श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 279, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०३ ] * देवान्तककी देवलोकपर विजय * २७७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बड़ी-बड़ी बातें कहाँ चली गयीं ? ॥ २९ ॥ हे इन्द्र ! सम्पूर्ण देवसमूहोंके साथ तुम मेरे सामने आओ; क्योंकि श्रेष्ठ वीर पीठ दिखाकर भागनेवालोंको नहीं मारते' । [ऐसा कहकर] उसने स्वयं उन देवताओंके आगे आकर उन्हें मारा। उसने उनके मुखपर थप्पड़ मारकर उनका प्राणान्तकर उन्हें गिरा दिया ॥ ३०-३१ ॥ उसने किसीको घुमाकर पृथ्वीपर पटक दिया, तो किसीको पाद-प्रहार, किसीको मुष्टि-प्रहार और कुछ अन्य देवताओंको कुहनीके प्रहारसे मार डाला ॥ ३२ ॥ उसने कुछ अन्य देवताओंका गला पकड़कर उन्हें तबतक घसीटा, जबतक कि उनका प्राणान्त नहीं हो गया। उसने कुछ देवताओंके घुटने तोड़ डाले तो कुछकी भुजाएँ। कुछ देवताओंकी जँघाएँ तोड़कर उसने उन्हें दूर फेंक दिया। कुछ देवता ऊपरकी ओर मुख करके कुछ नीचेकी ओर मुख किये गिरे पड़े थे और [भूतलपर अपना] मुख पटक रहे थे। कुछ चलनेमें असमर्थ हो गये थे ॥ ३३-३४ ॥ कुछ देवता दुखित होकर मन-ही-मन विचार कर रहे थे कि जगदीश्वरने क्या अकस्मात् प्रलय प्रारम्भ कर दिया। वे सभी देवता वैसे ही छिन्न-भिन्न [अंगोंवाले] हो गये थे, जैसे सिंहसे पीड़ित होकर हाथी हो जाते हैं। तदनन्तर उस जयशील देवान्तकने उसी प्रकार स्वयं गर्जन किया, जैसे मेघोंके गर्जन करनेपर मयूरमण्डली गर्जन करने लगती है। उस समय सूर्य भी अपनी भास्करी नामक पुरीको छोड़कर दूर चले गये ॥ ३५-३७ ॥ [उस समय] सभी देवता अपने-अपने पदों (अधिकारों)-को छोड़कर पलायन कर गये। तब वह निर्भय मनसे स्वयं इन्द्रपदपर आसीन हो गया ॥ ३८ ॥ सभी देवता [उस समय उससे भयभीत होकर] हिमालयकी श्रेष्ठ गुफाओंमें चले गये और कन्द-मूल- फलका आहार करते हुए [बड़े ही] कष्टसे दिन बिताने लगे ॥ ३९ ॥ तदनन्तर पृथ्वीसे तथा सभी दिशाओंसे अगणित दैत्य-दानवोंने अनेक प्रकारके द्रव्यों, अनेक तीर्थोंसे लाये हुए जल तथा अनेक ऋषियोंद्वारा उच्चारित मन्त्र-समूहों और शंख-भेरी-मृदंग एवं दुन्दुभियोंकी ध्वनिके साथ उस देवान्तकका अभिषेक किया ॥ ४०-४१ ॥ तत्पश्चात् दैत्योंने अपने उस स्वामीसे कहा- 'दैत्यकुलमें आपके सदृश न तो कोई हुआ है, न होगा। आप हम सबको आज्ञा करें' ॥ ४२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] इस प्रकार उसने इन्द्र एवं उनके अग्रगामी (प्रधान) देवताओंको अकेले ही जीत लिया और देवताओंपर राज्य किया तथा अमरावतीकी रक्षा की ॥ ४३ ॥ तदनन्तर वह करोड़ों दैत्योंसे घिरा हुआ सत्यलोक (ब्रह्मलोक)-को गया। तब ब्रह्माजी भी [उससे भयभीत होकर] वहीं चले गये, जहाँ देवता पहलेसे गये थे, उस समय वह कभी तो ब्रह्माजीके [हंसयुक्त] विमानपर आरोहण करता था और कभी इन्द्रके वाहन ऐरावतपर। तदनन्तर एक नायकको वहाँ (ब्रह्मलोकमें) स्थापितकर (शासन-सूत्र सौंपकर) वह (देवान्तक) वैकुण्ठलोकको गया, परंतु उसके पहुँचनेके पूर्व ही भगवान् श्रीहरि लक्ष्मीजीके साथ क्षीरसागरको चले गये। तब उसने अपने एक परम विश्वासपात्र दैत्यको वहाँ नियुक्तकर [अन्य दैत्योंसे] विचार-विमर्श करते हुए कहा - ॥ ४४-४६ ॥ हे दैत्यो! बताओ, मैंने किसे नहीं जीता है ? मैं कहाँ जाऊँ। तब उन दैत्योंने कहा कि 'देवताओंका कोई भी स्थान अब शेष नहीं है ॥ ४७ ॥ अब आप विभिन्न लोकपालोंके पदोंपर दैत्यजनोंको नियुक्तकर निर्भय होकर और अन्य कार्य छोड़कर केवल अमरावतीका संरक्षण करें'। मन्त्रियोंद्वारा दिये गये इस उचित परामर्शको सुनकर देवान्तकने परम प्रसन्नतापूर्वक उनके कथनानुसार कार्य किया ॥ ४८-४९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'स्वर्गविजय-वर्णन' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥