श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 292, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] कर लेते थे और कभी समस्त विश्व-ब्रह्माण्डको अपनेमें समेटे हुए दिखायी देते थे। तब उन्हें ही उन्होंने षड्रससम्पन्न नैवेद्यान्नका भोग लगाकर स्वयं भी भोजन किया। इसके बाद वे उस विश्वरूपधारी बालक गणेशकी भक्तिपूर्वक स्तुति करने लगे ॥ ४० ॥ तीनों गन्धर्व बोले—हे विभो ! विविध प्रकारके स्वरूप धारण करनेवाले, रूपहीन, अद्वितीय एवं सगुण स्वरूप धारण करनेवाले आपकी भक्ति न करनेके कारण ही यह सम्पूर्ण जीव-जगत् अज्ञानसे मोहित होकर संसार-चक्रमें भ्रमण कर रहा है। नाना प्रकारकी भेद- बुद्धिसे ग्रस्त होकर आपके स्वरूपसे विमुख हुआ यह विविध प्रकारसे भ्रमित हो रहा है और अपने द्वारा किये गये विविध प्रकारके कर्मोंके अंकुरोंसे भ्रंशित और नाना प्रकारके पाशोंमें जकड़ा हुआ है ॥ ४१ ॥ दूसरे जो भक्तजन कर्मफलकी उपेक्षा करके आपके चरणारविन्दोंकी सेवामें परायण हैं, अपनी आत्माको ही दूसरेके शरीरमें प्रतिष्ठित देखनेवाले हैं, निरन्तर परमात्माके ध्यानमें परायण हैं, निर्मल अन्तःकरणवाले हैं, वे ज्ञानसे समस्त पापोंका प्रक्षालन करके, सभी कर्मांकुरोंको दग्ध करके आपमें उसी प्रकार सत्वर प्रवेश करते हैं, जिस प्रकार कि मेघोंके जलसे व्याप्त सभी नदियाँ समुद्रमें प्रविष्ट होती हैं ॥ ४२ ॥ और कुछ लोग जो आपकी भक्तिमें परायण चित्तवाले
[दायाँ स्तम्भ] हैं, वे जब बहुत-सी सिद्धियोंको प्राप्त कर लेते हैं तो उन्हींमें आसक्त मनवाले होकर आपके चरणारविन्दको भूल जाते हैं, वे तो बड़े कष्टसे उत्तम पदको प्राप्त करके भी अज्ञानवश [तत्त्वको] न जाननेके कारण अपने वास्तविक पदसे उसी प्रकार पतनको प्राप्त होते हैं, जैसे कि व्यक्ति दुर्लभ अमृतको छोड़कर विषका पान करता है ॥ ४३ ॥ अतएव हमारा जन्म चाहे किसी शुभ योनिमें हो अथवा किसी अशुभ योनिमें, हमें आपकी स्मृति निरन्तर बनी रहे और समस्त दुःखोंका उच्छेद करनेवाली आपकी मंगलमयी भक्ति सदा बनी रहे। यदि ऐसा हो जाय तो संसार-समुद्रमें भ्रमण करते हुए हम लोगोंका उद्धार आपकी कृपादृष्टिसे कभी-न-कभी हो ही जायगा। हे सर्वात्मन् ! आपको नमस्कार है ॥ ४४ ॥ हे योगेश्वर ! आपके अवतार क्यों होते हैं, कितने होते हैं तथा कब होते हैं, इन्हें जाननेमें कोई भी समर्थ नहीं है। हे मायापति ! हे गुणेश्वर ! हे भूमन् ! आपको बार-बार नमस्कार है। हे भगवन् ! आपको नमस्कार है ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर वे हाहा-हूहू आदि गन्धर्व पंचदेवोंकी पूजा करके तथा उस बालक महोत्कट गणेशकी चेष्टाओंके प्रति विस्मित होते हुए भगवान् शिवके निवास-स्थान कैलासकी ओर चले गये ॥ ४६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'हाहा आदि गन्धर्वोंके द्वारा की गयी गजानन-स्तुतिका वर्णन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥
दसवाँ अध्याय बालक गणेशद्वारा विघातादि राक्षसोंका उद्धार, बालक गणेशके यज्ञोपवीत-संस्कारका वर्णन, विविध देवोंद्वारा उन्हें अनेक नाम तथा विविध उपहार प्रदान करना
[बायाँ स्तम्भ] ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर धीमान् महर्षि कश्यपजीने उस बालक गणेशके पाँचवें वर्षमें अपने गृह्यसूत्रमें बतायी गयी विधिके अनुसार शुभ मुहूर्त तथा शुभ लग्नमें वेदके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणोंके द्वारा उसका चूड़ाकरणसहित मंगलमय व्रतबन्ध-संस्कार कराया। महर्षि कश्यपजीके शिष्योंद्वारा आमन्त्रित किये गये
[दायाँ स्तम्भ] देवता, दानव, राक्षस, मुनिगण, यक्ष, नाग और अनेक राजर्षि तथा वैश्य एवं शूद्रगण नाना प्रकारके उपहारोंको हाथमें लेकर वहाँ आये ॥ १-३ ॥ उस समय मनुष्यों तथा देवताओंने विविध प्रकारके वाद्योंको बजाया। महर्षि कश्यपने गणेश-पूजन किया तथा स्वस्तिवाचन, मण्डप-स्थापन, मातृकापूजन एवं