श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 278, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ / Left Column] 'इसका वध करो, इसे कठोर बन्धनमें बाँधो, इस मनुष्यको दूर भगाओ'—ऐसा कहते हुए वे (देवता) दौड़ रहे थे। तब उसने सहसा बार-बार उछल-उछल और कूद-कूदकर उन्हें दूर भगा दिया। उसके [बार- बार] उछलने और कूदनेसे स्त्रियोंके गर्भ और बड़े-बड़े वृक्ष गिर गये। [उस समय] पर्वतों, वनों और खानोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी काँपने लगी। उसके शरीरकी कान्तिसे सारे श्रेष्ठ देवता काले पड़ गये॥ ९-११॥ जिस प्रकार रोगोंद्वारा जीता गया व्यक्ति शीघ्र ही विवर्ण (आभारहित) हो जाता है, वैसे ही उसे देखकर सारे देवता विवर्ण हो गये॥ १२॥ हे मुने! उस समय इन्द्र भी विह्वल और विवर्ण हो गये तथा कुछ देवगण तो दशों दिशाओंमें भाग चले और कुछ युद्धके लिये तैयार होने लगे। कुछ अत्यन्त भयभीत और अधीर हुए साधारण देवता उसकी शरणमें चले गये। तब इन्द्र हाथमें वज्र लेकर चार दाँतोंवाले [गजश्रेष्ठ ऐरावत] हाथीपर समारूढ़ हुए॥ १३-१४॥ [तदनन्तर] उन्होंने अत्यन्त भयंकर गर्जन किया, जिससे त्रैलोक्य कम्पायमान हो उठा। उन्होंने युद्धके लिये उद्यत श्रेष्ठ देवताओंको देखकर कहा—'तुम सब क्या देखते हो, जब वह असुर यहाँ आया, तो तुम्हारा पौरुष कहाँ चला गया था?' तब वे (देवगण) संग्रामके लिये उद्यत हो आगे बढ़े॥ १५-१६॥ देवताओंको युद्धके लिये उत्सुक देखकर देवान्तकने इन्द्रसे कहा—'हे शक्र! क्यों [व्यर्थ] श्रम करते हो? मुझे प्राप्त वरदानोंपर विचार करो। सम्पूर्ण प्राणियोंका अन्त कर देनेवाले यमराज भी मेरे भयसे त्रस्त होकर भाग गये। भगवान् शंकरके वरदानसे मैं तुम्हारे वज्रको तिनकेके समान मानता हूँ॥ १७-१८॥ मेरे श्वास छोड़नेमात्रसे तुम्हारे देखते-देखते देवता सब दिशाओंमें पलायन कर जाते हैं, इसलिये हे इन्द्र! मेरी बात सुनो और शान्तिपूर्वक अपने सभी पद (अधिकार) मुझे सौंप दो और तुम स्वयं यहाँ-वहाँ कहीं जाकर रहो, अन्यथा सब कुछ खोकर व्यर्थमें
[दायाँ स्तम्भ / Right Column] मृत्युको प्राप्त करोगे। हे देवराज! क्या तुम नहीं जानते कि मेरा नाम 'देवान्तक' है?'॥ १९-२०१/२॥ उसका इस प्रकारका वचन सुनकर इन्द्रका हृदय विदीर्ण हो गया। [उस समय उन] शतक्रतु इन्द्रके मुखसे प्रबल अग्नि इस प्रकार बाहर निकली, जैसे कि अत्यन्त तप्त तैलमें जलकी बूँदें गिरनेपर छींटे बाहर निकलते हैं॥ २१-२२॥ तदनन्तर क्रोधके आवेशमें इन्द्रने उससे कहा— 'तुम्हारे-जैसे कितने ही दानव मेरे द्वारा मारे गये हैं। रे नीच असुर! तुम जो इस समय वरदानके गर्वसे यहाँ आ गये हो, तो मेरे वज्र-प्रहारसे मारे जाकर तुम निश्चित ही धरतीपर गिरोगे॥ २३-२४॥ रे बलाभिमानी! तेरे इस नामका समास अन्यपद- प्रधान (बहुव्रीहि) है, जिसका आशय है देवतासे अन्तको प्राप्त होनेवाला। [तूने भ्रमवश अपने नामको तत्पुरुष समासान्त अर्थात् देवताओंका अन्त करनेवाला मान लिया है], अगर तुझमें शक्ति है तो उसका प्रदर्शन कर, केवल डींग मत हाँक। तदनन्तर [ऐसा कहकर] इन्द्रने उसका वध करनेके उद्देश्यसे वज्रको मुट्ठीसे कसकर पकड़कर उसपर प्रहार किया तो वज्र [उसके शरीरसे टकराकर] उसी प्रकार सैकड़ों टुकड़े हो गया, जैसे मिट्टीका बना कोई पात्र हाथसे छूटकर चूर-चूर हो जाता है। देवान्तक [उस प्रहारसे] बिना व्याकुल हुए रणक्षेत्रमें खड़ा रहा, उसके शरीरका रोम भी नहीं टूटा॥ २५-२६॥ तदनन्तर उसने उन देवश्रेष्ठ इन्द्रकी पीठपर मुक्केसे प्रहार किया। इससे वे वैसे ही गिर पड़े, जैसे आँधी आनेसे वृक्ष गिर पड़ते हैं॥ २७॥ उसके इस प्रकारके पराक्रमको जानकर बल दैत्यका वध करनेवाले इन्द्र पलायन कर गये। [यह देखकर देवान्तक] उनके पीछे उसी तरह वेगपूर्वक दौड़ा, जैसे मृगसमूहोंके पीछे सिंह दौड़ता है॥ २८॥ अपना भयंकर मुख फैलाकर उसने भागते हुए उन इन्द्रसे कहा—'अब तुम क्यों भागे जा रहे हो, तुम्हारी