श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 287, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०७ ] * वसिष्ठ आदि ऋषियोंका बालक महोत्कटका दर्शन करना * २८५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] तदनन्तर कश्यपनन्दन वह बालक गणेश उसके शरीरके अन्दर रहकर ही बढ़ने लगा और उसके उदरको चीरकर उसके वक्षपर बैठ गया ॥ १९ ॥ जिस प्रकार जालको फाड़कर महान् मत्स्य बाहर निकल आता है, उसी प्रकार बालक गणेश उस निशाचरीके उदरको चीरकर बाहर निकला। तब उस दुष्ट निशाचरीने महान् चीत्कार करते हुए प्राणोंका परित्याग कर दिया। गिरते हुए उसके शरीरने पाँच योजन दूरतकके वृक्षोंको धराशायी कर दिया। उस विरजा निशाचरीको बालक गणेशने पवित्र बनाकर अपने धाम भेज दिया ॥ २०-२१ ॥ ज्ञान देनेवाले और मोक्ष प्रदान करनेवाले कृपासिन्धु जगदीश्वरके द्वारा दर्शन दिये जानेपर तथा उनके द्वारा स्पर्श किये जानेपर मनुष्योंका इस संसार-सागरमें पुनरागमन कैसे हो सकता है ? ॥ २२ ॥ इधर अपने घरके कार्योंको पूरा करके जब अदिति बाहर आयीं तो उन्होंने बालकको नहीं देखा, तब वे अत्यन्त रुदन करने लगीं। उन्होंने घर-घरमें जाकर देखा, लेकिन कहीं भी बालकको नहीं पाया। तब वे हाहाकार करती हुई भूमिपर गिर पड़ीं ॥ २३-२४ ॥ उनके उच्च स्वरके रुदनको सुनकर अन्य स्त्रियाँ भी रोने लगीं। सभी लोग आश्चर्यचकित और भयभीत हो गये। अदितिका मुख सूख गया, दीन होकर वे बार-बार विलाप करने लगीं। वे अपने मुख तथा आँसुओंसे पूरित काजल लगे हुए अपने नेत्रोंको पोंछने लगीं ॥ २५-२६ ॥ [वे बोल उठीं-] कल्पवृक्षके समान [मुझे] प्राप्त हुए मेरे बालकका किसने हरण कर लिया है, क्या जगदीश्वरका दिया गया वरदान कभी व्यर्थ हो सकता है? भगवान् गणेशजीद्वारा दी गयी मेरी निधिको किस
[दायाँ स्तम्भ] दुरात्माने चुरा लिया, विज्ञानरूपी समुद्रको पाकर भी मैं आज कैसे अत्यन्त मूर्ख हो गयी हूँ? ॥ २७-२८ ॥ सुवर्णके पर्वतको पाकर भी आज मैं कैसी दरिद्र हो गयी हूँ? इस प्रकार विलाप करती हुई वे अदिति अपनी छाती, सिर तथा मुखको पीटने लगीं ॥ २९ ॥ वे अपने आश्रमसे बाहर आ गयीं तथा एक कोशकी दूरीपर उन्होंने एक निशाचरीको भूमिपर पड़ी हुई देखा और यह भी देखा कि उस निशाचरीके वक्षपर वह बालक बैठा हुआ है ॥ ३० ॥ वह क्रीडा कर रहा था, उसके मुख-मण्डलपर मुसकान छायी थी, वह जगे हुए [दुग्ध] कामी [शिशु]- की भाँति प्रतीत हो रहा था, अदितिने दौड़कर उस बालकको उठाया और उसको अपनी छातीसे लगाकर उसे चूमने लगीं। आनन्दमें निमग्न होकर वे बोल पड़ीं- 'आज मेरा महान् सौभाग्य है, जो दैवयोगसे इस राक्षसीके भयसे यह बालक मुक्त हो गया' ॥ ३१-३२ ॥ उस बालकसहित स्वयं भी स्नान करके वे अपने आश्रम-परिसरमें आयीं और सम्पूर्ण वृत्तान्त कश्यपजीको बतलाया, वह सब सुनकर वे मुनि बोले- ॥ ३३ ॥ हे प्रिये ! भूत और भविष्यकी विशेष जानकारी रखनेवाले मुनियोंने जो भी कहा है, उनके आशीर्वादपूर्ण वचनोंसे वह सब आज सत्य हुआ है। सब कुछ भक्षण कर जानेवाली उस निशाचरीसे यह बालक किसी जन्मान्तरीय पुण्यके फलस्वरूप ही जीवित बचा है। तदुपरान्त इस निमित्त कश्यपमुनिने बालकका रक्षाविधान किया और अनेक प्रकारके दान दिये ॥ ३४-३५ ॥ बालकके निमित्त स्वस्तिवाचनपूर्वक शान्ति- पाठ करवाया और अदितिको यह भी बताया कि क्षणभरके लिये भी इस बालकको अकेला नहीं छोड़ना ॥ ३६ ॥
[पाद-टिप्पणी / समापन] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'विरजा राक्षसी-मोक्षण' नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥