श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 319, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०२० ] * बालक विनायककी बाललीलाके सन्दर्भमें दैत्योंके वधका वर्णन * ३१७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
आज मैं सभी दैत्योंके ऋणसे उऋण हो गया हूँ ॥ ३४ ॥ इसके साथ ही बालक विनायकको बलहीन भी मानकर वह मन-ही-मन प्रसन्नतासे भर उठा। उसी समय कन्दर नामक असुर अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस कूपके विशाल उदरको चीरकर बाहर निकल आया। यह देखकर बालक विनायक शीघ्र ही क्षणभरमें अन्तर्हित हो गये। मेरा उदर इसने फाड़ डाला, यह समझकर कूपने भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसके गलेमें तबतक काटा, जबतक उसके प्राण नहीं निकल गये, इस प्रकार आपसमें ही अत्यन्त व्याकुल होकर एक-दूसरेका वध कर देनेसे वे दोनों दैत्य भूमिपर गिर पड़े ॥ ३५-३७ ॥ उन दोनोंके परस्पर हाथ तथा पैरोंके मसलनेसे काशी नगरीका कितना ही हिस्सा चूर-चूर हो गया। जिस प्रकार सुन्द और उपसुन्द दोनों दैत्य आपसमें ही युद्ध करते हुए मर गये थे, वैसे ही वे कूप तथा कन्दर नामक असुर भी परस्पर युद्ध करते हुए मृत्युको प्राप्त हुए, राजसेवकोंने मरे हुए उन दोनों असुरोंको खींचकर नगरसे बाहर फेंक दिया ॥ ३८-३९ ॥ उसी क्षण राजाके प्रांगणमें स्थित वह कुआँ विलीन हो गया और लोगोंने देखा कि बालक विनायक सभी बालकोंके साथ पूर्ववत् क्रीडा कर रहे हैं ॥ ४० ॥ उस समय सभी बालक, राजा तथा अन्य सभी लोग आश्चर्यान्वित हो गये। कुछ लोग आपसमें कहने लगे कि जो कपटपूर्ण व्यवहार करता है, वह निःसन्देह स्वयं भी उसी प्रकार समूल विनष्ट हो जाता है, जैसे दीपक बुझानेके लिये आया हुआ पतिंगा स्वयं भस्म हो जाता है ॥ ४१-४२ ॥ साक्षात् काल भी इस बालक विनायकके एक रोमको भी हिलानेमें समर्थ नहीं है, इस अवतारी पुरुषके सामर्थ्यको हम लोगोंने भलीभाँति परख लिया है। कामदेव भगवान् शंकरपर विजय प्राप्त करने गया, लेकिन स्वयं ही भस्म हो गया। ये सब बातें सुनकर काशिराज भी कहने लगे कि यह सत्य है, सत्य है ॥ ४३-४४ ॥ तदनन्तर काशिराजने ब्राह्मणोंको दान दिया और उनकी पूजाकर उन्हें विदा किया। बालक विनायकको प्रणाम करके सभी लोग अपने-अपने घरोंको गये ॥ ४५ ॥ कुछ लोग काशिराजद्वारा भलीभाँति पूजित उस बालक विनायकका आलिंगनकर अपने घरोंको गये। उस समय देवता पुष्प बरसाने लगे तथा लोग विनायककी स्तुति करने लगे ॥ ४६ ॥ ब्रह्माजी बोले-हे ब्रह्मन् व्यासजी ! हे मुने ! इस प्रकार यह निश्चित होता है कि कर्तव्य और अकर्तव्य, वायुका वेग, मायाका स्वरूप, पुरुषका भाग्य तथा राक्षसका आचरण-ठीकसे जाना नहीं जा सकता है, ऐसे ही परमात्माके अवतारके गुणोंको भी जाना नहीं जा सकता है ॥ ४७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'कूप और कन्दरके वधका वर्णन' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥
बीसवाँ अध्याय बालक विनायककी बाललीलाके सन्दर्भमें विनायकद्वारा अम्भासुर आदि तीन दैत्योंके वधका वर्णन
व्यासजी बोले-हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! हे ब्रह्मन् ! हे भगवन् ! काशिराजके घरमें उनके पुत्रका विवाह कब सम्पन्न हुआ, उसे आप मुझे विस्तारसे बतलाइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले-एक अरिष्ट जबतक विनष्ट होता, तबतक दूसरा अरिष्ट पुनः आ पहुँचता, काशिराज जबतक यह सोचते कि इस अरिष्टके दूर होनेपर पुत्रका विवाह करूँगा, तबतक दूसरा अरिष्ट आ उपस्थित होता। कूप तथा कन्दर नामक असुरोंका वध हो जानेपर तीन अन्य राक्षस आ उपस्थित हुए, जिनके नाम थे—अन्धक, अम्भासुर और तुंग। ये तीनों ही देखनेमें अत्यन्त क्रूर थे। ये तीनों