श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 280, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चौथा अध्याय नरान्तककी भूलोक और नागलोकपर विजय
व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे प्रकारकी मायाओंका ज्ञान रखनेवाले अत्यन्त बलवान् देवान्तकके चरितका भक्तिपूर्वक श्रवण किया, अब आप दैत्योंको वहाँ भेजा। वे वहाँ गरुड़का रूप धारण करके मुझे यह बतायें कि नरान्तकने क्या किया ? ॥ १ ॥ गये और उन श्रेष्ठ नागोंका भक्षण करने लगे ॥ १०-११ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! हे सत्यवतीपुत्र ! तुम्हारे उन दानवोंके द्वारा असंख्य नागोंका भक्षण कर [गणेशजीसे सम्बन्धित कथाओंके प्रति] परम आदरभावको लिये जानेके उपरान्त मोतियों, रत्नों, अनेक प्रकारके देखकर अब मैं तुमसे उसे कहूँगा, संयतचित्त होकर उसे सुन्दर दिव्य वस्त्र और दस हजार नागकन्याओंको साथ श्रवण करो। अनेक दैत्यसमूहोंसे घिरे हुए नरान्तकने लिये शेषनाग उनके सम्मुख गये। उन्होंने वह सब पृथ्वीपर जाकर विध्वंसका ताण्डव मचा दिया, उसने [उपहारके रूपमें] उन्हें देकर उन असुरोंसे सन्धि कर कुछ राजाओंको मार डाला ॥ २-३ ॥ ली ॥ १२-१३ ॥ बहुत-से राजाओंको मारा गया देखकर [शेष] उन अनन्त सिरवाले शेषनागने नरन्तकके आदेशानुसार सभी राजा उसकी शरणमें चले आये। जिस प्रकार उसका शासन स्वीकार कर लिया और वार्षिक कर देना ज्ञानसे अज्ञान और सूर्योदयसे अन्धकार पलायमान हो भी स्वीकार कर लिया ॥ १४ ॥ जाता है, उसी प्रकार वह जिस-जिस [शत्रु] सेनाकी तब भी उस दैत्य (नरान्तक) -ने अनेक दैत्योंसहित ओर देखता था, वह दसों दिशाओंमें भाग खड़ी होती एक श्रेष्ठ दैत्यको रसातलमें सर्वाध्यक्षके रूपमें नियुक्त थी। इस प्रकार नरान्तकने सम्पूर्ण भूमण्डलको अपने करवाया और साथ ही वहाँ नियुक्त उस दैत्यको वशमें कर लिया ॥ ४-५ ॥ नरान्तकने अपने इस आदेशकी सूचना भिजवायी कि जो राजा उसकी शरणमें आ गये थे, उनको 'यदि तुम नागोंमें कोई विकृति (विद्रोहकी भावना) अधीनता स्वीकार कर लेनेके कारण उसने उन्हें उनके देखो, तो दूतके मुखसे हमें सूचित करो। हम सम्पूर्ण पदोंपर पुनः स्थापित कर दिया और जो मार डाले गये नागोंका वध कर डालेंगे' ॥ १५-१६१/२ ॥ थे, उनके पुत्रोंको करदाता [राजा]-के रूपमें नियुक्त कर उसे इस प्रकारकी शिक्षा देकर उन सभी दैत्योंने दिया। जो राजा उससे युद्ध करनेको उद्यत हुए थे, उनको मृत्युलोकमें स्थित नरान्तकके पास जाकर सारा वृत्तान्त भी उसने अपना सेवक बना लिया और अपने मनोनुकूल उससे कहा। मृत्युलोक और पाताललोकमें उत्पन्न दैत्योंको उनके पदोंपर स्थापित कर दिया ॥ ६-७ ॥ होनेवाली वे सभी वस्तुएँ जो स्वर्गलोकमें दुर्लभ थीं, उन्हें उसने समुद्ररूपी वलयसे घिरी हुई [सम्पूर्ण] तथा [दोनों लोकोंके] सम्पूर्ण वृत्तान्त नरान्तक देवान्तकके पृथ्वीका पालन किया। [उस समय] उसके आतंकस्पी लिये सदा भेजा करता था ॥ १७-१९ ॥ भारसे देवता, मनुष्य और किन्नर अत्यन्त पीड़ित हो उसी प्रकार देवान्तक भी उसके लिये वह सब कुछ गये। यज्ञ और स्वाध्यायकर्मसे रहित मुनिजन [उस भेजा करता था, जो भूतलपर दुर्लभ है। इस प्रकार वे समय] पर्वतोंकी गुफाओंमें चले गये। 'वेदका त्याग दोनों परम प्रसन्नतापूर्वक त्रैलोक्यका राज्य करते थे ॥ २० ॥ करना दोषयुक्त है'- ऐसा विचारकर वे मनमें ही वेदका [ राजा ] सोमकान्त बोले- [ हे मुने !] उन अभ्यास करते थे। आतंकित मनवाले होनेके कारण दोनोंका वध किस रूपसे, किस अस्त्र-शस्त्रसे, किस तपस्या भी नहीं कर पा रहे थे ॥ ८-९१/२ ॥ अवतारद्वारा और कैसे हुआ ? वह सब मुझे बतलाइये ॥ २१ ॥ तब नरान्तकने नागलोकको जीतनेकी इच्छासे अनेक भृगुजी बोले- [हे राजन् ! व्यासजीद्वारा] इसी