भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 656 में से

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पृष्ठ 293

क्री०ख०-अ० १० ] * बालक गणेशद्वारा विघातादि राक्षसोंका उद्धार * २९१ आभ्युदयिक श्राद्ध किया और ब्राह्मणोंकी पूजा की। मित्र- गणोंको यथायोग्य वस्त्रदान किया। अन्य जनोंको भी वस्त्र दिये। उन सभीने भी उन वस्त्रोंको पहन लिया ॥ ४-६ ॥ कश्यपजीने हवन सम्पन्न हो जानेपर पुनः ब्राह्मणोंकी पूजा की। तदनन्तर शीघ्र ही वेदिकामें अन्तःपट लगाकर वेदीमें अग्निकी स्थापना की गयी और बालकको वहाँ लाया गया। सुवासिनी स्त्रियों तथा ब्राह्मणोंने उसके ऊपर अक्षतोंको बिखेरा ॥ ७-८ ॥ उन ब्राह्मणोंके मध्यमें ब्राह्मणोंका रूप धारणकर पाँच अत्यन्त दुष्ट राक्षस भी बैठे थे। उनके नाम थे- विघात, पिंगाक्ष, विशाल, पिंगल तथा चपल। वे बड़ा- बड़ा तिलक लगाये थे, अक्षमालासे सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने अपने-अपने हाथमें जलपात्र धारण किया हुआ था, वे अत्यन्त रमणीय वस्त्रों तथा आभूषणोंको धारण किये हुए थे ॥ ९-१० ॥ उन दुष्टोंने उस बालक गणेशके प्राणोंका हरण करनेकी इच्छासे उसपर अस्त्रोंसे आघात किया। उनके अस्त्रोंसे उस कुमारका शरीर छिन्न-भिन्न हो गया ॥ ११ ॥ कुमार महोत्कटने उन्हें दुष्ट जानकर अक्षतोंको मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित किया और उन पाँचों राक्षसोंपर पाँच अक्षत फेंके ॥ १२ ॥ [जिससे] उसी समय उनके प्राण निकल गये और वे अपने विकराल रूप धारणकर दस योजन विस्तारवाले हो गये एवं छिन्न-भिन्न होकर भूमिपर उसी प्रकार गिर पड़े, जैसे कि इन्द्रके द्वारा किये गये प्रहारसे पर्वत गिर पड़े हों। उस समय भारी कोलाहल मच गया और दसों दिशाएँ धूलसे आच्छादित हो गयीं ॥ १३-१४ ॥ वहाँ एकत्रित लोग कहने लगे- 'छद्म रूप धारण करनेवाले इन पाँच राक्षसोंको उस बालकने क्षणभरमें कैसे मार डाला ? हम सब इस बालकको नहीं जानते हैं। क्या साक्षात् परमेश्वरने ही इस पृथ्वीके भारको दूर करनेके लिये स्वयं अवतार धारण किया है ?' इस प्रकारका वार्तालाप हो ही रहा था, कि उसी समय अपने-अपने विमानोंमें बैठे हुए ब्रह्मा आदि देवताओँने उस आदरणीय बालकपर पुष्पोंकी वृष्टि की ॥ १५-१६१/२ ॥ उन प्रेतों (शवों)-के वहाँसे ले जाये जानेके अनन्तर ब्राह्मणों तथा मुनि कश्यपने उस उपनीत बालक गणेशको अपनी शाखामें कहे गये मन्त्रोंके द्वारा वस्त्र, मेखला, यज्ञोपवीत, मृगचर्म तथा दण्ड धारण कराया ॥ १७-१८ ॥ इसके अनन्तर महर्षि कश्यपने उसकी अंजलिमें जल भरकर उसे भगवान् सूर्यके मण्डलका दर्शन कराया और हवन समाप्त करनेके पश्चात् उसे गायत्री मन्त्रका उपदेश दिया ॥ १९ ॥ पहले गायत्री मन्त्रके एक पादका, तदनन्तर प्रथम पाद एवं द्वितीय पादका और फिर सम्पूर्ण मन्त्रका उपदेश दिया। सर्वप्रथम माताने उसे भिक्षा प्रदान की। तदनन्तर वहाँ आये हुए संख्यातीत लोगोंने उसे भिक्षा दी ॥ २० ॥ तदनन्तर बटुक गणेशको महर्षि कश्यपने शौचाचार- सम्बन्धी अनेक नियमोंका उपदेशकर पुनः ब्राह्मणोंकी पूजा की और उन्हें वस्त्र, सुवर्ण तथा गौएँ प्रदान कीं। बालकके महान् अरिष्ट कट जानेपर महर्षि कश्यपने ब्राह्मणोंको यह सब दान अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक दिया था। तदनन्तर मुनि वसिष्ठजी उस बटुकको सभाके मध्यमें स्थित ब्रह्माजीके पास ले गये ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजीके कमण्डलुमें स्थित पवित्र जलको बालकने ग्रहण किया। तब ब्रह्माजीने अपने हाथमें स्थित तथा सदा ही खिले रहनेवाले कमलको उसे प्रदान किया ॥ २३ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजीने उस बालक गणेशका 'ब्रह्मणस्पति' यह नाम रखा। बृहस्पतिजीने बालक गणेशकी पूजाकर उसका 'भारभूति' यह नाम रखा ॥ २४ ॥ कुबेरने अपने कण्ठमें स्थित रहनेवाली रत्नोंकी माला उसे प्रदान की। तदनन्तर उसका पूजनकर कुबेरने बालकका 'सुरानन्द' यह नाम रखा ॥ २५ ॥ जलाधिपति वरुणने सभी देवताओंके सुनते हुए 'सर्वप्रिय' यह नाम रखकर उसे अपना 'पाश' प्रदान किया। भगवान् शंकरने अपना त्रिशूल और डमरु उसे प्रदानकर 'विरूपाक्ष' यह नाम उसका रखा। साथ ही उन्होंने उसे चन्द्रमाकी कला प्रदानकर 'भालचन्द्र' यह नाम भी रखा ॥ २६-२७ ॥ त्रैलोक्यजननी भगवती शिवाने उसे प्रसन्नतापूर्वक