भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 656 में से

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पृष्ठ 291

क्री०ख०-अ०९ ] * हाहा-हूहू तथा तुम्बुरु नामक गन्धर्वोंका कश्यपमुनिके आश्रममें आना * २८९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 [बायाँ स्तम्भ] हम लोग ध्यानपरायण थे, उसी बीच कैसे सब मूर्तियाँ गायब हो गयीं ? जन्मजात वैर रखनेवाले प्राणी भी जब आपके आश्रममें परस्परके वैरका त्यागकर क्रीड़ा करते हैं, देवता भी जब आपसे भयभीत रहते हैं, तब इस आश्रममें लुटेरे कैसे आ गये ?' ॥ १७-१८ ॥ उनका वह वचन सुनकर मुनि कश्यप अत्यन्त रुष्ट हो गये। उन्होंने यह जान लिया कि मूर्ति प्राप्त किये बिना ये भोजन नहीं करेंगे ॥ १९ ॥ तब मुनिश्रेष्ठ कश्यपजीने अपने शिष्योंको बुलाकर उनसे कहा कि 'मेरे जन्मसे लेकर आजतक इस आश्रममें कोई चोर-लुटेरा नहीं आया, दैववश कौन यहाँ दस्यु बन गया, इस विषयमें तुम लोग बतलाओ?' महर्षि कश्यपके इस क्रुद्ध वचनको सुनकर वे शिष्य अपने गुरुसे कहने लगे— ॥ २०-२१ ॥ हे स्वामिन् ! हम लोग चोर नहीं हैं, आप अपने पुत्रके विषयमें तो जानते ही हैं, दोषोंको गिनानेमें हम लोगोंको पाप लगेगा, अतः वह सब हम नहीं बतायेंगे। उनकी बात सुनकर मुनि कश्यपजीने हाथमें छड़ी ले ली और वे पुत्रको खोजते हुए निकल पड़े तो अग्निशालामें उन्होंने उसको देखा ॥ २२-२३ ॥ वे बालक गणेशको उन गन्धर्वोंके पास ले आये, उन लोगोंने उसे शिवके समान देखा। क्रोधसे मूर्च्छित कश्यपजीने उन्हींके सामने विनायकसे कहा— ॥ २४ ॥ अरे वत्स ! तुम शीघ्र ही मूर्तियोंको ले आओ, नहीं तो तुम आज मेरे हाथों मरोगे। तब निडर गणेशजी बोले—'हे तात ! मूर्तियोंको मैंने नहीं लिया है। आप जो-जो भी शपथ लेनेको कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगा।' ऐसा कहते हुए पिताके भयसे भयभीत वे बालक गणेश अत्यधिक रुदन करने लगे ॥ २५-२६ ॥ अत्यन्त विह्वल होकर वे अपने मुखको फैलाकर भूमिपर गिर पड़े। उसी समय माता अदिति भी वहाँ आ पहुँचीं, तब बालकने उनसे कहा— ॥ २७॥ 'यदि मैंने देवताओंकी मूर्तियोंको खा लिया है, तो मेरे मुखमें देखो', फिर जब उसने मुख खोला तो माताने मुखके अन्दर समस्त विश्वको स्थित देखा ॥ २८ ॥ [दायाँ स्तम्भ] वे आश्चर्यचकित होकर भयसे अत्यन्त विह्वल हो मूर्च्छित हो गयीं और भूमिपर गिर पड़ीं। इसके अनन्तर मुखके अन्दर उन हाहा-हूहू आदि गन्धर्वों तथा मुनि कश्यपने कैलासपर्वत, सपरिकर भगवान् शंकर, वैकुण्ठ, विष्णु भगवान्, ब्रह्मा, सत्यलोक, इन्द्र तथा उनकी पुरी अमरावती, पर्वत एवं वनोंसे समन्वित पृथ्वी और उसमें रहनेवाले लोगों, नदियों, सागरों, यक्षों, राक्षसों, पन्नगों, वृक्षों, पक्षिगणों, चौदह भुवनों, इन्द्रादि देवताओं, [स्वर्गादि] समस्त लोकों, समस्त पातालों तथा दसों दिशाओंको देखा ॥ २९–३२ ॥ जब माताको चैतन्य हुआ, तो उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्तनपान कराया। उन विश्वात्माका इस प्रकार दर्शनकर मुनि कश्यपने उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने मनमें यह निश्चय किया कि जिन साक्षात् परमात्माने मेरे घरमें अवतार लिया है, उन्हींको मैं प्रताड़ित करने जा रहा था ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर कश्यपमुनिने उन गन्धर्वोंसे कहा कि 'आप लोग भोजन कर लें। इस महाबली बालकको ताड़ित करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ॥ ३५ ॥ समष्टि तथा व्यष्टिरूप धारण करनेवाले इस बालकको आपलोग अपना उग्ररूप दिखाकर भयभीत करें। यदि आप लोगोंमें शक्ति है तो मूर्तियोंको प्राप्त करनेके लिये इसे ताड़ित करें' ॥ ३६ ॥ वे कहने लगे कि हम लोग आपके घरमें बिना पंचायतन देवोंकी मूर्तियोंको प्राप्त किये अन्न अथवा कन्दमूल—कुछ भी भक्षण नहीं करेंगे ॥ ३७ ॥ तदनन्तर इस प्रकार कहनेवाले उन गन्धर्वोंने बालकको पाँच रूपोंमें देखा। उस एक ही बालकको दुर्गा, विष्णु, सूर्य, शिव तथा गणेश—इस प्रकारसे पाँच रूपोंवाला देखा। तब स्वस्थमन होकर उन गन्धर्वोंने उन बालरूप गणेशको प्रणाम किया, उनकी पूजा की और वे उनकी स्तुति करने लगे। क्षणभरमें वे उसे बालकरूपमें देखते थे और दूसरे ही क्षण वे उन्हें पाँच रूपोंवाले दिखायी देते थे ॥ ३८-३९ ॥ फिर अगले ही क्षण वे महान् भयकारी रूप धारण

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