भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 656 में से

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पृष्ठ 297

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क्री०ख०-अ०१२ ] * काशीनरेशका मुनि कश्यपके आश्रममें आगमन * २९५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 और उनका 'विनायक' यह सुन्दर नाम रखा। यह नाम | हो गयीं। तदनन्तर एकराट् विनायकने प्रसन्न होकर स्मरण करनेसे सभी प्रकारकी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला | इन्द्रको अभयदान दिया और कहा - ॥४३-४४॥ है। उस समय जय-जयकारके घोषों, नमस्कारकी | हे इन्द्र! तुम्हें युद्ध-स्थलमें कहीं भी कोई भय नहीं ध्वनियों तथा अनेक प्रकारके वाद्योंके निनादों और | होगा। तुम श्रद्धाभक्तिसे सम्पन्न होकर तीनों कालोंमें इस गन्धर्वोंके गीतोंकी ध्वनियों तथा अप्सराओंके नृत्योंकी | स्तोत्रका पाठ करो। अन्य भी जो कोई मनुष्य भक्तिपूर्वक झंकारोंसे एवं पुष्पोंकी वर्षासे समस्त आकाशमण्डल | इन तीनों श्लोकोंका पाठ करेगा, वह अपनी सम्पूर्ण तथा भूमितल परिव्याप्त हो गया॥४०-४२॥ | अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त कर लेगा तथा सर्वत्र विजयी विपरीत दिशामें बहनेवाली नदियाँ पूर्व दिशाकी | होगा॥४५-४६॥ ओर बहनेवाली हो गयीं; और अत्यन्त मंगलकारिणी हो | तदनन्तर इन्द्रने यह कल्याणकारी वर प्राप्तकर उन गयीं; दिशाएँ निर्मल हो उठीं; वायु अत्यन्त सुखप्रद | बालक गणेशको प्रणाम किया, इसके पश्चात् अन्य सभी होकर प्रवाहित होने लगी। अग्नियाँ सभी स्थानोंमें शान्त | जन उन्हें प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्वरूपवाली होकर दाहिनी ओर अभिमुख ज्वालाओंवाली | स्थानोंको चले गये॥४७॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरित' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥११॥ बारहवाँ अध्याय काशीनरेशका मुनि कश्यपके आश्रममें आगमन और अपने पुत्रका विवाह सम्पादित करवानेकी प्रार्थना करना, मुनि कश्यपद्वारा बालक विनायकको काशिराजके साथ भेजना, मार्गमें विनायकद्वारा धूम्नाक्ष राक्षसका वध एवं उसके दोनों पुत्रोंको उड़ाकर नरान्तकके पास भेजना, नरान्तकका दूतोंको युद्धका आदेश, विनायकद्वारा निशाचरोंका वध ब्रह्माजी बोले - सातवें वर्षमें प्रविष्ट होनेपर | मुख फैला लिया। उछलती हुई बड़ी-बड़ी नदियोंने बालक विनायकने स्नान करनेके अनन्तर सन्ध्यावन्दनादि | अपने जलसे नभोमण्डलको सिंचित कर डाला। उस नित्यकर्म सम्पन्न करके अपने मस्तकपर कान्तिमान् | समय देवी अदिति तथा महर्षि कश्यप दोनों अति मुकुट धारण किया। अपने चारों हाथोंमें अंकुश, परशु, | आनन्दित हो गये॥५-६॥ कमल तथा सभीको भयभीत करनेवाला पाश धारणकर | आज हम धन्य हो गये तथा हमारे पूर्वज भी धन्य वे सिंहके ऊपर विराजमान हुए॥१-२॥ | हो गये हैं - इस प्रकारसे वे अपनी प्रशंसा करने लगे। उन्होंने दण्ड, मृगचर्म, कानोंमें सुवर्णनिर्मित तथा | उसी समय काशीके राजा भी उस आश्रममें प्रविष्ट हुए। रत्नजटित कुण्डल धारण किये। कमण्डलु, कुश तथा | परस्पर आलिंगन करके वे सभी उस समय परम श्रेष्ठ पीताम्बर धारण किया॥३॥ | आनन्दित हुए। वे सभी परस्पर नमस्कार करके आसनपर ललाटमें कस्तूरीका तिलक और अल्प प्रकाशवाले | बैठ गये॥७-८॥ चन्द्रमाको धारण किया। गलेमें मोतीके दानोंकी माला | मुनि कश्यपने उन काशीनरेशको षड्रसोंसे समन्वित और नाभिदेशमें नागराज शेषनागको धारण किया॥४॥ | स्वादिष्ट अन्नका भोजन कराया। थोड़ी देर विश्राम तदनन्तर उन्होंने अपनी लीलासे पृथ्वी तथा | करनेके अनन्तर महर्षि कश्यपने राजासे पूछा - 'आपके आकाशमण्डलको कँपाते हुए उच्च स्वरमें गर्जन किया। | आगमनका क्या कारण है?॥९॥ उस गर्जनको मेघोंकी ध्वनि समझकर चातकोंनें अपना | हे राजन्! बड़े ही पुण्यके प्रभावसे आज हमें आप