भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 282

२८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अदिति बोली—हे महामुने! मुझे इस समय किसका ध्यान करना चाहिये, कौन-सा अनुष्ठान करना चाहिये और किस मन्त्रसे करना चाहिये? वह मुझे बताइये ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यास !] अदितिके इस प्रकार पूछनेपर कश्यपमुनिने उसे [गणेशजीके] पंचाक्षर नाममन्त्रका उपदेश दिया, जो प्रारम्भमें 'ॐ'काररूप पल्लवसे युक्त, चतुर्थी विभक्तिसे समन्वित और अन्तमें 'नमः' पदवाला था। उन्होंने ध्यानसहित एवं न्यास और देवतासे युक्त पुरश्चरणकी सम्पूर्ण विधिको उसे बतलाया ॥ १९-२० ॥ हे ब्रह्मन् ! तब उसने परम प्रसन्नतापूर्वक अपने पति कश्यपजीको प्रणाम किया और आदरपूर्वक उनका पूजन किया। तदनन्तर उनसे आज्ञा लेकर वृक्षों और लताओंसे संयुक्त तथा वायु एवं अन्य उपद्रवोंसे रहित स्थानवाले वनमें तपस्याके लिये चली गयी ॥ २१-२२॥ वहाँ वह अदिति स्नान करके पवित्र वस्त्र धारणकर सुन्दर आसनपर बैठ गयी और चित्तवृत्तियोंका निरोधकर संयत मनसे देवाधिदेव गणेशजीका ध्यान करती हुई, यथाविधि न्यास करके गणेशजीका स्मरण करती हुई उनके परम मन्त्रका जप करने लगी ॥ २३-२४ ॥ अपनी मानसिक वृत्तियोंको गणेशजीके अतिरिक्त अन्य किसीमें न ले जानेवाली वह उनके दर्शनकी अभिलाषासे निराहार रहते हुए तथा वायुमात्रका भक्षण करते हुए उनके ध्यान और मन्त्रजपमें संलग्न रहती थी। उसके तपके प्रभावसे सभी प्राणी वैररहित हो गये थे। [उसके तपसे] पराभूत सभी देवता यही चिन्ता करते थे कि ये न जाने क्या प्राप्त करेंगी! ॥ २५-२६ ॥ अदितिने इस प्रकार सौ वर्षोंतक महान् तपस्या की। उसके अनेक प्रकारके कष्टों तथा स्त्री होते हुए भी उस प्रकारके धैर्यको देखकर करोड़ों सूर्योंके समान प्रभाववाले तेजःपुंज गणाधिपति भगवान् विनायक उसके सम्मुख प्रकट हो गये ॥ २७-२८ ॥ वे हाथीके सदृश मुखवाले, दस भुजाओंसे युक्त और कुण्डलोंसे सुशोभित थे। कामदेवसे भी अधिक सुन्दर शरीरवाले वे सिद्धि और बुद्धिसे समायुक्त थे। वे [कण्ठमें] वर्षाजलसे उत्पन्न मोतियोंकी माला, [हाथमें] परशु, [कमरमें] सोनेकी करधनी धारण किये हुए थे और उनके [ललाटपर] कस्तूरीका तिलक लगा हुआ था। उन्होंने नाभिदेशपर सर्प धारण कर रखा था और उन [मंगलमय प्रभु]-के [श्रीविग्रहपर] दिव्य वस्त्र सुशोभित थे ॥ २९-३० १/२॥ उस महान् तेजोरशिको अपने सम्मुख देखकर अदिति भयभीत हो काँपने लगीं, उन्होंने अपने नेत्र मूँद लिये और वे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ३११/२॥ जप और ध्यान भूलकर वे अपने मनमें यह चिन्ता करने लगीं कि मेरे सम्मुख यह कौन आ गया? यह क्या अद्भुत घटना घटी है ! मैं अपना जप और ध्यान भी भूल गयी हूँ! कहीं ये वही परमेश्वर तो नहीं हैं, [जिनका मैं ध्यान करती हूँ] अपने महान् तेजसे दिशाओंको आलोकित करते हुए मुझे वर देनेके लिये आये हैं—इस प्रकार जब वे व्याकुल थीं, तभी भगवान् गणेश उनसे बोले— ॥ ३२-३४॥ विनायक बोले- हे देवि ! तुम दिन-रात मनमें जिसका ध्यान करती हो, मैं वही हूँ। तुम्हारी निष्ठा और दुष्कर तपस्या देखकर तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। हे सुव्रते ! तुम्हारे इस तपसे मैं सन्तुष्ट हूँ, तुम्हारे हृदयमें जिन-जिन वरोंकी कामना हो, वे मुझसे माँग लो, मैं उन्हें दूँगा ॥ ३५-३६ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [ हे व्यास !] तब उन गणेशजीके वचन सुनकर अदिति स्वस्थ हुई। विनम्र भाववाली उसने दोनों हाथ जोड़कर विनायकको प्रणाम किया और जो मनसे अतर्क्य हैं, ऐसे उन देवाधिदेव गणेशजीसे वह कहने लगी - ॥ ३७१/२॥ अदिति बोली- हे अखिलेश्वर! आप ही इस विश्वकी संरचना करते हैं, इसका पालन करते हैं और इसका संहार करनेवाले भी आप ही हैं। आप नित्य हैं, निरंजन हैं, भगवान् हैं, निर्गुण हैं, अहंकारसे रहित हैं, विविध रूप धारण करनेवाले हैं, शाश्वत हैं, योगद्वारा जाननेयोग्य हैं, तथा अखिल मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाले हैं ॥ ३८-३९ ॥