श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 289, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०८ ] * गणेशजीकी बाललीलाके सन्दर्भमें उद्धत तथा धुन्धुर नामक दैत्योंके वधकी कथा * २८७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] मगरमच्छने उसको पकड़ लिया ॥ १८-१९ ॥ जलके मध्यमें स्थित माता अदिति 'दौड़ो-दौड़ो'— इस प्रकारसे चिल्लाने लगीं, बालकको पकड़नेके लिये वे आयीं, किंतु वे उसे पकड़ न सकीं ॥ २० ॥ वह मगरमच्छ बालकको जलके अन्दर खींचता था और माता बालकको बाहरको खींचती थीं। तदनन्तर वह मगर बालकसहित माँको बहुत दूरतक पानीके अन्दर खींच ले गया ॥ २१ ॥ तब वह बालक अपनी मातासे बोला—'इस मगरसे आप मुझ पुत्रको छुड़ायें नहीं। मैं तुम्हारे साथ सदैव रहूँगा, मेरी मृत्यु नहीं होगी, मैं बलवान् हूँ' ॥ २२ ॥ बालकसहित उस माता अदितिको आकण्ठ जलमें निमग्न और अत्यन्त व्याकुल देखकर उसको बलपूर्वक निकालनेके लिये शिष्यगण उछलकर जलमें कूद पड़े। किंतु उस बलवान् मगरमच्छसे छुड़ानेमें वे भी समर्थ न हो सके। तब बालकने अपने अत्यन्त पराक्रमका प्रदर्शन किया और खेल-खेलमें उस मगरमच्छको जलसे बाहर भूमिपर फेंक दिया। जैसे वायु पके हुए फलको गिरा डालती है, और जैसे बालक पत्थरके छोटे टुकड़ेको फेंक डालता है, वैसे ही बालक गणेशने मगरको फेंक दिया ॥ २३–२५ ॥ उसका एक योजन विस्तारवाला अद्भुत शरीर चूर-चूर होकर जमीनपर गिरा हुआ दिखायी दिया। वह निश्चेष्ट तथा प्राणशून्य हो गया था। उसे निष्प्राण देखकर बालक तथा शिष्योंसहित अदिति अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त हुईं, तदनन्तर दिव्य शरीरवाला होकर वह चित्र नामक गन्धर्व उससे बोला— ॥ २६-२७ ॥ हे गजानन ! मैं पूर्वकालमें गन्धर्वोंका राजा था। मेरे विवाहके समय सभी गन्धर्व मेरे घर आये हुए थे ॥ २८ ॥ मैंने उन सबकी भलीभाँति पूजा की, किंतु वैवाहिक कार्योंको करते हुए मैं महर्षि भृगुकी पूजा न कर पाया। इससे मुनि मेरे ऊपर कुपित हो गये ॥ २९ ॥
[दायाँ स्तम्भ] उन्होंने मुझे शाप दे डाला कि तुम सरोवरके मध्यमें रहनेवाले विशाल मगरमच्छ हो जाओगे। मुनिके शापको सुनकर मैंने उस शापसे मुक्ति दिलानेकी प्रार्थना की ॥ ३० ॥ तब मुनि बोले कि जब कश्यपनन्दन गजानन तुम्हारा स्पर्श करेंगे, तब तुम अपने पूर्व शरीरको प्राप्त कर लोगे। इस समय मैंने आपको भलीभाँति जान लिया है, आप गजानन ही बालकरूप धारण किये हुए हैं। आप ही सम्पूर्ण जगत्के स्वामी, कर्ता, रक्षक तथा संहारकर्ता हैं ॥ ३१-३२ ॥ आप निर्गुण, अहंकाररहित, सत्, असत् एवं परम कारण हैं, आप विविध अवतार धारणकर भक्तोंकी रक्षा करते हैं और दुष्टोंका संहार करते हैं ॥ ३३ ॥ आप सर्वत्र व्याप्त हैं, पूर्णकाम हैं और अनेकों ब्रह्माण्डोंके एकमात्र स्वामी हैं। आप मुनियोंके लिये भी अगम्य और मन तथा वाणीसे परे हैं ॥ ३४ ॥ इस प्रकार स्तुति करके तथा उन्हें प्रणाम करके और उन बालरूपधारी गजाननका पूजन करके उसने उनकी बार-बार प्रदक्षिणा की, फिर वह चला गया ॥ ३५ ॥ अदितिने बालकको गोदमें लिया और उसे प्यार करके अपना स्तनपान कराने लगीं। अदितिके मनमें बड़ा ही आश्चर्य हुआ, तदुपरान्त वे आनन्दित होकर अपने भवनको गयीं ॥ ३६ ॥ वहाँ उन्होंने महर्षि कश्यपको प्रणामकर सम्पूर्ण वृत्तान्त उन्हें बतलाया। आश्चर्यचकित होकर मुनि कश्यपने अदितिसे कहा—'ये तो परमेश्वर हैं। मैं समझता हूँ कि लीला करनेके लिये ही इन्होंने मनुष्यशरीर धारण किया है। ये देवताओं तथा असुरोंके लिये भी अशक्य प्रतीत होनेवाले और भी अन्य अद्भुत कर्मोंको करेंगे, जिन्हें हम इन्हींके कृपा- प्रसादसे देख पायेंगे। अतः अपना कल्याण चाहनेवालोंको चाहिये कि इन गणेशजीकी वे दृढ़तापूर्वक भक्ति करें' ॥ ३७–३९ ॥
[पाद-टिप्पणी/समापन] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'नक्र [रूपधारी चित्र गन्धर्व]- की मुक्तिका वर्णन' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥