श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 281, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०५] * अदितिके तपसे प्रसन्न गणेशजीकी उनके पुत्ररूपमें अवतरित होनेकी स्वीकृति * २७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रकारका प्रश्न किये जानेपर चतुर्मुख ब्रह्माजीने व्यासजीके | जिस अस्त्र-शस्त्रसे मारा था तथा ब्रह्मा [आदि प्रति परम प्रसन्नतापूर्वक जो कथा कही थी, उसे ही मैं | देवताओं]-ने अपने-अपने लोकोंको जिस प्रकार [पुनः] तुमसे कहता हूँ॥ २२॥ | प्राप्त किया था और देवताओंको भी अपने अधिकारोंकी ब्रह्माजी बोले- हे मुने! दुर्जय और वरगर्वित | प्राप्ति हुई, वह सब कहता हूँ। हे मुने! आदरपूर्वक उन दोनोंको जिसने अवतार लेकर, जिस रूपसे और | सुनो॥ २३-२४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'व्यासप्रश्न' नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४॥ पाँचवाँ अध्याय अदितिकी तपस्यासे प्रसन्न गणेशजीका उनके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण करनेकी स्वीकृति देना ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] कश्यप [ऋषि] | [प्रश्न] हो, उसे तुम सम्यक् रूपसे पूछो, मैं उसे मेरे ही मानस पुत्र हैं, जो अत्यन्त बुद्धिमान्, पुण्यशाली, | बतलाऊँगा ॥ ९॥ धर्मशील, तपस्वी, जितेन्द्रिय, अत्यन्त दयावान्, संसारमें | अदिति बोली- इन्द्रादि देवगणोंको तो मैंने पुत्ररूपमें सभीके दुःखों और शोकका शमन करनेवाले, ध्यानमें | प्राप्त किया है, किंतु जो परमात्मा चिदानन्द परात्पर स्थित होकर भूत-भविष्य और वर्तमानको जान लेनेवाले, | ईश्वर हैं, वे जब मुझे पुत्ररूपमें प्राप्त हों, तो मेरा मन मानसिक संकल्पसे सृष्टि और संहार कर सकनेवाले, | शान्त हो; मेरे मनमें उनकी सेवा करनेकी इच्छा है। आप वेदान्तके पारगामी विद्वान्, सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्त्विक | उस उपायको बतलायें, जिससे वे [परम प्रभु] मेरे पुत्र अर्थका ज्ञान रखनेवाले तथा मिट्टीके ढेले और सुवर्णमें | हों और मेरा मन कृतकृत्य हो ॥ १०-१११/२॥ तुल्यबुद्धि रखनेवाले हैं॥ १-३॥ | मुनि बोले- हे महाभाग्यशालिनि! तुमने बहुत अदिति उनकी ज्येष्ठ पत्नी थी, जो उन्हें अत्यन्त | उचित प्रश्न किया है, तुम्हारी बात मुझे अत्यन्त सन्तुष्टि प्रिय थी। वह सम्पूर्ण [शुभ] लक्षणोंसे सम्पन्न थी, तीनों | देनेवाली है॥ १२॥ लोकोंमें उसका सौन्दर्य अनुपमेय था। वह अपने | जैसे प्यासे व्यक्तिको जल और भूखेको भोजन पातिव्रतके तेजसे तीनों लोकोंको भस्म कर सकनेमें सक्षम | सन्तुष्टिकारक होता है, वैसे ही हे देवि! तुम्हारी [यह] थी। शेषनाग भी अपने सहस्र मुखोंसे जिसके गुणोंका | बात मुझे अत्यन्त सन्तुष्टि देनेवाली है॥ १३॥ वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। [श्रेष्ठ] गुणोंकी प्राप्तिके | किंतु हे देवि! बिना पुण्यके परमात्मा कैसे अपने लिये अष्ट नायिकाएँ भी जिसकी सेवा करती थीं। | पुत्र बनेंगे, अतः मैं तुमको उपाय बताता हूँ, उसे हृदयमें इन्द्रादि देवगणोंको जिस पापरहिताने जन्म दिया था, वह | स्थिर करो॥ १४॥ मूलप्रकृतिरूपा [देवी] वहाँ उस रूपमें (मुनिपत्नीके | हे प्रिये! जो इन्द्रियातीत [परमात्मा] श्रुतियों और रूपमें) निवास करती थी। उसने किसी समय अपने | ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी अगोचर, निर्गुण, निरहंकार, प्रसन्न मनवाले पतिसे प्रसन्नतापूर्वक कहा- ॥ ४-७॥ | निष्काम और अद्वितीय है, जो मायाका विषय नहीं है, हे स्वामिन्! मैं कुछ पूछना चाहती हूँ, कृपा करके | मायाको नचानेवाला है, मायावियोंको भी मोहित करनेवाला उसे बतलायें; क्योंकि हे प्रभो! किसी सदाचारिणी | है, मायासे परे होते हुए भी मायाका आधार है, स्त्रीकी पतिके अतिरिक्त कोई अन्य गति नहीं होती ॥ ८॥ | कारणातीत है, मायाका विस्तार करनेवाला है, जगत्प्रपंचके कश्यपजी बोले- हे कल्याणकारिणि! हे निष्पाप | कारणका भी कारण है- वह अनुष्ठानके बिना साकार प्रिये! तुमने उचित ही कहा है; तुम्हारे मनमें जो भी | स्वरूपमें कैसे आ सकता है? ॥ १५-१७॥