भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 656 में से

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पृष्ठ 320

३१८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] बालक विनायकके वधकी इच्छासे आये थे। तब [विनायकके साथ उनका] युद्ध हुआ। उनके युद्धका समाचार सुनकर ब्रह्मा आदि देवता भी भाग गये थे॥ २-४॥ उन राक्षसोंने दिशाओंके हाथियोंका भी मर्दन कर दिया था, फिर देवताओंकी क्या बात! कश्यपका वह पुत्र कब हमें दिखायी देगा, उसे हम अनेक प्रकारसे मार डालेंगे। ऐसा निश्चितकर वे राक्षस आये थे। अभीतक जितने भी वीर उसके वधके लिये भेजे गये, सभी मृत्युको प्राप्त हुए हैं, लेकिन हम इसे मार डालेंगे, उसे जीते बिना हम अपने घर वापस नहीं लौटेंगे। हम लोग अग्निका स्वरूप धारणकर कश्यपमुनिके इस पुत्रको मार डालेंगे ॥ ५-७॥ उस समय अन्धक बोला—'मैं सम्पूर्ण दिशाओं तथा आकाशको अन्धकारसे व्याप्तकर पृथ्वीमें भी सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार कर दूँगा। तब लोगोंको परस्परमें एक-दूसरा कोई भी दिखायी नहीं देगा' ॥ ८ १/२ ॥ तदनन्तर अम्भासुर बोला—'मैं उस काशिराजकी नगरीसहित सम्पूर्ण पृथ्वीको जलसे आप्लावित कर दूँगा। तब कोई भी इधर-से-उधर नहीं जा सकेगा' ॥ ९ १/२ ॥ तुंग बोला—'मैं बहुत ऊँचा पर्वत बनकर उस काशीनगरीको पीसकर उसी प्रकार चूर्ण-चूर्ण कर डालूँगा जैसे कि पूर्वकालमें पंखयुक्त पर्वत [ग्राम- नगरादिको] चूर-चूर कर डालते थे ॥ १० १/२ ॥ सर्वत्र अन्धकार हो जाने, जल भर जाने, अग्निके व्याप्त हो जाने तथा पर्वतोंके छा जानेसे कोई भी बाहर जानेमें समर्थ नहीं हो सकेगा, तो फिर वह बालक कैसे बाहर चला जायगा ?' इस प्रकारका विचार निश्चित करके वे तीनों अत्यन्त जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ११-१२॥ उनकी गर्जनाकी ध्वनिसे तीनों लोक काँप उठे। क्षुब्ध हो उठे जलवाले समुद्रोंने अपने तटका अतिक्रमण प्रारम्भ कर दिया। तदनन्तर सूर्यको आच्छादित करके असुर अन्धक वहाँ स्थित हो गया। महान् घोर अन्धकारके छा जानेसे कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था ॥ १३-१४॥ अकस्मात् असमयमें रात हो गयी। जो लोग व्यापार आदि कर्मोंमें लगे थे, स्नान कर रहे थे, जपमें संलग्न थे, हवन कर रहे थे, तपस्या कर रहे

[दायाँ स्तम्भ] थे, वेदोंका स्वाध्याय कर रहे थे, विवाह, उपनयन आदि संस्कारोंको सम्पन्न कर रहे थे, भगवन्नामसंकीर्तनमें तल्लीन थे, पुराणोंका पाठ कर रहे थे, ब्राह्मणों तथा देवोंका पूजन आदि कर्म सम्पन्न कर रहे थे और नाना प्रकारके कर्मोंको कर रहे थे तथा व्रत आदिके अनुष्ठानमें लगे थे, उन्होंने यह देखा कि रात हो गयी है, वे लोग कहने लगे कि क्या विन्ध्यपर्वतने सूर्यमण्डलको रोक दिया है ? अथवा प्रलय होनेवाला है या सूर्यग्रहण लग गया है? ऐसी ही बातें सभामें विराजमान राजासे पण्डितोंने भी कहीं ॥ १५-१८॥ जबतक वे लोग इस प्रकारका विचार कर ही रहे थे कि गायें अपने-अपने घरोंको लौट आयीं। अकल्पित समयमें ही लोगोंने अपने-अपने घरोंमें (सान्ध्य) दीप जला दिये ॥ १९ ॥ अभी सूर्यास्त कैसे हो गया, न तो भोजन बना है और न किसीने भोजन ही किया है। ऐसा कहते हुए स्त्रियाँ अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गयीं, कुछ स्त्रियाँ दूध दुहने लगीं। उस समय लोग दीपक तथा लकड़ीके दीपक (मशाल) जलाकर अपना कार्य कर रहे थे। व्यापारीजन तथा ब्राह्मण आदि बड़े कष्टपूर्वक कार्योंको पूरा कर रहे थे ॥ २०-२१ ॥ उस समय सेवकों, कामीजनों, आलसियों, सोये हुओं तथा निद्रालुजनोंको बड़ा ही आनन्द प्रतीत हुआ ॥ २२ ॥ इस प्रकार अन्धकासुरके द्वारा सर्वत्र अन्धकार कर दिये जानेपर अम्भासुर नामक दैत्यने मेघ बनकर हाथीकी सूँड़के समान मोटी वर्षाकी धारा प्रारम्भ कर दी ॥ २३ ॥ उस समय क्षणमात्रके लिये बिजलीके चमकनेपर ही लोग अपनी वस्तुओंको देख पा रहे थे। वर्षाकी मोटी धारासे भयभीत होकर लोग अपने घरके अन्दर ही बैठे रह गये ॥ २४ ॥ उस भारी पानीकी धारासे बड़े-बड़े कई भवन गिर गये, घरोंकी दीवारें टूट गयीं, जनसमूहमेंसे कुछ लोग घरोंके अन्दर तो कुछ बाहर रहकर मर गये ॥ २५ ॥ झंझावातसे आहत वृक्ष भूमिपर गिर पड़े। कड़कती बिजलीने बहुतसे घरों तथा वृक्षोंको जला डाला ॥ २६ ॥