श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 284, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
लोगोंके समक्ष साकाररूप धारणकर प्रकट होंगे तो हे वसुन्धरे! तभी सब लोगोंका और तुम्हारा भी कल्याण होगा' ॥ ७-८ ॥ भृगु बोले-ऐसा कहकर ब्रह्मा आदि देवताओं और ऋषिगणोंने बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर निराकार तथा साकाररूप उन भगवान् गणेशका स्तवन किया ॥ ९ ॥ देवता तथा ऋषि बोले-सम्पूर्ण लोकोंके स्वामिन् हे गणपति! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सम्पूर्ण लोकोंके धाम! आपको नमस्कार है, नमस्कार है, समस्त लोकोंकी सृष्टि करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ १० ॥ देवताओंके शत्रुओंका विनाश करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। भक्तोंके बन्धनको काटनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। अपने भक्तोंका पालन-पोषण करनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। स्वल्प भक्तिसे भी सन्तुष्ट हो जानेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ११ ॥ हे भगवन्! आप निराकार हैं, नित्य मायासे रहित हैं, परात्पर ब्रह्ममय स्वरूपवाले हैं, क्षर तथा अक्षरसे अतीत हैं, गुणोंसे रहित हैं और दीनोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ १२ ॥ सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले आप निरामयको नमस्कार है। सम्पूर्ण दैत्योंका विदारण करनेवाले निरंजनको नमस्कार है। हे परोपकार करनेवाले! आप नित्य, सत्य स्वरूपको नमस्कार है। सर्वत्र समान भाव रखनेवाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है* ॥ १३ ॥ अत्यन्त दुःखसे दुखित तथा व्याकुल वे सभी मुनिगण तथा देवता इस प्रकार स्तुति करके उन देवाधिदेव भगवान् विनायकसे पुनः बोले- ॥ १४ ॥ [हे भगवन्!] सम्पूर्ण जगत्में हाहाकार हो रहा है। सभी स्वधाकार तथा स्वाहाकारसे रहित हो गये हैं। हम लोग मेरुपर्वतकी गुफामें उसी प्रकार रह रहे हैं, जैसे वन्य पशु वहाँ रहते हैं ॥ १५ ॥ अतः हे विश्वम्भर! इस समय आप उस महादैत्यका विनाश करें। इस प्रकारसे जब वे स्तुति कर रहे थे, उसी समय आकाशवाणीने कहा- ॥ १६ ॥ 'इस समय महर्षि कश्यपजीके घरमें भगवान् गणेशजी अवतार ग्रहण करेंगे। वे अद्भुत कर्म करेंगे और आप लोगोंको अपना-अपना पद प्रदान करेंगे। वे दुष्टोंका विनाश तथा सज्जनोंकी रक्षा करेंगे' ॥ १७१/२ ॥ भृगु बोले-उस आकाशवाणीको सुनकर ब्रह्माजी पृथ्वीसे बोले ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी बोले-हे देवि! हे धरे! तुम आकाशवाणीपर विश्वास करके स्वस्थ हो जाओ। तुम्हारे लिये सभी देवता मृत्युलोकमें अवतार ग्रहण करेंगे। वे गणेशजी अवतार धारणकर तुम्हारे महान् भारको दूर करेंगे ॥ १९१/२ ॥ भृगु बोले-उन ब्रह्माजीद्वारा इस प्रकार कही गयी वह पृथ्वी अत्यन्त स्वस्थ तथा प्रसन्न मनवाली हो गयी और अपने स्थानको चली गयी ॥ २०१/२ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर देवी अदितिने गर्भ धारण किया। उसका वह गर्भ उसी प्रकार वृद्धिको प्राप्त होने लगा, जैसे चन्द्रमा प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होता है। नौ मास पूर्ण हो जानेपर उसने श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दिया ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजीके पूर्वकथनानुसार वह बालक कश्यपनन्दन नामसे प्रसिद्ध हुआ। [जन्मके समय] वह दस भुजाओंवाला था, महान् बलसे सम्पन्न था, उसके कानोंमें कुण्डल सुशोभित हो रहे थे, ललाटपर कस्तूरीका
- देवर्षय ऊचुः नमो नमस्तेऽखिललोकनाथ नमो नमस्तेऽखिललोकधामन्। नमो नमस्तेऽखिललोककारिन् नमो नमस्तेऽखिललोकहारिन्॥ नमो नमस्ते सुरशत्रुनाश नमो नमस्ते हतभक्तपाश। नमो नमस्ते निजभक्तपोष नमो नमस्ते लघुभक्तितोष॥ निराकृते नित्यनिरस्तमाय परात्परब्रह्ममयस्वरूप। क्षराक्षरातीत गुणैर्विहीन दीनानुकम्पिन् भगवन्नमस्ते॥ निरामयायाखिलकामपूर निरञ्जनायाखिलदैत्यदारिन्। नित्याय सत्याय परोपकारिन् समाय सर्वत्र नमो नमस्ते॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ६।१०-१३)