श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- आठवाँ अध्याय गणेशजीकी बाललीलाके सन्दर्भमें उद्धत तथा धुन्धुर नामक दैत्योंके वधकी कथा और चित्र नामक गन्धर्वके उद्धारका आख्यान ब्रह्माजी बोले—अत्यन्त पराक्रमशालिनी उस विरजा नामक राक्षसीके वधका समाचार सुनकर उद्धत तथा धुन्धुर नामक महान् बलसे सम्पन्न दो राक्षस महात्मा कश्यपजीके आश्रममण्डलमें आये। तोतेका रूप धारण किये हुए उन दोनोंको देखकर बालक गणेश दूध पीना छोड़कर माता अदितिसे बोले—'इन दोनों तोतोंको लाकर मुझे खेलनेके लिये दो।' तब माता उनसे बोली— 'आकाशमें उड़नेवाले ये दोनों पक्षी भूमिपर स्थित मुझ स्त्रीके द्वारा पकड़े जानेयोग्य नहीं हैं ॥ १-३ ॥ फिर भी यदि मैं इन्हें पकड़ने जाऊँगी तो ये उड़कर आकाशमें चले जायँगे।' तब बालक गणेशने माताकी गोदसे उतरकर उन दोनोंको बाज पक्षीकी भाँति झपटकर पकड़ लिया। उन पक्षियोंने अपने पंखोंके आघातसे तथा चोंचके द्वारा बालकको बहुत मारा, किंतु उस बालकने उन्हें बलपूर्वक धरतीपर पटक दिया ॥ ४-५ ॥ तब उन दोनोंने अपना राक्षसरूप धारणकर प्राणोंका परित्याग कर दिया। उनकी देहके भारसे भयभीत पृथ्वी अत्यन्त विह्वल हो गयी। उनके शरीर दो कोशकी दूरी तकके वृक्षोंको भीषण शब्दपूर्वक तोड़ते हुए गिर पड़े। उन दोनों राक्षसोंको देखकर अदितिने झटसे अपना बालक पकड़ लिया ॥ ६-७ ॥ कश्यपमुनिने उन राक्षसोंके विशाल शरीरको देखा। लोगोंने उनके शरीरोंको काटकर लकड़ी एकत्रकर चिता बनाकर उनका दाह किया। मुनिने बालकके अभ्युदयकी कामनासे अद्भुत शान्ति की, उस शिशुके पराक्रमको देखकर वे महान् आश्चर्य करने लगे ॥ ८-९ ॥ उस समय पुत्रको गोदमें लिये हुई अदितिसे वे परम प्रसन्न होकर बोले—'देवगण तथा देवराज इन्द्र भी जिन राक्षसराजोंको नहीं मार सके, तोतेका रूप धारण करनेवाले उन दोनोंको हमारे इस शिशुने खेल-खेलमें ही मार डाला।' पुनः अदितिपर क्रुद्ध होकर बोले—'तुमने इस बालकको अकेले क्यों छोड़ दिया ? ॥ १०-११ ॥ आज जगदीश्वरने ही इस बालककी रक्षा की है, इसकी आयु कितनी है—यह मुझे ज्ञात नहीं है। हे पतिव्रते ! बिना भूले हुए इस बालककी तुम्हें प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी है ॥ १२ ॥ पर्वतके समान विशाल इन दोनों राक्षसोंको इसने कैसे मारा, निश्चित ही यह राक्षसोंके रहनेका स्थान है, यहाँ यह मेरा बालक कैसे जीवित रह सकेगा ?' ॥ १३ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर वे दोनों दम्पती आश्चर्यचकित हो गये। उस प्रकारके बालकको स्नान कराकर उन दोनोंने स्वयं भी स्नान किया, और वहींपर सो गये ॥ १४ ॥ चार वर्षकी अवस्थामें वह बालक अपने आश्रमके बाहर कुछ दूरीपर स्थित एक सरोवरके पासमें गया। वह सरोवर कमलके पुष्पोंसे समन्वित था, उसमें अनेक मगर तथा मत्स्य रहते थे। उस सरोवरके आस-पास तमाल, सरल, जम्बू, आम्र तथा कटहलके अनेक वृक्ष थे। विविध प्रकारके वृक्षों तथा लताओंसे वह घिरा हुआ था और अनेक प्रकारके फलों तथा पुष्पोंसे सुशोभित था। नाना प्रकारके पक्षीगण वहाँ स्थित थे, अनेक मुनिगणोंसे समन्वित था। उस सरोवरका जल उसी प्रकार अत्यन्त निर्मल तथा रमणीय था, जैसे कि सत्पुरुषोंका अन्तःकरण निर्मल होता है ॥ १५-१७ ॥ उस दिन सोमवती अमावास्या और व्यतीपात योग था, इसलिये देवी अदिति उस सरोवरमें स्नान करने आयीं, वे अपने बालकको सरोवरके तटपर बैठाकर, कण्ठतकके पानीमें अन्दर गयीं। माताके पास जानेके लिये वह बालक भी उछलकर जलके मध्यमें गिर पड़ा। वह जलमें क्रीडा कर ही रहा था कि उसी समय एक