धान हो गये और वह अदिति महर्षि कश्यपके पास प्रीतिके साथ उन्होंने देवी अदितिके साथ रमण किया। गयी और सारा वृत्तान्त उन्हें बताया॥ ४३ १/२॥ उस समय वे दोनों वैसे ही आनन्दित हुए जैसे कि अदिति बोली-आपकी आज्ञासे मैं तपस्या अमृतपानसे आनन्दकी प्राप्ति होती है॥ ४७-४८॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'आश्रमाभिगम' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥ छठा अध्याय दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीके पास जाकर अपनी व्यथा बताना, ब्रह्मादि देवताओंद्वारा परमात्मा गणेशसे अवतार धारण करनेकी प्रार्थना करना, देवी अदिति और कश्यपके पुत्ररूपमें गणेशजीका अवतरण, कश्यपद्वारा उनके जातकर्मादि संस्कार करना और 'महोत्कट' यह नाम रखना भृगु बोले-दुष्टोंके अत्याचारसे अत्यन्त पीड़ित वैसा आप करें। अन्यथा पर्वतों तथा वनोंसे समन्वित मैं वह पृथ्वी वेश बदलकर कमलके आसनपर विराजमान पृथ्वी रसातलको चली जाऊँगी॥ ४॥ रहनेवाले ब्रह्माजीके पास गयी और दोनों हाथ जोड़कर भृगु बोले-पृथ्वीका यह कथन सुनकर ब्रह्माजी दयनीय अवस्थावाली वह पृथ्वी पद्मोद्भव ब्रह्माजीसे उससे बोले-'मैं, सभी लोकपाल, इन्द्र आदि देवता तथा बोली॥ १ १/२॥ ऋषिगण भी स्वधाकार-स्वाहाकारसे रहित होकर अत्यन्त भूमि बोली-मैं अत्यन्त दीन और यज्ञ, व्रत दुखी हैं। हम सभी उसी प्रकार अपने स्थानसे भ्रष्ट, आदिसे रहित हो गयी हूँ। हे ब्रह्मन्! ऋषिगणोंके साथ मन्त्रोंसे रहित तथा अपने आचार-विचारसे रहित हो गये इन्द्र आदि सभी देवता अपने-अपने स्थानसे च्युत हो गये हैं, जैसे कि प्रलयके समय हो जाते हैं॥ ५-६॥ हैं। दैत्योंके भारसे अत्यन्त संतप्त मैं आप ब्रह्माजीकी इसलिये हम सभी मिलकर देवाधिदेव भगवान् शरणमें आयी हूँ॥ २-३॥ गणेशकी प्रार्थना करें। वे ब्रह्मरूप हैं, निराकार हैं तथा जिस किसी उपायसे उन दुष्ट दैत्योंका विनाश हो, जगत्के कारणका भी कारण हैं। सौभाग्यसे यदि वे

२८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

लोगोंके समक्ष साकाररूप धारणकर प्रकट होंगे तो हे वसुन्धरे! तभी सब लोगोंका और तुम्हारा भी कल्याण होगा' ॥ ७-८ ॥ भृगु बोले-ऐसा कहकर ब्रह्मा आदि देवताओं और ऋषिगणोंने बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर निराकार तथा साकाररूप उन भगवान् गणेशका स्तवन किया ॥ ९ ॥ देवता तथा ऋषि बोले-सम्पूर्ण लोकोंके स्वामिन् हे गणपति! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सम्पूर्ण लोकोंके धाम! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, समस्त लोकोंकी सृष्टि करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ १० ॥ देवताओंके शत्रुओंका विनाश करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। भक्तोंके बन्धनको काटनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। अपने भक्तोंका पालन-पोषण करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। स्वल्प भक्तिसे भी सन्तुष्ट हो जानेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ११ ॥ हे भगवन्! आप निराकार हैं, नित्य मायासे रहित हैं, परात्पर ब्रह्ममय स्वरूपवाले हैं, क्षर तथा अक्षरसे अतीत हैं, गुणोंसे रहित हैं और दीनोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ १२ ॥ सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले आप निरामयको नमस्कार है। सम्पूर्ण दैत्योंका विदारण करनेवाले निरंजनको नमस्कार है। हे परोपकार करनेवाले! आप नित्य, सत्य स्वरूपको नमस्कार है। सर्वत्र समान भाव रखनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है* ॥ १३ ॥ अत्यन्त दुःखसे दुखित तथा व्याकुल वे सभी मुनिगण तथा देवता इस प्रकार स्तुति करके उन देवाधिदेव भगवान् विनायकसे पुनः बोले- ॥ १४ ॥ [हे भगवन्!] सम्पूर्ण जगत्में हाहाकार हो रहा है। सभी स्वधाकार तथा स्वाहाकारसे रहित हो गये हैं। हम लोग मेरुपर्वतकी गुफामें उसी प्रकार रह रहे हैं, जैसे वन्य पशु वहाँ रहते हैं ॥ १५ ॥ अतः हे विश्वम्भर! इस समय आप उस महादैत्यका विनाश करें। इस प्रकारसे जब वे स्तुति कर रहे थे, उसी समय आकाशवाणीने कहा- ॥ १६ ॥ 'इस समय महर्षि कश्यपजीके घरमें भगवान् गणेशजी अवतार ग्रहण करेंगे। वे अद्भुत कर्म करेंगे और आप लोगोंको अपना-अपना पद प्रदान करेंगे। वे दुष्टोंका विनाश तथा सज्जनोंकी रक्षा करेंगे' ॥ १७१/२ ॥ भृगु बोले-उस आकाशवाणीको सुनकर ब्रह्माजी पृथ्वीसे बोले ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी बोले-हे देवि! हे धरे! तुम आकाशवाणीपर विश्वास करके स्वस्थ हो जाओ। तुम्हारे लिये सभी देवता मृत्युलोकमें अवतार ग्रहण करेंगे। वे गणेशजी अवतार धारणकर तुम्हारे महान् भारको दूर करेंगे ॥ १९१/२ ॥ भृगु बोले-उन ब्रह्माजीद्वारा इस प्रकार कही गयी वह पृथ्वी अत्यन्त स्वस्थ तथा प्रसन्न मनवाली हो गयी और अपने स्थानको चली गयी ॥ २०१/२ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर देवी अदितिने गर्भ धारण किया। उसका वह गर्भ उसी प्रकार वृद्धिको प्राप्त होने लगा, जैसे चन्द्रमा प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होता है। नौ मास पूर्ण हो जानेपर उसने श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दिया ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजीके पूर्वकथनानुसार वह बालक कश्यपनन्दन नामसे प्रसिद्ध हुआ। [जन्मके समय] वह दस भुजाओंवाला था, महान् बलसे सम्पन्न था, उसके कानोंमें कुण्डल सुशोभित हो रहे थे, ललाटपर कस्तूरीका


  • देवर्षय ऊचुः नमो नमस्तेऽखिललोकनाथ नमो नमस्तेऽखिललोकधामन्। नमो नमस्तेऽखिललोककारिन् नमो नमस्तेऽखिललोकहारिन्॥ नमो नमस्ते सुरशत्रुनाश नमो नमस्ते हतभक्तपाश। नमो नमस्ते निजभक्तपोष नमो नमस्ते लघुभक्तितोष॥ निराकृते नित्यनिरस्तमाय परात्परब्रह्ममयस्वरूप। क्षराक्षरातीत गुणैर्विहीन दीनानुकम्पिन् भगवन्नमस्ते॥ निरामयायाखिलकामपूर निरञ्जनायाखिलदैत्यदारिन्। नित्याय सत्याय परोपकारिन् समाय सर्वत्र नमो नमस्ते॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ६।१०-१३)

Here is the complete and accurate transcription of the Devanagari text from the image, line by line with line markers.

क्री०ख०-अ०६ ] * दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीके पास जाना * २८३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिलक लगा हुआ था। मस्तक मुकुटसे शोभायमान था, वह सिद्धि तथा बुद्धि नामक पत्नियोंसे समन्वित था, कण्ठमें धारण की हुई रत्नमालासे मण्डित हो रहा था, चिन्तामणिसे वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा था, उसके अधर जपापुष्पके समान अरुणवर्णके थे, नासिका उन्नत थी, वह सुन्दर भृकुटी तथा ललाटवाला था, दीप्तिमान् दाँतोंसे प्रकाशमान था, उसने अपने देहकी आभासे समस्त अन्धकारको दूर कर दिया था, दिव्य वस्त्रोंको धारण किये था और उसका स्वरूप अत्यन्त मंगलमय था। इस प्रकारके बालकको देखकर दोनों माता-पिता— अदिति और कश्यप उस समय उसके तेजसे अभिभूत दृष्टिवाले हो गये और कुछ भी देखनेमें समर्थ न हो सके। तब उन्होंने बलपूर्वक आँखोंको खोलकर उस उत्तम रूपको देखा। उस समय वे दोनों अत्यन्त आनन्दित हुए। तदनन्तर वह बालरूप गणपति उनसे इस प्रकार बोला— ॥ २३–२७१/२॥ बालक बोला—हे मातः ! चूँकि आपने पूर्वकालमें एक हजार वर्षतक तपस्या करते हुए जिस स्वरूपमें मेरा ध्यान किया और मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वरदान माँगा था, तब उस समय मैंने आपको विविध वर प्रदान किये थे, और अब इस समय मैंने ही आपके पुत्ररूपमें जन्म लिया है। वही अब मैं पृथ्वीके भारका हरण करूँगा, आप दोनोंकी सेवा करूँगा, ब्रह्मा आदि देवताओंको पुनः उनके पदपर प्रतिष्ठित कराऊँगा और दुष्ट दैत्योंका वध करूँगा ॥ २८–३०॥ भृगु बोले—इस प्रकारके उसके वचनोंको सुनकर उन दोनोंके नेत्र आनन्दाश्रुओंसे भर गये। जिस प्रकार चकवा-चकवी आकाशमें सूर्यको देखकर आनन्दित हो उठते हैं, वैसे ही वे दोनों अति प्रसन्न हो गये ॥ ३१ ॥ तब वे दोनों बोल उठे—‘निश्चित ही हम दोनोंके अद्भुत पुण्यका उदय हुआ है, जिसके फलस्वरूप आप परमात्मा विनायक हमारे पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ ३२ ॥ हमारा कुल धन्य हो गया, हमारे माता-पिता धन्य हो गये, हमारा जन्म लेना सफल हो गया और हमारा ज्ञान धन्य हो गया, जो कि सम्पूर्ण चराचरके गुरु, सबके साक्षी, निराकार, नित्य आनन्दमय तथा सत्यस्वरूप भगवान् गणेश हमारे मंगलमय पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ ३३१/२ ॥ जिसमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सूत्रमें पिरोये गये मणिगणोंकी भाँति व्याप्त है, जो सर्वत्र व्याप्त तथा सब कुछ जाननेवाला है, वही आप हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है। आपका यह रूप अत्यन्त दिव्य है, इस समय इसको ऐन्द्रजालिककी भाँति आप छिपा लें और सामान्य प्राकृत स्वरूप धारण करें। आगे जिस रूपके द्वारा आपको जैसा कर्म करना होगा, वैसा रूप आप धारण करें' ॥ ३४–३६ ॥ ऐसा वचन सुनकर गणेशजीने अपना वह दिव्य रूप छिपा लिया और दो हाथोंवाले होकर वे सामान्य बालककी भाँति भूमिपर लोटकर रुदन करने लगे ॥ ३७ ॥ उनके रुदनकी ध्वनिसे उस समय रसातल, आकाश, दिशाएँ, विदिशाएँ निनादित हो उठीं। उस रुदनके शब्दको सुनकर वन्ध्या स्त्रियाँ गर्भवती हो गयीं, शुष्क वृक्ष हरे-भरे हो गये, देवताओंके साथ इन्द्र अत्यन्त हर्षित हो उठे और दैत्योंको अत्यन्त भय हो गया, उस समय धरतीकी वृद्धि होने लगी। उस समय महर्षि कश्यपजीने ब्राह्मणोंके साथ बालकका जातकर्म-संस्कार सम्पन्न किया। उस बालकको मधु तथा घृतका प्राशन कराके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसका स्पर्श किया ॥ ३८–४० ॥ मन्त्रोच्चारपूर्वक महर्षि कश्यपने बालकको माता अदितिके स्तनोंका पान कराया। बालकका नालच्छेदन करके उसे नहलाकर अदितिने बालकको सुला दिया ॥ ४१ ॥ उस समय कश्यपमुनिने ब्राह्मणोंको विविध प्रकारके दान दिये। देवी अदितिने बड़ी प्रसन्नताके साथ सातवें दिन प्रत्येक घरमें इक्षुसार (गुड़ आदि) और पाँचवें दिन भेंट भिजवायी। ग्यारहवें दिन पिता कश्यपने ‘महोत्कट' यह नाम उस बालकका रखा। वह बालक प्रतिदिन उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होता है। चूँकि वह सभीसे अत्यन्त उत्कट (पराक्रमशाली) था, इसीलिये वह बालक गणेश महोत्कट— इस नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ ॥ ४२–४४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'विनायकका आविर्भाव' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥

सातवाँ अध्याय

२८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सातवाँ अध्याय वसिष्ठ आदि ऋषियोंका बालक महोत्कटका दर्शन करनेके लिये कश्यपजीके आश्रममें आना, विरजा राक्षसीद्वारा बालक महोत्कटका अपहरण, बालकका विरजा राक्षसीका उद्धारकर अपने धाम भेजना, कश्यपद्वारा अदितिको बालककी रक्षा करते रहनेका आदेश देना

[Left Column] ब्रह्माजी बोले-महोत्कट नामक पुत्रके जन्मका समाचार सुनकर वसिष्ठ, वामदेव आदि मुनिगण उसके दर्शनके लिये वहाँ आये। वे महर्षि कश्यपके घरमें गये। कश्यपने आसन, पाद्यजल तथा अर्घ्य देकर उनकी पूजा की और दक्षिणा तथा गौ प्रदान की ॥ १-२ ॥ तदनन्तर महर्षि कश्यप दोनों हाथ जोड़कर कहने लगे-'आज मैं धन्य हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, मेरी तपस्या सफल हो गयी, जो कि इन्द्र तथा विष्णुद्वारा पूज्य आपके चरणकमलोंका मुझे दर्शन हुआ है। हे तपोधनो ! क्या मैं आप लोगोंके आगमनका हेतु जान सकता हूँ ?' तब उन मुनियोंमें सर्वश्रेष्ठ वसिष्ठजीने उन मुनि कश्यपसे कहा ॥ ३-४ ॥ वसिष्ठ बोले-हे ब्रह्मन् ! हम लोगोंने देवर्षि नारदजीके मुखसे सुना है कि आपको 'महोत्कट' नामक पुत्रकी प्राप्ति हुई है। उसके दर्शनके लिये ही हम लोग आपके पास आये हैं, इसके अतिरिक्त और कोई दूसरा प्रयोजन नहीं है ॥ ५ ॥ ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर देवी अदिति शीघ्र ही उस बालकको देखनेके लिये उनके पास ले आयीं। तब वसिष्ठ उन मुनि कश्यपसे बोले- 'यह महोत्कट उत्कट कर्मोंको करेगा। ये बत्तीस शुभ लक्षणोंसे युक्त महान् तेजस्वी परमात्मा विनायक ही तुम्हारे पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए हैं। इसीलिये इसके दोनों चरणतल रक्तवर्णके हैं और ध्वज तथा अंकुशके चिह्नसे समन्वित हैं ॥ ६-७ १/२ ॥ हे महामुने ! इसके समक्ष अनेक विघ्न उपस्थित होंगे, किंतु वे सब विनष्ट हो जायँगे। तथापि इस बालककी प्रत्येक क्षण रक्षा करनी चाहिये' ॥ ८ १/२ ॥ तदनन्तर महर्षि वसिष्ठने उन कश्यपनन्दन गणेशकी भलीभाँति पूजा की और सभी ऋषियोंके साथ उनसे

[Right Column] प्रार्थना की कि आप पृथ्वीके भारको दूर करें, हे देव ! आप सज्जनोंकी रक्षा एवं दुष्ट दानवोंका विनाश करें ॥ ९-१० ॥ तदनन्तर सभी मुनिगण उसे प्रणामकर जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। तब वह बालक 'कश्यपनन्दन' इस नामसे प्रसिद्ध हो गया। एक दिनकी बात है, प्रातःकालके समय जब मुनि कश्यप स्नानके लिये गये तो माता अदितिने अपने पुत्रको बाहर सुला दिया और वे अपने घरके अन्दर चली आयीं ॥ ११-१२ ॥ वे यज्ञके लिये सामग्रियोंको एकत्र करनेमें लग गयीं। उसी समय एक निशाचरी वहाँ आ पहुँची। उसका नाम विरजा था। उसके मुख तथा नेत्र अत्यन्त विशाल थे, हलके समान उसके दाँत थे, गुफाके समान नासिका थी; वह अपने पैरोंसे पर्वतोंको भी चूर-चूर बना देनेवाली थी, उसके स्तन अत्यन्त दीर्घ थे, जिह्वा लपलपा रही थी। उसका भगप्रदेश गोपुरके समान विशाल था। सब कुछ भक्षण करनेवाली उस भूखी निशाचरीने उस बालकको पकड़ लिया और पके हुए केलेके फलके समान शीघ्र ही उसका भक्षण कर गयी ॥ १३-१५ ॥ फिर वह धीरेसे आकाशकी ओर चली गयी तथा पानी पीनेके लिये जमीनपर आयी। उसने बहुत सारा जल पिया, फिर वह विशाल उदरवाली निशाचरी भूमिपर गिर पड़ी। उस समय वह उसी प्रकार महान् मूर्च्छाको प्राप्त हो गयी, जैसे कि सर्पका डँसा हुआ व्यक्ति मूर्च्छित हो जाता है। वह महान् उदरपीड़ासे युक्त स्त्रीकी भाँति भूमिपर लोटने लगी ॥ १६-१७ ॥ 'छोड़ो-छोड़ो' इस प्रकारसे कहती हुई वह निशाचरी एक पग चलनेमें भी असमर्थ हो गयी। हाहाकार करती हुई वह अपनी छाती, सिर तथा मुख पीटने लगी ॥ १८ ॥

क्री०ख०-अ०७ ] * वसिष्ठ आदि ऋषियोंका बालक महोत्कटका दर्शन करना * २८५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] तदनन्तर कश्यपनन्दन वह बालक गणेश उसके शरीरके अन्दर रहकर ही बढ़ने लगा और उसके उदरको चीरकर उसके वक्षपर बैठ गया ॥ १९ ॥ जिस प्रकार जालको फाड़कर महान् मत्स्य बाहर निकल आता है, उसी प्रकार बालक गणेश उस निशाचरीके उदरको चीरकर बाहर निकला। तब उस दुष्ट निशाचरीने महान् चीत्कार करते हुए प्राणोंका परित्याग कर दिया। गिरते हुए उसके शरीरने पाँच योजन दूरतकके वृक्षोंको धराशायी कर दिया। उस विरजा निशाचरीको बालक गणेशने पवित्र बनाकर अपने धाम भेज दिया ॥ २०-२१ ॥ ज्ञान देनेवाले और मोक्ष प्रदान करनेवाले कृपासिन्धु जगदीश्वरके द्वारा दर्शन दिये जानेपर तथा उनके द्वारा स्पर्श किये जानेपर मनुष्योंका इस संसार-सागरमें पुनरागमन कैसे हो सकता है ? ॥ २२ ॥ इधर अपने घरके कार्योंको पूरा करके जब अदिति बाहर आयीं तो उन्होंने बालकको नहीं देखा, तब वे अत्यन्त रुदन करने लगीं। उन्होंने घर-घरमें जाकर देखा, लेकिन कहीं भी बालकको नहीं पाया। तब वे हाहाकार करती हुई भूमिपर गिर पड़ीं ॥ २३-२४ ॥ उनके उच्च स्वरके रुदनको सुनकर अन्य स्त्रियाँ भी रोने लगीं। सभी लोग आश्चर्यचकित और भयभीत हो गये। अदितिका मुख सूख गया, दीन होकर वे बार-बार विलाप करने लगीं। वे अपने मुख तथा आँसुओंसे पूरित काजल लगे हुए अपने नेत्रोंको पोंछने लगीं ॥ २५-२६ ॥ [वे बोल उठीं-] कल्पवृक्षके समान [मुझे] प्राप्त हुए मेरे बालकका किसने हरण कर लिया है, क्या जगदीश्वरका दिया गया वरदान कभी व्यर्थ हो सकता है? भगवान् गणेशजीद्वारा दी गयी मेरी निधिको किस

[दायाँ स्तम्भ] दुरात्माने चुरा लिया, विज्ञानरूपी समुद्रको पाकर भी मैं आज कैसे अत्यन्त मूर्ख हो गयी हूँ? ॥ २७-२८ ॥ सुवर्णके पर्वतको पाकर भी आज मैं कैसी दरिद्र हो गयी हूँ? इस प्रकार विलाप करती हुई वे अदिति अपनी छाती, सिर तथा मुखको पीटने लगीं ॥ २९ ॥ वे अपने आश्रमसे बाहर आ गयीं तथा एक कोशकी दूरीपर उन्होंने एक निशाचरीको भूमिपर पड़ी हुई देखा और यह भी देखा कि उस निशाचरीके वक्षपर वह बालक बैठा हुआ है ॥ ३० ॥ वह क्रीडा कर रहा था, उसके मुख-मण्डलपर मुसकान छायी थी, वह जगे हुए [दुग्ध] कामी [शिशु]- की भाँति प्रतीत हो रहा था, अदितिने दौड़कर उस बालकको उठाया और उसको अपनी छातीसे लगाकर उसे चूमने लगीं। आनन्दमें निमग्न होकर वे बोल पड़ीं- 'आज मेरा महान् सौभाग्य है, जो दैवयोगसे इस राक्षसीके भयसे यह बालक मुक्त हो गया' ॥ ३१-३२ ॥ उस बालकसहित स्वयं भी स्नान करके वे अपने आश्रम-परिसरमें आयीं और सम्पूर्ण वृत्तान्त कश्यपजीको बतलाया, वह सब सुनकर वे मुनि बोले- ॥ ३३ ॥ हे प्रिये ! भूत और भविष्यकी विशेष जानकारी रखनेवाले मुनियोंने जो भी कहा है, उनके आशीर्वादपूर्ण वचनोंसे वह सब आज सत्य हुआ है। सब कुछ भक्षण कर जानेवाली उस निशाचरीसे यह बालक किसी जन्मान्तरीय पुण्यके फलस्वरूप ही जीवित बचा है। तदुपरान्त इस निमित्त कश्यपमुनिने बालकका रक्षाविधान किया और अनेक प्रकारके दान दिये ॥ ३४-३५ ॥ बालकके निमित्त स्वस्तिवाचनपूर्वक शान्ति- पाठ करवाया और अदितिको यह भी बताया कि क्षणभरके लिये भी इस बालकको अकेला नहीं छोड़ना ॥ ३६ ॥

[पाद-टिप्पणी / समापन] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'विरजा राक्षसी-मोक्षण' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥

आठवाँ अध्याय

२८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- आठवाँ अध्याय गणेशजीकी बाललीलाके सन्दर्भमें उद्धत तथा धुन्धुर नामक दैत्योंके वधकी कथा और चित्र नामक गन्धर्वके उद्धारका आख्यान ब्रह्माजी बोले—अत्यन्त पराक्रमशालिनी उस विरजा नामक राक्षसीके वधका समाचार सुनकर उद्धत तथा धुन्धुर नामक महान् बलसे सम्पन्न दो राक्षस महात्मा कश्यपजीके आश्रममण्डलमें आये। तोतेका रूप धारण किये हुए उन दोनोंको देखकर बालक गणेश दूध पीना छोड़कर माता अदितिसे बोले—'इन दोनों तोतोंको लाकर मुझे खेलनेके लिये दो।' तब माता उनसे बोली— 'आकाशमें उड़नेवाले ये दोनों पक्षी भूमिपर स्थित मुझ स्त्रीके द्वारा पकड़े जानेयोग्य नहीं हैं ॥ १-३ ॥ फिर भी यदि मैं इन्हें पकड़ने जाऊँगी तो ये उड़कर आकाशमें चले जायँगे।' तब बालक गणेशने माताकी गोदसे उतरकर उन दोनोंको बाज पक्षीकी भाँति झपटकर पकड़ लिया। उन पक्षियोंने अपने पंखोंके आघातसे तथा चोंचके द्वारा बालकको बहुत मारा, किंतु उस बालकने उन्हें बलपूर्वक धरतीपर पटक दिया ॥ ४-५ ॥ तब उन दोनोंने अपना राक्षसरूप धारणकर प्राणोंका परित्याग कर दिया। उनकी देहके भारसे भयभीत पृथ्वी अत्यन्त विह्वल हो गयी। उनके शरीर दो कोशकी दूरी तकके वृक्षोंको भीषण शब्दपूर्वक तोड़ते हुए गिर पड़े। उन दोनों राक्षसोंको देखकर अदितिने झटसे अपना बालक पकड़ लिया ॥ ६-७ ॥ कश्यपमुनिने उन राक्षसोंके विशाल शरीरको देखा। लोगोंने उनके शरीरोंको काटकर लकड़ी एकत्रकर चिता बनाकर उनका दाह किया। मुनिने बालकके अभ्युदयकी कामनासे अद्भुत शान्ति की, उस शिशुके पराक्रमको देखकर वे महान् आश्चर्य करने लगे ॥ ८-९ ॥ उस समय पुत्रको गोदमें लिये हुई अदितिसे वे परम प्रसन्न होकर बोले—'देवगण तथा देवराज इन्द्र भी जिन राक्षसराजोंको नहीं मार सके, तोतेका रूप धारण करनेवाले उन दोनोंको हमारे इस शिशुने खेल-खेलमें ही मार डाला।' पुनः अदितिपर क्रुद्ध होकर बोले—'तुमने इस बालकको अकेले क्यों छोड़ दिया ? ॥ १०-११ ॥ आज जगदीश्वरने ही इस बालककी रक्षा की है, इसकी आयु कितनी है—यह मुझे ज्ञात नहीं है। हे पतिव्रते ! बिना भूले हुए इस बालककी तुम्हें प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी है ॥ १२ ॥ पर्वतके समान विशाल इन दोनों राक्षसोंको इसने कैसे मारा, निश्चित ही यह राक्षसोंके रहनेका स्थान है, यहाँ यह मेरा बालक कैसे जीवित रह सकेगा ?' ॥ १३ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर वे दोनों दम्पती आश्चर्यचकित हो गये। उस प्रकारके बालकको स्नान कराकर उन दोनोंने स्वयं भी स्नान किया, और वहींपर सो गये ॥ १४ ॥ चार वर्षकी अवस्थामें वह बालक अपने आश्रमके बाहर कुछ दूरीपर स्थित एक सरोवरके पासमें गया। वह सरोवर कमलके पुष्पोंसे समन्वित था, उसमें अनेक मगर तथा मत्स्य रहते थे। उस सरोवरके आस-पास तमाल, सरल, जम्बू, आम्र तथा कटहलके अनेक वृक्ष थे। विविध प्रकारके वृक्षों तथा लताओंसे वह घिरा हुआ था और अनेक प्रकारके फलों तथा पुष्पोंसे सुशोभित था। नाना प्रकारके पक्षीगण वहाँ स्थित थे, अनेक मुनिगणोंसे समन्वित था। उस सरोवरका जल उसी प्रकार अत्यन्त निर्मल तथा रमणीय था, जैसे कि सत्पुरुषोंका अन्तःकरण निर्मल होता है ॥ १५-१७ ॥ उस दिन सोमवती अमावास्या और व्यतीपात योग था, इसलिये देवी अदिति उस सरोवरमें स्नान करने आयीं, वे अपने बालकको सरोवरके तटपर बैठाकर, कण्ठतकके पानीमें अन्दर गयीं। माताके पास जानेके लिये वह बालक भी उछलकर जलके मध्यमें गिर पड़ा। वह जलमें क्रीडा कर ही रहा था कि उसी समय एक

क्री०ख०-अ०८ ] * गणेशजीकी बाललीलाके सन्दर्भमें उद्धत तथा धुन्धुर नामक दैत्योंके वधकी कथा * २८७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] मगरमच्छने उसको पकड़ लिया ॥ १८-१९ ॥ जलके मध्यमें स्थित माता अदिति 'दौड़ो-दौड़ो'— इस प्रकारसे चिल्लाने लगीं, बालकको पकड़नेके लिये वे आयीं, किंतु वे उसे पकड़ न सकीं ॥ २० ॥ वह मगरमच्छ बालकको जलके अन्दर खींचता था और माता बालकको बाहरको खींचती थीं। तदनन्तर वह मगर बालकसहित माँको बहुत दूरतक पानीके अन्दर खींच ले गया ॥ २१ ॥ तब वह बालक अपनी मातासे बोला—'इस मगरसे आप मुझ पुत्रको छुड़ायें नहीं। मैं तुम्हारे साथ सदैव रहूँगा, मेरी मृत्यु नहीं होगी, मैं बलवान् हूँ' ॥ २२ ॥ बालकसहित उस माता अदितिको आकण्ठ जलमें निमग्न और अत्यन्त व्याकुल देखकर उसको बलपूर्वक निकालनेके लिये शिष्यगण उछलकर जलमें कूद पड़े। किंतु उस बलवान् मगरमच्छसे छुड़ानेमें वे भी समर्थ न हो सके। तब बालकने अपने अत्यन्त पराक्रमका प्रदर्शन किया और खेल-खेलमें उस मगरमच्छको जलसे बाहर भूमिपर फेंक दिया। जैसे वायु पके हुए फलको गिरा डालती है, और जैसे बालक पत्थरके छोटे टुकड़ेको फेंक डालता है, वैसे ही बालक गणेशने मगरको फेंक दिया ॥ २३–२५ ॥ उसका एक योजन विस्तारवाला अद्भुत शरीर चूर-चूर होकर जमीनपर गिरा हुआ दिखायी दिया। वह निश्चेष्ट तथा प्राणशून्य हो गया था। उसे निष्प्राण देखकर बालक तथा शिष्योंसहित अदिति अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त हुईं, तदनन्तर दिव्य शरीरवाला होकर वह चित्र नामक गन्धर्व उससे बोला— ॥ २६-२७ ॥ हे गजानन ! मैं पूर्वकालमें गन्धर्वोंका राजा था। मेरे विवाहके समय सभी गन्धर्व मेरे घर आये हुए थे ॥ २८ ॥ मैंने उन सबकी भलीभाँति पूजा की, किंतु वैवाहिक कार्योंको करते हुए मैं महर्षि भृगुकी पूजा न कर पाया। इससे मुनि मेरे ऊपर कुपित हो गये ॥ २९ ॥

[दायाँ स्तम्भ] उन्होंने मुझे शाप दे डाला कि तुम सरोवरके मध्यमें रहनेवाले विशाल मगरमच्छ हो जाओगे। मुनिके शापको सुनकर मैंने उस शापसे मुक्ति दिलानेकी प्रार्थना की ॥ ३० ॥ तब मुनि बोले कि जब कश्यपनन्दन गजानन तुम्हारा स्पर्श करेंगे, तब तुम अपने पूर्व शरीरको प्राप्त कर लोगे। इस समय मैंने आपको भलीभाँति जान लिया है, आप गजानन ही बालकरूप धारण किये हुए हैं। आप ही सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, कर्ता, रक्षक तथा संहारकर्ता हैं ॥ ३१-३२ ॥ आप निर्गुण, अहंकाररहित, सत्, असत् एवं परम कारण हैं, आप विविध अवतार धारणकर भक्तोंकी रक्षा करते हैं और दुष्टोंका संहार करते हैं ॥ ३३ ॥ आप सर्वत्र व्याप्त हैं, पूर्णकाम हैं और अनेकों ब्रह्माण्डोंके एकमात्र स्वामी हैं। आप मुनियोंके लिये भी अगम्य और मन तथा वाणीसे परे हैं ॥ ३४ ॥ इस प्रकार स्तुति करके तथा उन्हें प्रणाम करके और उन बालरूपधारी गजाननका पूजन करके उसने उनकी बार-बार प्रदक्षिणा की, फिर वह चला गया ॥ ३५ ॥ अदितिने बालकको गोदमें लिया और उसे प्यार करके अपना स्तनपान कराने लगीं। अदितिके मनमें बड़ा ही आश्चर्य हुआ, तदुपरान्त वे आनन्दित होकर अपने भवनको गयीं ॥ ३६ ॥ वहाँ उन्होंने महर्षि कश्यपको प्रणामकर सम्पूर्ण वृत्तान्त उन्हें बतलाया। आश्चर्यचकित होकर मुनि कश्यपने अदितिसे कहा—'ये तो परमेश्वर हैं। मैं समझता हूँ कि लीला करनेके लिये ही इन्होंने मनुष्यशरीर धारण किया है। ये देवताओं तथा असुरोंके लिये भी अशक्य प्रतीत होनेवाले और भी अन्य अद्भुत कर्मोंको करेंगे, जिन्हें हम इन्हींके कृपा- प्रसादसे देख पायेंगे। अतः अपना कल्याण चाहनेवालोंको चाहिये कि इन गणेशजीकी वे दृढ़तापूर्वक भक्ति करें' ॥ ३७–३९ ॥

[पाद-टिप्पणी/समापन] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'नक्र [रूपधारी चित्र गन्धर्व]- की मुक्तिका वर्णन' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥

नौवाँ अध्याय

२८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 नौवाँ अध्याय हाहा-हूहू तथा तुम्बुरु नामक गन्धर्वोंका कश्यपमुनिके आश्रममें आना, गन्धर्वोंद्वारा पंच- देवोंका पूजन, बालक गणेशद्वारा लीलापूर्वक पंचदेवोंकी मूर्तियोंको अदृश्य कर देना, माताको अपने मुखमें समस्त ब्रह्माण्डको प्रतिष्ठित दिखाना तथा गन्धर्वोंको विश्वात्मारूप दिखाकर उनके भ्रमको निवारित करना, गन्धर्वोंद्वारा गणेश-स्तवन ब्रह्माजी बोले- हे मुने ! मैं बालरूपधारी गणेशजीके | हैं, अतः हम लोग जाते हैं, हमें आज्ञा प्रदान कीजिये।' अन्य चरितका भी वर्णन आपसे करता हूँ, जो समस्त | उनके वचनोंको सुनकर तपोनिधि कश्यपजी पुनः बोले- पापोंका नाशक है। उसे आप एकाग्रचित्त होकर सुनिये ॥ १ ॥ | आप लोग भोजन करनेके अनन्तर थोड़ी देर विश्राम एक बारकी बात है, हाहा, हूहू तथा तुम्बुरु नामक | करके ही यहाँसे जायँ, बिना भोजन लिये यहाँसे कोई गन्धर्व कैलास जानेकी इच्छासे महर्षि कश्यपजीके | नहीं गया है। तदनन्तर महर्षिने स्नान आदिके लिये जल आश्रममें पहुँचे। वे गन्धर्व वीणाको हाथमें लेकर वीणा | प्रदान किया और उनके लिये भोजनका निर्माण बजाते हुए गान कर रहे थे, वे भगवान् विष्णुकी भक्तिमें | करवाया ॥ ९-१० ॥ निरत रहनेवाले थे। शंख, चक्र, गदा, पद्म एवं | तदनन्तर मननशीलोंमें श्रेष्ठ वे हाहा-हूहू आदि तुलसीकी मालासे सुशोभित थे। उनके शरीरके अंगोंमें | गन्धर्व स्नानके पश्चात् देवताओंकी पूजा करने लगे ॥ ११ ॥ गोपीचन्दनका अनुलेपन लगा हुआ था, उन्होंने पीताम्बर | वे देवी पार्वती, शिव, विष्णु, गणेश तथा धारण कर रखा था और वे अत्यन्त मनोहर थे। महर्षि | सूर्यनारायणकी पूजा करके मुहूर्तभरके लिये ध्यानमें कश्यपजीने उनका बहुत आदर-मान किया और यथाविधि | स्थित हो गये। उसी समय बालकोंके साथ बाहर उनकी पूजा की ॥ २-४ ॥ | खेलनेके अनन्तर बालक विनायक जब घरके अन्दर उन्हें प्रणाम करके कश्यपजी बोले- 'मेरे किसी | आये तो वहाँ उन्होंने पंचदेवोंकी उन मूर्तियोंका दर्शन पुण्यके प्रभावसे ही धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष- इस | किया। उन्होंने शीघ्र ही मूर्तियोंको उठाकर बाहर फेंक चतुर्विध पुरुषार्थको प्रदान करनेवाले आप-जैसे महापुरुषोंका | दिया और वे स्वयं अग्निगृह (यज्ञशाला)-में चले दर्शन मुझे हुआ है। आज मेरा तप धन्य हो गया, मेरा | गये ॥ १२-१३ ॥ जन्म लेना सफल हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, | तदनन्तर वे अपने सारे शरीरमें भस्म लगाकर मेरा ज्ञान धन्य हो गया और यह मेरा आश्रम धन्य हो | अन्तर्धान हो गये। जब उन गन्धर्वोंका ध्यान टूटा तो गया। आपके यहाँ आगमनका उद्देश्य मैं नहीं जानता हूँ, | उन्होंने सामने रखी हुई मूर्तियोंको नहीं देखा ॥ १४ ॥ उसे आप बतायें' ॥ ५-६ ॥ | उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ और वे सभी आपसमें ही इस प्रकारसे पूछे गये वे गन्धर्व उनके वचनको | कहने लगे, किस दैत्यने कर्मकी हेतुभूता हमारी इन सुनकर उनसे बोले- 'हम लोग कैलास-दर्शनकी इच्छासे | मूर्तियोंको चुराया है ॥ १५ ॥ आये हैं और इसीमें हमें आपका दर्शन हो गया ॥ ७ ॥ | क्या कोई गन्धर्व, राक्षस या यक्ष इन मूर्तियोंको आज हमारा पाप नष्ट हो गया और हमारा जन्म | चुराने आये अथवा क्या हमारे सत्त्वकी परीक्षा लेनेके लेना सफल हो गया। हमें लगता है कि अब परम सिद्धि | लिये ये मूर्तियाँ स्वतः ही अन्तर्धान हो गयीं ! ॥ १६ ॥ हमसे दूर नहीं है, हमें परम विश्रान्ति प्राप्त हुई है ॥ ८ ॥ | तदनन्तर वे महान् क्रोध करते हुए मुनि कश्यपके हम लोग भगवान् शंकरका दर्शन करनेको उत्सुक | पास पूछनेके लिये आये और बोले- 'आपके घरमें जब

क्री०ख०-अ०९ ] * हाहा-हूहू तथा तुम्बुरु नामक गन्धर्वोंका कश्यपमुनिके आश्रममें आना * २८९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 [बायाँ स्तम्भ] हम लोग ध्यानपरायण थे, उसी बीच कैसे सब मूर्तियाँ गायब हो गयीं ? जन्मजात वैर रखनेवाले प्राणी भी जब आपके आश्रममें परस्परके वैरका त्यागकर क्रीड़ा करते हैं, देवता भी जब आपसे भयभीत रहते हैं, तब इस आश्रममें लुटेरे कैसे आ गये ?' ॥ १७-१८ ॥ उनका वह वचन सुनकर मुनि कश्यप अत्यन्त रुष्ट हो गये। उन्होंने यह जान लिया कि मूर्ति प्राप्त किये बिना ये भोजन नहीं करेंगे ॥ १९ ॥ तब मुनिश्रेष्ठ कश्यपजीने अपने शिष्योंको बुलाकर उनसे कहा कि 'मेरे जन्मसे लेकर आजतक इस आश्रममें कोई चोर-लुटेरा नहीं आया, दैववश कौन यहाँ दस्यु बन गया, इस विषयमें तुम लोग बतलाओ?' महर्षि कश्यपके इस क्रुद्ध वचनको सुनकर वे शिष्य अपने गुरुसे कहने लगे— ॥ २०-२१ ॥ हे स्वामिन् ! हम लोग चोर नहीं हैं, आप अपने पुत्रके विषयमें तो जानते ही हैं, दोषोंको गिनानेमें हम लोगोंको पाप लगेगा, अतः वह सब हम नहीं बतायेंगे। उनकी बात सुनकर मुनि कश्यपजीने हाथमें छड़ी ले ली और वे पुत्रको खोजते हुए निकल पड़े तो अग्निशालामें उन्होंने उसको देखा ॥ २२-२३ ॥ वे बालक गणेशको उन गन्धर्वोंके पास ले आये, उन लोगोंने उसे शिवके समान देखा। क्रोधसे मूर्च्छित कश्यपजीने उन्हींके सामने विनायकसे कहा— ॥ २४ ॥ अरे वत्स ! तुम शीघ्र ही मूर्तियोंको ले आओ, नहीं तो तुम आज मेरे हाथों मरोगे। तब निडर गणेशजी बोले—'हे तात ! मूर्तियोंको मैंने नहीं लिया है। आप जो-जो भी शपथ लेनेको कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगा।' ऐसा कहते हुए पिताके भयसे भयभीत वे बालक गणेश अत्यधिक रुदन करने लगे ॥ २५-२६ ॥ अत्यन्त विह्वल होकर वे अपने मुखको फैलाकर भूमिपर गिर पड़े। उसी समय माता अदिति भी वहाँ आ पहुँचीं, तब बालकने उनसे कहा— ॥ २७॥ 'यदि मैंने देवताओंकी मूर्तियोंको खा लिया है, तो मेरे मुखमें देखो', फिर जब उसने मुख खोला तो माताने मुखके अन्दर समस्त विश्वको स्थित देखा ॥ २८ ॥ [दायाँ स्तम्भ] वे आश्चर्यचकित होकर भयसे अत्यन्त विह्वल हो मूर्च्छित हो गयीं और भूमिपर गिर पड़ीं। इसके अनन्तर मुखके अन्दर उन हाहा-हूहू आदि गन्धर्वों तथा मुनि कश्यपने कैलासपर्वत, सपरिकर भगवान् शंकर, वैकुण्ठ, विष्णु भगवान्, ब्रह्मा, सत्यलोक, इन्द्र तथा उनकी पुरी अमरावती, पर्वत एवं वनोंसे समन्वित पृथ्वी और उसमें रहनेवाले लोगों, नदियों, सागरों, यक्षों, राक्षसों, पन्नगों, वृक्षों, पक्षिगणों, चौदह भुवनों, इन्द्रादि देवताओं, [स्वर्गादि] समस्त लोकों, समस्त पातालों तथा दसों दिशाओंको देखा ॥ २९–३२ ॥ जब माताको चैतन्य हुआ, तो उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्तनपान कराया। उन विश्वात्माका इस प्रकार दर्शनकर मुनि कश्यपने उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने मनमें यह निश्चय किया कि जिन साक्षात् परमात्माने मेरे घरमें अवतार लिया है, उन्हींको मैं प्रताड़ित करने जा रहा था ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर कश्यपमुनिने उन गन्धर्वोंसे कहा कि 'आप लोग भोजन कर लें। इस महाबली बालकको ताड़ित करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ॥ ३५ ॥ समष्टि तथा व्यष्टिरूप धारण करनेवाले इस बालकको आपलोग अपना उग्ररूप दिखाकर भयभीत करें। यदि आप लोगोंमें शक्ति है तो मूर्तियोंको प्राप्त करनेके लिये इसे ताड़ित करें' ॥ ३६ ॥ वे कहने लगे कि हम लोग आपके घरमें बिना पंचायतन देवोंकी मूर्तियोंको प्राप्त किये अन्न अथवा कन्दमूल—कुछ भी भक्षण नहीं करेंगे ॥ ३७ ॥ तदनन्तर इस प्रकार कहनेवाले उन गन्धर्वोंने बालकको पाँच रूपोंमें देखा। उस एक ही बालकको दुर्गा, विष्णु, सूर्य, शिव तथा गणेश—इस प्रकारसे पाँच रूपोंवाला देखा। तब स्वस्थमन होकर उन गन्धर्वोंने उन बालरूप गणेशको प्रणाम किया, उनकी पूजा की और वे उनकी स्तुति करने लगे। क्षणभरमें वे उसे बालकरूपमें देखते थे और दूसरे ही क्षण वे उन्हें पाँच रूपोंवाले दिखायी देते थे ॥ ३८-३९ ॥ फिर अगले ही क्षण वे महान् भयकारी रूप धारण

२९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] कर लेते थे और कभी समस्त विश्व-ब्रह्माण्डको अपनेमें समेटे हुए दिखायी देते थे। तब उन्हें ही उन्होंने षड्रससम्पन्न नैवेद्यान्नका भोग लगाकर स्वयं भी भोजन किया। इसके बाद वे उस विश्वरूपधारी बालक गणेशकी भक्तिपूर्वक स्तुति करने लगे ॥ ४० ॥ तीनों गन्धर्व बोले—हे विभो ! विविध प्रकारके स्वरूप धारण करनेवाले, रूपहीन, अद्वितीय एवं सगुण स्वरूप धारण करनेवाले आपकी भक्ति न करनेके कारण ही यह सम्पूर्ण जीव-जगत् अज्ञानसे मोहित होकर संसार-चक्रमें भ्रमण कर रहा है। नाना प्रकारकी भेद- बुद्धिसे ग्रस्त होकर आपके स्वरूपसे विमुख हुआ यह विविध प्रकारसे भ्रमित हो रहा है और अपने द्वारा किये गये विविध प्रकारके कर्मोंके अंकुरोंसे भ्रंशित और नाना प्रकारके पाशोंमें जकड़ा हुआ है ॥ ४१ ॥ दूसरे जो भक्तजन कर्मफलकी उपेक्षा करके आपके चरणारविन्दोंकी सेवामें परायण हैं, अपनी आत्माको ही दूसरेके शरीरमें प्रतिष्ठित देखनेवाले हैं, निरन्तर परमात्माके ध्यानमें परायण हैं, निर्मल अन्तःकरणवाले हैं, वे ज्ञानसे समस्त पापोंका प्रक्षालन करके, सभी कर्मांकुरोंको दग्ध करके आपमें उसी प्रकार सत्वर प्रवेश करते हैं, जिस प्रकार कि मेघोंके जलसे व्याप्त सभी नदियाँ समुद्रमें प्रविष्ट होती हैं ॥ ४२ ॥ और कुछ लोग जो आपकी भक्तिमें परायण चित्तवाले

[दायाँ स्तम्भ] हैं, वे जब बहुत-सी सिद्धियोंको प्राप्त कर लेते हैं तो उन्हींमें आसक्त मनवाले होकर आपके चरणारविन्दको भूल जाते हैं, वे तो बड़े कष्टसे उत्तम पदको प्राप्त करके भी अज्ञानवश [तत्त्वको] न जाननेके कारण अपने वास्तविक पदसे उसी प्रकार पतनको प्राप्त होते हैं, जैसे कि व्यक्ति दुर्लभ अमृतको छोड़कर विषका पान करता है ॥ ४३ ॥ अतएव हमारा जन्म चाहे किसी शुभ योनिमें हो अथवा किसी अशुभ योनिमें, हमें आपकी स्मृति निरन्तर बनी रहे और समस्त दुःखोंका उच्छेद करनेवाली आपकी मंगलमयी भक्ति सदा बनी रहे। यदि ऐसा हो जाय तो संसार-समुद्रमें भ्रमण करते हुए हम लोगोंका उद्धार आपकी कृपादृष्टिसे कभी-न-कभी हो ही जायगा। हे सर्वात्मन् ! आपको नमस्कार है ॥ ४४ ॥ हे योगेश्वर ! आपके अवतार क्यों होते हैं, कितने होते हैं तथा कब होते हैं, इन्हें जाननेमें कोई भी समर्थ नहीं है। हे मायापति ! हे गुणेश्वर ! हे भूमन् ! आपको बार-बार नमस्कार है। हे भगवन् ! आपको नमस्कार है ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर वे हाहा-हूहू आदि गन्धर्व पंचदेवोंकी पूजा करके तथा उस बालक महोत्कट गणेशकी चेष्टाओंके प्रति विस्मित होते हुए भगवान् शिवके निवास-स्थान कैलासकी ओर चले गये ॥ ४६ ॥


॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'हाहा आदि गन्धर्वोंके द्वारा की गयी गजानन-स्तुतिका वर्णन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥

दसवाँ अध्याय बालक गणेशद्वारा विघातादि राक्षसोंका उद्धार, बालक गणेशके यज्ञोपवीत-संस्कारका वर्णन, विविध देवोंद्वारा उन्हें अनेक नाम तथा विविध उपहार प्रदान करना

[बायाँ स्तम्भ] ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर धीमान् महर्षि कश्यपजीने उस बालक गणेशके पाँचवें वर्षमें अपने गृह्यसूत्रमें बतायी गयी विधिके अनुसार शुभ मुहूर्त तथा शुभ लग्नमें वेदके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणोंके द्वारा उसका चूड़ाकरणसहित मंगलमय व्रतबन्ध-संस्कार कराया। महर्षि कश्यपजीके शिष्योंद्वारा आमन्त्रित किये गये

[दायाँ स्तम्भ] देवता, दानव, राक्षस, मुनिगण, यक्ष, नाग और अनेक राजर्षि तथा वैश्य एवं शूद्रगण नाना प्रकारके उपहारोंको हाथमें लेकर वहाँ आये ॥ १-३ ॥ उस समय मनुष्यों तथा देवताओंने विविध प्रकारके वाद्योंको बजाया। महर्षि कश्यपने गणेश-पूजन किया तथा स्वस्तिवाचन, मण्डप-स्थापन, मातृकापूजन एवं

क्री०ख०-अ० १० ] * बालक गणेशद्वारा विघातादि राक्षसोंका उद्धार * २९१ आभ्युदयिक श्राद्ध किया और ब्राह्मणोंकी पूजा की। मित्र- गणोंको यथायोग्य वस्त्रदान किया। अन्य जनोंको भी वस्त्र दिये। उन सभीने भी उन वस्त्रोंको पहन लिया ॥ ४-६ ॥ कश्यपजीने हवन सम्पन्न हो जानेपर पुनः ब्राह्मणोंकी पूजा की। तदनन्तर शीघ्र ही वेदिकामें अन्तःपट लगाकर वेदीमें अग्निकी स्थापना की गयी और बालकको वहाँ लाया गया। सुवासिनी स्त्रियों तथा ब्राह्मणोंने उसके ऊपर अक्षतोंको बिखेरा ॥ ७-८ ॥ उन ब्राह्मणोंके मध्यमें ब्राह्मणोंका रूप धारणकर पाँच अत्यन्त दुष्ट राक्षस भी बैठे थे। उनके नाम थे- विघात, पिंगाक्ष, विशाल, पिंगल तथा चपल। वे बड़ा- बड़ा तिलक लगाये थे, अक्षमालासे सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने अपने-अपने हाथमें जलपात्र धारण किया हुआ था, वे अत्यन्त रमणीय वस्त्रों तथा आभूषणोंको धारण किये हुए थे ॥ ९-१० ॥ उन दुष्टोंने उस बालक गणेशके प्राणोंका हरण करनेकी इच्छासे उसपर अस्त्रोंसे आघात किया। उनके अस्त्रोंसे उस कुमारका शरीर छिन्न-भिन्न हो गया ॥ ११ ॥ कुमार महोत्कटने उन्हें दुष्ट जानकर अक्षतोंको मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित किया और उन पाँचों राक्षसोंपर पाँच अक्षत फेंके ॥ १२ ॥ [जिससे] उसी समय उनके प्राण निकल गये और वे अपने विकराल रूप धारणकर दस योजन विस्तारवाले हो गये एवं छिन्न-भिन्न होकर भूमिपर उसी प्रकार गिर पड़े, जैसे कि इन्द्रके द्वारा किये गये प्रहारसे पर्वत गिर पड़े हों। उस समय भारी कोलाहल मच गया और दसों दिशाएँ धूलसे आच्छादित हो गयीं ॥ १३-१४ ॥ वहाँ एकत्रित लोग कहने लगे- 'छद्म रूप धारण करनेवाले इन पाँच राक्षसोंको उस बालकने क्षणभरमें कैसे मार डाला ? हम सब इस बालकको नहीं जानते हैं। क्या साक्षात् परमेश्वरने ही इस पृथ्वीके भारको दूर करनेके लिये स्वयं अवतार धारण किया है ?' इस प्रकारका वार्तालाप हो ही रहा था, कि उसी समय अपने-अपने विमानोंमें बैठे हुए ब्रह्मा आदि देवताओँने उस आदरणीय बालकपर पुष्पोंकी वृष्टि की ॥ १५-१६१/२ ॥ उन प्रेतों (शवों)-के वहाँसे ले जाये जानेके अनन्तर ब्राह्मणों तथा मुनि कश्यपने उस उपनीत बालक गणेशको अपनी शाखामें कहे गये मन्त्रोंके द्वारा वस्त्र, मेखला, यज्ञोपवीत, मृगचर्म तथा दण्ड धारण कराया ॥ १७-१८ ॥ इसके अनन्तर महर्षि कश्यपने उसकी अंजलिमें जल भरकर उसे भगवान् सूर्यके मण्डलका दर्शन कराया और हवन समाप्त करनेके पश्चात् उसे गायत्री मन्त्रका उपदेश दिया ॥ १९ ॥ पहले गायत्री मन्त्रके एक पादका, तदनन्तर प्रथम पाद एवं द्वितीय पादका और फिर सम्पूर्ण मन्त्रका उपदेश दिया। सर्वप्रथम माताने उसे भिक्षा प्रदान की। तदनन्तर वहाँ आये हुए संख्यातीत लोगोंने उसे भिक्षा दी ॥ २० ॥ तदनन्तर बटुक गणेशको महर्षि कश्यपने शौचाचार- सम्बन्धी अनेक नियमोंका उपदेशकर पुनः ब्राह्मणोंकी पूजा की और उन्हें वस्त्र, सुवर्ण तथा गौएँ प्रदान कीं। बालकके महान् अरिष्ट कट जानेपर महर्षि कश्यपने ब्राह्मणोंको यह सब दान अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक दिया था। तदनन्तर मुनि वसिष्ठजी उस बटुकको सभाके मध्यमें स्थित ब्रह्माजीके पास ले गये ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजीके कमण्डलुमें स्थित पवित्र जलको बालकने ग्रहण किया। तब ब्रह्माजीने अपने हाथमें स्थित तथा सदा ही खिले रहनेवाले कमलको उसे प्रदान किया ॥ २३ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजीने उस बालक गणेशका 'ब्रह्मणस्पति' यह नाम रखा। बृहस्पतिजीने बालक गणेशकी पूजाकर उसका 'भारभूति' यह नाम रखा ॥ २४ ॥ कुबेरने अपने कण्ठमें स्थित रहनेवाली रत्नोंकी माला उसे प्रदान की। तदनन्तर उसका पूजनकर कुबेरने बालकका 'सुरानन्द' यह नाम रखा ॥ २५ ॥ जलाधिपति वरुणने सभी देवताओंके सुनते हुए 'सर्वप्रिय' यह नाम रखकर उसे अपना 'पाश' प्रदान किया। भगवान् शंकरने अपना त्रिशूल और डमरु उसे प्रदानकर 'विरूपाक्ष' यह नाम उसका रखा। साथ ही उन्होंने उसे चन्द्रमाकी कला प्रदानकर 'भालचन्द्र' यह नाम भी रखा ॥ २६-२७ ॥ त्रैलोक्यजननी भगवती शिवाने उसे प्रसन्नतापूर्वक

२९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ‘परशु’ नामक अस्त्र प्रदान किया और ‘परशुहस्त’ | पूजा नहीं की और न कोई मंगलमय श्रेष्ठ उपहार ही यह सुन्दर नाम रखा तथा पुनः उसकी पूजा करके | प्रदान किया ॥ ३३-३४॥ अपना श्रेष्ठ वाहन ‘सिंह’ उसे प्रदान किया और | इन्द्र सोचते थे, मैं तीनों लोकोंके द्वारा पूज्य हूँ, ‘सिंहवाहन’ यह सुन्दर नाम रखा और उसे आदेश | देवताओंका राजा हूँ, वरिष्ठ हूँ, अमृतका पान करनेवाला देते हुए कहा—‘हे विनायक! तुम शीघ्र ही दुष्टोंका | हूँ, गजेन्द्र ऐरावतकी सवारी करनेवाला हूँ और भगवान् विनाश करो’॥ २८—२९१/२ ॥ | विष्णु तथा शूलपाणि शंकरजीद्वारा भी पूजित हूँ तो फिर समुद्रने ब्राह्मणरूप धारणकर वहाँ उपस्थित होकर | मैं कश्यपजीके छोटे बालक उस गणेशको क्यों नमस्कार उसे मुक्ताकी माला प्रदान की और उसकी पूजाकर | करूँ? सिंह कभी भी तृणका भक्षण नहीं करता, समुद्र ‘मालाधर’ यह नाम उसका रखा। भगवान् शेषने | कभी भी छोटे सरोवरसे जलकी अभिलाषा नहीं करता गणेशजीके आसनके रूपमें स्वयं अपनेको समर्पित किया | और सब कुछ प्रदान करनेवाला कल्पवृक्ष अन्य किसी और बड़ी प्रसन्नतापूर्वक ‘फणिराजासन’ उसका नामकरण | दूसरेसे कुछ भी नहीं माँगता ॥ ३५-३६ ॥ किया। अग्निदेवने उसे दाहशक्ति प्रदान की और | महर्षि कश्यपजीने अपने ध्यानयोगसे इन्द्रके इस ‘धनञ्जय’ यह नाम रखा ॥ ३०—३२॥ | प्रकारके भावको समझकर उसकी भलाईकी कामनासे वायुदेवने बालकका ‘प्रभंजन’ यह नाम रखा और | इस प्रकारके धर्मयुक्त वचन कहे— ॥ ३७ ॥ महान् पराक्रम उसे प्रदान किया। इस प्रकार सभी देवोंने | जो अद्भुत कर्मवाला हो और जो गुणोंकी खान यथाशक्ति उसे कुछ भेंट प्रदानकर उसके विविध नाम | हो, वह पूजाके योग्य तथा प्रणाम करनेके योग्य होता रखे। हे मुने! उनके नामोंका वर्णन करनेमें किसीकी भी | है, इसी प्रकार गुणोंसे रहित ब्राह्मण भी पूज्य एवं शक्ति नहीं है। देवराज इन्द्रने मदसे उन्मत्त होकर उसकी | नमस्कार्य नहीं होता है ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें ‘नाना नामोंका वर्णन’ नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १० ॥ ग्यारहवाँ अध्याय महर्षि कश्यपजीद्वारा इन्द्रको बालक गणेशके अद्भुत कर्मोंको बताना, इन्द्रकी आज्ञासे वायु तथा अग्निद्वारा बालक गणेशकी परीक्षा, गणेशका विराट् रूप धारणकर इन्द्रको दिखाना, इन्द्रका भयभीत होकर उनकी स्तुति करना, इन्द्रकृत स्तुतिका माहात्म्य कश्यपजी बोले—मेरे घरमें यह कोई परम पुरुष | दो दैत्य थे। वे तोतेका रूप धारणकर इसे मारनेके लिये ही अवतीर्ण हुआ है, जो अनिर्वचनीय गुणोंवाला है। यह | आये। इसने उनके पंख पकड़कर शिलापर पटक डाला, सत्त्वादि तीनों गुणोंसे समन्वित होते हुए भी उन तीनों | जिससे निष्प्राण होकर वे भूमिपर गिर पड़े, उन भयंकर गुणोंसे रहित है, गुणातीत है ॥ १ ॥ | दैत्योंको सबने अपने सामने देखा था। उसी प्रकार एकबार जो इसका विरोध करेगा, वह अपने स्थानसे च्युत | चित्र नामक गन्धर्व [शापवश] मगरमच्छका रूप हो जायगा। हे देवेन्द्र! मेरे द्वारा बताये गये इसके अद्भुत | धारणकर जलमें स्थित था। वह इस बालकके स्पर्शमात्र कर्मोंके विषयमें आप सुनें। भयंकर विरजा नामक राक्षसी | करनेसे दिव्य शरीरको प्राप्त हो गया ॥ ४—६ ॥ इसे मारनेके लिये आयी थी, किंतु इस बालकने उसे मार | हाहा-हूहू तथा तुम्बुरु नामक दैत्योंके सत्त्वकी डाला, वह दो योजन दूर जाकर गिरी ॥ २-३ ॥ | शुद्धिके लिये इसने स्वयं पंचदेवोंकी मूर्तियोंका अपहरण उद्धत तथा धुन्धु (धुन्धुर) नामक अत्यन्त मदान्ध | करके स्वयंको ही पंचदेवोंके रूपमें प्रकट किया ॥ ७ ॥

क्री०ख०-अ०११ ] * महर्षि कश्यपजीद्वारा इन्द्रको बालक गणेशके अद्भुत कर्मोंको बताना * २९३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] आप सभी लोगोंके देखते-देखते इसने विघात आदि पाँच राक्षसोंको मार डाला। महर्षि कश्यपजीके इस प्रकारके वचन सुनकर बल नामक राक्षस तथा वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र बोले— ॥ ८ ॥ इन्द्र बोले— जबतक मैं इसके गुणोंके वैशिष्ट्यको नहीं देख लेता, तबतक यह मेरे लिये कैसे मान्य हो सकता है ? ॥ ८१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर देवराज इन्द्रने वायुदेवताको आज्ञा दी कि इस बालकको उड़ाकर आकाशमें ले चलो ॥ ९ ॥ इन्द्रकी आज्ञा प्राप्त करते ही वायुदेव प्रलयकालमें प्रवाहित होनेवाली आँधीके समान वेगसे प्रवहमान हो गये, वे सभी लोकोंको आन्दोलित करने लगे, पृथ्वीको धारण करनेवाले पर्वतोंको जोरसे घुमाने लगे, कहीं असमयमें ही प्रलय तो नहीं शुरू हो गया, इस प्रकारसे विचार करते हुए अत्यन्त भयभीत ऋषिगण काँप उठे ॥ १०-११ ॥ तदनन्तर वायुदेवता उस बटुक गणेशको उड़ा ले जानेके लिये बड़े वेगसे उसके पास पहुँचे, परंतु न तो उस बालकका आसन हिला और न एक रोम ही हिल सका। वायुदेव जब अपने प्रयत्नमें विफल हो गये, तब इन्द्रने अग्निसे कहा— तुम शीघ्र ही इस बटुकको जला डालो, आज तुम्हें अपनी सामर्थ्यका प्रदर्शन करना होगा ॥ १२-१३ ॥ इन्द्रकी आज्ञाको शिरोधार्य करके वे अग्निदेव प्रलयकालीन अग्निके समान देदीप्यमान होकर तीनों लोकोंको जलाते हुए-से उस बालकके पास पहुँचे ॥ १४ ॥ सभी वृक्षोंको जला डालते हुए, सभी समुद्रोंको सुखाते हुए और सभी लोगोंको जलाते हुए उन अग्निको देखकर महर्षि कश्यपजीके पुत्र बालक गणेशने अग्निको तत्काल वैसे ही निगल लिया, जैसे कोई रोगी औषधिकी गोलीको निगल जाता है ॥ १५१/२ ॥ अग्निको इस प्रकारसे निगल लिये जानेपर वे इन्द्र क्रोधसे लाल आँखोंवाले हो गये और वे हजार आँखोंवाले इन्द्र अपनी सब कुछ देख सकनेवाली सभी आँखोंसे लोगोंको देखने लगे ॥ १६१/२ ॥

[दायाँ स्तम्भ] उसी समय इन्द्रने देखा कि वह बालक गणेश हजारसे भी अधिक आँखोंवाला हो गया है। उसके असंख्य सिर और असंख्य मुकुट हैं, उसके कानोंकी संख्या अनन्त है, वह अनन्त हाथ, पैरोंवाला है, अन्तहीन उत्कृष्ट पराक्रमसे सम्पन्न है, सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि— ये उसके तीन नेत्र हैं, उसने अपने शिरोमण्डलसे आकाश तथा पृथ्वीको व्याप्त कर रखा है, सात पाताल ही उसके चरण हैं, सातों लोक उसके एक मस्तकके समान हैं, असंख्यों सूर्योंके समान उसकी आभा है, असंख्य इन्द्र उसकी सेवा कर रहे हैं, वह असंख्य विष्णु, ब्रह्मा, शिव आदिसे समन्वित है, उसके एक-एक रोममें अनेकों ब्रह्माण्ड स्थित हैं, जिस प्रकार गूलरके वृक्षमें जड़से लेकर सिरेतक गूलरके फल-ही-फल लगे रहते हैं अथवा जैसे गूलरके फलमें असंख्य मात्रामें मच्छर भिनभिनाते रहते हैं, वैसे ही उसके एक-एक रोमकूपमें असंख्य ब्रह्माण्ड स्थित थे ॥ १७-२११/२ ॥ भ्रान्त होकर उन अनेक ब्रह्माण्डोंमेंसे एक ब्रह्माण्डके भीतर इन्द्र प्रविष्ट हो गये तो वहाँ उन्होंने चराचर जगत्सहित तीनों लोकोंको देखा। जैसे वनमें उगनेवाले केलेके कोशके प्रत्येक पत्रमें फल लगे रहते हैं, वैसे ही शचीपति इन्द्रने वहाँ एक ब्रह्माण्डके अन्तर्गत असंख्य जगत् देखे ॥ २२-२३१/२ ॥ भ्रान्तचित्त होकर वे उसीके अन्दर चक्कर काटने लगे, लेकिन उन्हें वहाँसे बाहर निकलनेका कोई मार्ग दिखायी नहीं दिया, तब विफल मनोरथवाले इन्द्रने भगवान् गणपतिको सिर झुकाकर प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने देवदेवेश्वर गजाननकी प्रार्थना की ॥ २४-२५ ॥ इन्द्र बोले— जो महर्षि कश्यपके पुत्ररूपमें पृथ्वीके भारका हरण करनेके लिये अवतरित हुए हैं और जिनकी महिमाका आकलन ही नहीं हो सकता, फिर मेरे द्वारा उनकी महिमाका कैसे वर्णन किया जा सकता है ? ॥ २६ ॥ हे देवेश्वर! आप अत्यन्त विस्तारवाली कुक्षिसे मुझे बाहर निकलनेका मार्ग प्रदान कीजिये। यहाँ घूमते हुए मुझे बारह वर्ष व्यतीत हो गये हैं, किंतु मैं इससे पार पानेका मार्ग नहीं देख पा रहा हूँ ॥ २७ ॥

२९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हे एकराट् गणेशजी ! मैंने आपके उदरदेशमें प्रत्येक | एवं हर्षसे समन्वित इन्द्रने सभी लोगोंके देखते हुए उन रोममें व्याप्त ब्रह्माण्डोंमेंसे पृथक्-पृथक् विभक्त एक- | गणेशजीको दण्डवत् प्रणाम किया ॥ ३५ ॥ एक ब्रह्माण्डमें चौदह भुवनोंको प्रतिष्ठित देखा है ॥ २८ ॥ | देवराज इन्द्र सभी देवताओंके सुनते हुए लीलाके मैंने अत्यन्त विस्तारवाले आपके समष्टि-स्वरूपों | लिये मनुष्यरूप धारण करनेवाले और महर्षि कश्यपके एवं व्यष्टि-स्वरूपोंके साथ ही आपके सौम्य तथा | घरमें उत्पन्न उन ब्रह्मचारी गणेशकी स्तुति करने लगे ॥ ३६ ॥ भयंकर स्वरूपोंका दर्शन किया है ॥ २९ ॥ | इन्द्र बोले—आप अनन्त शक्तिसे सम्पन्न हैं, मैंने आपके असंख्य एवं अद्भुत मुखों तथा | परमेश्वर हैं, विश्वात्मा हैं, विश्वके कारणरूप हैं, गुणोंके नयनोंका दर्शन किया है और जगत्‌को क्षुब्ध कर | स्वामी हैं, विश्वको प्रकाशित करनेवाले हैं, समस्त डालनेवाले आपके दुर्दर्श रूपोंको भी देखा है ॥ ३० ॥ | जगत्‌के लिये वन्दनीय हैं, भूत-भविष्य तथा वर्तमान— दैत्यों, दानवों, देवताओं, मनुष्यों, यक्षों, राक्षसों, | तीनों कालोंमें विद्यमान रहनेवाले हैं; ब्रह्मा, विष्णु तथा पिशाचों तथा अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्भिज्ज— | शिवके रूपमें त्रिधा विभक्त हैं और सृष्टि, पालन तथा इस प्रकारके चतुर्विध जीवोंसे परिपूर्ण आपके विराट् | प्रलय करनेवाले हैं, मैं आपको नहीं जानता ॥ ३७॥ स्वरूपोंका मैंने दर्शन किया है ॥ ३१ ॥ | आप अद्वितीय, शाश्वत, सच्चिदानन्दस्वरूप, हे जगत्स्रष्टा ! आप अपने इस विकराल महान् | सर्वाध्यक्ष, कारणातीत, ईश्वर, चराचर जीवोंके प्रयत्नके रूपको छिपा लें। हे निखिलेश्वर ! मैं तो मोहमें पड़ा था, | कारणभूत, कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले तथा सर्वत्र किंतु आपके कृपाप्रसादसे [मेरा अज्ञान दूर हो गया है | व्याप्त रहनेवाले हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ॥ ३८ ॥ तथा] मेरी स्मृति जाग्रत् हो गयी है ॥ ३२ ॥ | आप सभीके स्वामी हैं, सभी प्रकारकी विद्याओंके हे विभो! मैं शरीर, मन तथा वाणीसे आपकी | निधान हैं, सबके आत्मरूप हैं, सबको ज्ञान प्रदान शरणमें आया हूँ। हे भक्तवत्सल! आप अपना सौम्य | करनेवाले हैं, सबसे परे हैं, मन-वाणीसे न जाननेयोग्य स्वरूप दिखलाइये१ ॥ ३३ ॥ | हैं, सभीके अधिष्ठान तथा सब कुछ जाननेवाले हैं, मैं ब्रह्माजी बोले—इन्द्र इस प्रकार प्रार्थना कर ही | आपकी स्तुति करता हूँ२ ॥ ३९ ॥ रहे थे कि उन्होंने स्वयंको सभाके मध्यमें विद्यमान तथा | ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार स्तुति करके, प्रणाम उन गणेशजीको ब्रह्मचारीके रूपमें स्थित देखा ॥ ३४ ॥ | करके और उनकी पूजा करनेके अनन्तर इन्द्रने उन्हें अत्यन्त आश्चर्यचकित मनवाले होकर तथा लज्जा | अपना अंकुश, कल्पवृक्ष तथा दो सेविकाएँ प्रदान कीं १-शक्र उवाच भूभारहरणार्थं यो जातः कश्यपनन्दनः। अचिन्त्यो महिमा यस्य किमु वर्ण्यो भवेन्मम ॥ निर्गमं देहि देवेश कुक्षेरत्यन्तविस्तरात् । अदृष्टपाराद्वर्षाणि द्वादश भ्रमता मया ॥ तव कुक्षौ मयादर्शि भुवनानि चतुर्दश । स्थाने स्थाने विभक्तानि प्रतिरोमाङ्गमेकराट् ॥ समष्टिव्यष्टिरूपाणि महाविस्तारवन्ति च। दृष्टानि तव रूपाणि ससौम्यानीतराणि च ॥ अद्भुतान्यप्यसंख्यानि वक्त्राणि नयनानि च। दृष्ट्वा दुर्दर्शरूपाणि जगत्क्षोभकराणि ते ॥ दैत्यदानवपूर्णानि सुरमानववन्ति च। यक्षरक्षःपिशाचादिचतुराकरवन्ति च ॥ विकराल महारूपमुपसंहर विश्वकृत् । गतो मोहं स्मृतिर्लब्धा प्रसादान्निखिलेश्वर ॥ कायेन मनसा बुद्ध्या वाचा त्वां शरणं गतः । प्राकृतं दर्शय विभो रूपं ते भक्तवत्सल ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ११। २६–३३) २-शक्र उवाच जाने न त्वानन्तशक्तिं परेशं विश्वात्मानं विश्वबीजं गुणेशम्। विश्वाभासं विश्ववन्द्यं त्रिसत्यं त्रेधाभूतं जन्मरक्षार्तिहेतुम् ॥ एकं नित्यं सच्चिदानन्दरूपं सर्वाध्यक्षं कारणातीतमिशम्। चेष्टाहेतुं स्थावरे जङ्गमे च वाञ्छापूरं सर्वगं त्वाभिवन्दे ॥ सर्वेशानं सर्वविद्यानिधानं सर्वात्मानं सर्वबोधावभासम्। सर्वातीतं वाङ्मनोगोचरं त्वां सर्वावासं सर्वविज्ञानमीडे ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ११ । ३७–३९)