श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सातवाँ अध्याय वसिष्ठ आदि ऋषियोंका बालक महोत्कटका दर्शन करनेके लिये कश्यपजीके आश्रममें आना, विरजा राक्षसीद्वारा बालक महोत्कटका अपहरण, बालकका विरजा राक्षसीका उद्धारकर अपने धाम भेजना, कश्यपद्वारा अदितिको बालककी रक्षा करते रहनेका आदेश देना
[Left Column] ब्रह्माजी बोले-महोत्कट नामक पुत्रके जन्मका समाचार सुनकर वसिष्ठ, वामदेव आदि मुनिगण उसके दर्शनके लिये वहाँ आये। वे महर्षि कश्यपके घरमें गये। कश्यपने आसन, पाद्यजल तथा अर्घ्य देकर उनकी पूजा की और दक्षिणा तथा गौ प्रदान की ॥ १-२ ॥ तदनन्तर महर्षि कश्यप दोनों हाथ जोड़कर कहने लगे-'आज मैं धन्य हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, मेरी तपस्या सफल हो गयी, जो कि इन्द्र तथा विष्णुद्वारा पूज्य आपके चरणकमलोंका मुझे दर्शन हुआ है। हे तपोधनो ! क्या मैं आप लोगोंके आगमनका हेतु जान सकता हूँ ?' तब उन मुनियोंमें सर्वश्रेष्ठ वसिष्ठजीने उन मुनि कश्यपसे कहा ॥ ३-४ ॥ वसिष्ठ बोले-हे ब्रह्मन् ! हम लोगोंने देवर्षि नारदजीके मुखसे सुना है कि आपको 'महोत्कट' नामक पुत्रकी प्राप्ति हुई है। उसके दर्शनके लिये ही हम लोग आपके पास आये हैं, इसके अतिरिक्त और कोई दूसरा प्रयोजन नहीं है ॥ ५ ॥ ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर देवी अदिति शीघ्र ही उस बालकको देखनेके लिये उनके पास ले आयीं। तब वसिष्ठ उन मुनि कश्यपसे बोले- 'यह महोत्कट उत्कट कर्मोंको करेगा। ये बत्तीस शुभ लक्षणोंसे युक्त महान् तेजस्वी परमात्मा विनायक ही तुम्हारे पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए हैं। इसीलिये इसके दोनों चरणतल रक्तवर्णके हैं और ध्वज तथा अंकुशके चिह्नसे समन्वित हैं ॥ ६-७ १/२ ॥ हे महामुने ! इसके समक्ष अनेक विघ्न उपस्थित होंगे, किंतु वे सब विनष्ट हो जायँगे। तथापि इस बालककी प्रत्येक क्षण रक्षा करनी चाहिये' ॥ ८ १/२ ॥ तदनन्तर महर्षि वसिष्ठने उन कश्यपनन्दन गणेशकी भलीभाँति पूजा की और सभी ऋषियोंके साथ उनसे
[Right Column] प्रार्थना की कि आप पृथ्वीके भारको दूर करें, हे देव ! आप सज्जनोंकी रक्षा एवं दुष्ट दानवोंका विनाश करें ॥ ९-१० ॥ तदनन्तर सभी मुनिगण उसे प्रणामकर जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। तब वह बालक 'कश्यपनन्दन' इस नामसे प्रसिद्ध हो गया। एक दिनकी बात है, प्रातःकालके समय जब मुनि कश्यप स्नानके लिये गये तो माता अदितिने अपने पुत्रको बाहर सुला दिया और वे अपने घरके अन्दर चली आयीं ॥ ११-१२ ॥ वे यज्ञके लिये सामग्रियोंको एकत्र करनेमें लग गयीं। उसी समय एक निशाचरी वहाँ आ पहुँची। उसका नाम विरजा था। उसके मुख तथा नेत्र अत्यन्त विशाल थे, हलके समान उसके दाँत थे, गुफाके समान नासिका थी; वह अपने पैरोंसे पर्वतोंको भी चूर-चूर बना देनेवाली थी, उसके स्तन अत्यन्त दीर्घ थे, जिह्वा लपलपा रही थी। उसका भगप्रदेश गोपुरके समान विशाल था। सब कुछ भक्षण करनेवाली उस भूखी निशाचरीने उस बालकको पकड़ लिया और पके हुए केलेके फलके समान शीघ्र ही उसका भक्षण कर गयी ॥ १३-१५ ॥ फिर वह धीरेसे आकाशकी ओर चली गयी तथा पानी पीनेके लिये जमीनपर आयी। उसने बहुत सारा जल पिया, फिर वह विशाल उदरवाली निशाचरी भूमिपर गिर पड़ी। उस समय वह उसी प्रकार महान् मूर्च्छाको प्राप्त हो गयी, जैसे कि सर्पका डँसा हुआ व्यक्ति मूर्च्छित हो जाता है। वह महान् उदरपीड़ासे युक्त स्त्रीकी भाँति भूमिपर लोटने लगी ॥ १६-१७ ॥ 'छोड़ो-छोड़ो' इस प्रकारसे कहती हुई वह निशाचरी एक पग चलनेमें भी असमर्थ हो गयी। हाहाकार करती हुई वह अपनी छाती, सिर तथा मुख पीटने लगी ॥ १८ ॥