श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 285, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंHere is the complete and accurate transcription of the Devanagari text from the image, line by line with line markers.
क्री०ख०-अ०६ ] * दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका ब्रह्माजीके पास जाना * २८३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिलक लगा हुआ था। मस्तक मुकुटसे शोभायमान था, वह सिद्धि तथा बुद्धि नामक पत्नियोंसे समन्वित था, कण्ठमें धारण की हुई रत्नमालासे मण्डित हो रहा था, चिन्तामणिसे वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा था, उसके अधर जपापुष्पके समान अरुणवर्णके थे, नासिका उन्नत थी, वह सुन्दर भृकुटी तथा ललाटवाला था, दीप्तिमान् दाँतोंसे प्रकाशमान था, उसने अपने देहकी आभासे समस्त अन्धकारको दूर कर दिया था, दिव्य वस्त्रोंको धारण किये था और उसका स्वरूप अत्यन्त मंगलमय था। इस प्रकारके बालकको देखकर दोनों माता-पिता— अदिति और कश्यप उस समय उसके तेजसे अभिभूत दृष्टिवाले हो गये और कुछ भी देखनेमें समर्थ न हो सके। तब उन्होंने बलपूर्वक आँखोंको खोलकर उस उत्तम रूपको देखा। उस समय वे दोनों अत्यन्त आनन्दित हुए। तदनन्तर वह बालरूप गणपति उनसे इस प्रकार बोला— ॥ २३–२७१/२॥ बालक बोला—हे मातः ! चूँकि आपने पूर्वकालमें एक हजार वर्षतक तपस्या करते हुए जिस स्वरूपमें मेरा ध्यान किया और मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त करनेका वरदान माँगा था, तब उस समय मैंने आपको विविध वर प्रदान किये थे, और अब इस समय मैंने ही आपके पुत्ररूपमें जन्म लिया है। वही अब मैं पृथ्वीके भारका हरण करूँगा, आप दोनोंकी सेवा करूँगा, ब्रह्मा आदि देवताओंको पुनः उनके पदपर प्रतिष्ठित कराऊँगा और दुष्ट दैत्योंका वध करूँगा ॥ २८–३०॥ भृगु बोले—इस प्रकारके उसके वचनोंको सुनकर उन दोनोंके नेत्र आनन्दाश्रुओंसे भर गये। जिस प्रकार चकवा-चकवी आकाशमें सूर्यको देखकर आनन्दित हो उठते हैं, वैसे ही वे दोनों अति प्रसन्न हो गये ॥ ३१ ॥ तब वे दोनों बोल उठे—‘निश्चित ही हम दोनोंके अद्भुत पुण्यका उदय हुआ है, जिसके फलस्वरूप आप परमात्मा विनायक हमारे पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ ३२ ॥ हमारा कुल धन्य हो गया, हमारे माता-पिता धन्य हो गये, हमारा जन्म लेना सफल हो गया और हमारा ज्ञान धन्य हो गया, जो कि सम्पूर्ण चराचरके गुरु, सबके साक्षी, निराकार, नित्य आनन्दमय तथा सत्यस्वरूप भगवान् गणेश हमारे मंगलमय पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए हैं ॥ ३३१/२ ॥ जिसमें यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सूत्रमें पिरोये गये मणिगणोंकी भाँति व्याप्त है, जो सर्वत्र व्याप्त तथा सब कुछ जाननेवाला है, वही आप हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है। आपका यह रूप अत्यन्त दिव्य है, इस समय इसको ऐन्द्रजालिककी भाँति आप छिपा लें और सामान्य प्राकृत स्वरूप धारण करें। आगे जिस रूपके द्वारा आपको जैसा कर्म करना होगा, वैसा रूप आप धारण करें' ॥ ३४–३६ ॥ ऐसा वचन सुनकर गणेशजीने अपना वह दिव्य रूप छिपा लिया और दो हाथोंवाले होकर वे सामान्य बालककी भाँति भूमिपर लोटकर रुदन करने लगे ॥ ३७ ॥ उनके रुदनकी ध्वनिसे उस समय रसातल, आकाश, दिशाएँ, विदिशाएँ निनादित हो उठीं। उस रुदनके शब्दको सुनकर वन्ध्या स्त्रियाँ गर्भवती हो गयीं, शुष्क वृक्ष हरे-भरे हो गये, देवताओंके साथ इन्द्र अत्यन्त हर्षित हो उठे और दैत्योंको अत्यन्त भय हो गया, उस समय धरतीकी वृद्धि होने लगी। उस समय महर्षि कश्यपजीने ब्राह्मणोंके साथ बालकका जातकर्म-संस्कार सम्पन्न किया। उस बालकको मधु तथा घृतका प्राशन कराके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसका स्पर्श किया ॥ ३८–४० ॥ मन्त्रोच्चारपूर्वक महर्षि कश्यपने बालकको माता अदितिके स्तनोंका पान कराया। बालकका नालच्छेदन करके उसे नहलाकर अदितिने बालकको सुला दिया ॥ ४१ ॥ उस समय कश्यपमुनिने ब्राह्मणोंको विविध प्रकारके दान दिये। देवी अदितिने बड़ी प्रसन्नताके साथ सातवें दिन प्रत्येक घरमें इक्षुसार (गुड़ आदि) और पाँचवें दिन भेंट भिजवायी। ग्यारहवें दिन पिता कश्यपने ‘महोत्कट' यह नाम उस बालकका रखा। वह बालक प्रतिदिन उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होता है। चूँकि वह सभीसे अत्यन्त उत्कट (पराक्रमशाली) था, इसीलिये वह बालक गणेश महोत्कट— इस नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ ॥ ४२–४४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'विनायकका आविर्भाव' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥