श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 283, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०६ ] * दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीके पास जाना * २८१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हे विनायक! इस समय आप सौम्य स्वरूप करनेके लिये वनमें गयी और मैंने वहाँ महान् तप किया। धारणकर वर प्रदान करें। हे देवेश्वर! यदि आप तदनन्तर वे भगवान् गजानन महान् प्रकाशपुंजके रूपमें मुझपर प्रसन्न हैं और यदि आप वर देना चाहते हैं, मुझे वर प्रदान करनेके लिये आये। उनका वह स्वरूप तो हे भगवन्! आप मेरी पुत्रताको प्राप्त करें, इसीसे देखकर मैं भयभीत हो गयी, तब मैंने उन विनायकदेवकी मैं कृतकृत्य होऊँगी। तभी मैं आपकी सेवा कर प्रार्थना की॥ ४४-४५॥ पाऊँगी, तभी सज्जनोंकी रक्षा होगी और तभी दुष्टजन हे मुनिश्रेष्ठ! उन्होंने मुझे विविध प्रकारके वर विनाशको प्राप्त करेंगे। साथ ही लोगोंकी कृतकृत्यता प्रदान किये। तदनन्तर वे गजानन 'तुम्हारे पुत्रके रूपमें भी होगी॥ ४०-४१ १/२॥ जन्म ग्रहण करूँगा'-ऐसा कहकर अन्तर्धान हो गये। विनायक बोले-मैं तुम्हारे पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण हे मुने! तब मैं आपके प्रभावसे सफल मनोरथवाली करूँगा, साधुजनोंकी रक्षा करूँगा, दुष्टोंका संहार करूँगा होकर अपने आश्रममें आ गयी॥ ४६ १/२॥ और तुम्हारी भी सम्पूर्ण मनोकामनाओंको पूर्ण ब्रह्माजी बोले-हे मुनीश्वर! इस प्रकार उसके करूँगा॥ ४२ १/२॥ द्वारा कथित वरदान-सम्बन्धी अमृतमय वचनोंको सुनकर ब्रह्माजी बोले-ऐसा कहकर देवाधिदेव वे विनायक वे मुनिश्रेष्ठ कश्यपजी अत्यन्त प्रसन्न हुए और अत्यन्त अन्तर्धान हो गये और वह अदिति महर्षि कश्यपके पास प्रीतिके साथ उन्होंने देवी अदितिके साथ रमण किया। गयी और सारा वृत्तान्त उन्हें बताया॥ ४३ १/२॥ उस समय वे दोनों वैसे ही आनन्दित हुए जैसे कि अदिति बोली-आपकी आज्ञासे मैं तपस्या अमृतपानसे आनन्दकी प्राप्ति होती है॥ ४७-४८॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'आश्रमाभिगम' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५॥ छठा अध्याय दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीके पास जाकर अपनी व्यथा बताना, ब्रह्मादि देवताओंद्वारा परमात्मा गणेशसे अवतार धारण करनेकी प्रार्थना करना, देवी अदिति और कश्यपके पुत्ररूपमें गणेशजीका अवतरण, कश्यपद्वारा उनके जातकर्मादि संस्कार करना और 'महोत्कट' यह नाम रखना भृगु बोले-दुष्टोंके अत्याचारसे अत्यन्त पीड़ित वैसा आप करें। अन्यथा पर्वतों तथा वनोंसे समन्वित मैं वह पृथ्वी वेश बदलकर कमलके आसनपर विराजमान पृथ्वी रसातलको चली जाऊँगी॥ ४॥ रहनेवाले ब्रह्माजीके पास गयी और दोनों हाथ जोड़कर भृगु बोले-पृथ्वीका यह कथन सुनकर ब्रह्माजी दयनीय अवस्थावाली वह पृथ्वी पद्मोद्भव ब्रह्माजीसे उससे बोले-'मैं, सभी लोकपाल, इन्द्र आदि देवता तथा बोली॥ १ १/२॥ ऋषिगण भी स्वधाकार-स्वाहाकारसे रहित होकर अत्यन्त भूमि बोली-मैं अत्यन्त दीन और यज्ञ, व्रत दुखी हैं। हम सभी उसी प्रकार अपने स्थानसे भ्रष्ट, आदिसे रहित हो गयी हूँ। हे ब्रह्मन्! ऋषिगणोंके साथ मन्त्रोंसे रहित तथा अपने आचार-विचारसे रहित हो गये इन्द्र आदि सभी देवता अपने-अपने स्थानसे च्युत हो गये हैं, जैसे कि प्रलयके समय हो जाते हैं॥ ५-६॥ हैं। दैत्योंके भारसे अत्यन्त संतप्त मैं आप ब्रह्माजीकी इसलिये हम सभी मिलकर देवाधिदेव भगवान् शरणमें आयी हूँ॥ २-३॥ गणेशकी प्रार्थना करें। वे ब्रह्मरूप हैं, निराकार हैं तथा जिस किसी उपायसे उन दुष्ट दैत्योंका विनाश हो, जगत्के कारणका भी कारण हैं। सौभाग्यसे यदि वे